भारतीय कला शिक्षा, लोक परंपरा और समकालीन कला
यह लगभग निर्विवाद तथ्य है कि भारत में आज भी जिस औपचारिक कला शिक्षा पद्धति का अनुशरण किया जा रहा है, उसकी जड़ें औपनिवेशिक काल में स्थापित ब्रिटिश मॉडल में निहित हैं। जबकि आज यह स्पष्ट हो चला है कि मद्रास, कलकत्ता, बॉम्बे और लाहौर जैसे कला विद्यालयों की स्थापना का मूल उद्देश्य भारतीय कलाकार तैयार करना नहीं, बल्कि यूरोपीय बाजारों के लिए डिजाइन, कारीगरी और दृश्य सामग्री का उत्पादन था। परिणामतः इस शिक्षा प्रणाली में भारतीय कला परंपराओं को या तो “क्राफ्ट” कहकर हाशिये पर रखा गया या फिर उन्हें आधुनिकता-विरोधी मानते हुए पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया गया। -सुमन कुमार सिंह
कलाकार/कला लेखक
आश्चर्य की बात यह है कि स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी कला शिक्षा के इस ढांचे में कोई बुनियादी वैचारिक पुनर्गठन नहीं हुआ। भारतीय कला इतिहास, जो सिंधु घाटी, मौर्य, गुप्त, मध्यकालीन, लोक, जनजातीय और शिल्प परंपराओं के माध्यम से हजारों वर्षों में विकसित हुआ। आज भी कला महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में केंद्रीय ज्ञान-स्रोत के रूप में स्थापित नहीं हो पाया है। लोक और पारंपरिक कलाएं अधिकतर वैकल्पिक, गौण या “फोक स्टडी” तक सीमित हैं, न कि समकालीन अभ्यास के सक्रिय स्रोत के रूप में।
इसी पृष्ठभूमि में समकालीन भारतीय कला जगत में एक विरोधाभासी स्थिति उभरती है। हाल के वर्षों में अनेक ख्यात और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय कलाकार अपनी कृतियों में भारतीय शिल्प, लोक कला, आदिवासी प्रतीकों और पारंपरिक तकनीकों का खुलकर उपयोग कर रहे हैं। विशेष रूप से विदेशी प्रदर्शनियों और बिएनाले संदर्भों में यह रुझान अधिक दिखाई देता है, जहां तथाकथित “इंडियननेस” (भारतीयता) एक सांस्कृतिक पूंजी के रूप में काम करती है। यहां भारतीय शैली के वस्त्र, कढ़ाई, गोंड, मिथिला, वारली या टेराकोटा जैसे दृश्य संकेत वैश्विक कला बाज़ार में विशेष पहचान और विशिष्टता प्रदान करते हैं।
ऐसे में एक सवाल यह भी आता है कि क्या इसे चोरी कहा जा सकता है? स्पष्ट है कि यदि चोरी से आशय शैली, प्रतीक और रूपों के उपयोग मात्र से है, तो कला इतिहास बताता है कि कोई भी कला परंपरा कभी भी पूर्णतः स्वायत्त नहीं होती। ऐसे में आधुनिक कला भी उधार, रूपांतरण और पुनर्संयोजन की प्रक्रिया से उत्पन्न अवधारणा या व्याख्या है। इस अर्थ में, केवल लोक रूपों के उपयोग को चोरी नहीं कहा जा सकता, लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब यह उपयोग समान शक्ति-संबंधों के भीतर नहीं होता, बल्कि एक अभिजात्य, शहरी और संस्थागत कलाकार लोक या आदिवासी कला के दृश्य संसार को अपनाता है, लेकिन उन समुदायों को श्रेय नहीं देता, उनकी ऐतिहासिक, सामाजिक या आर्थिक स्थितियों से कोई संवाद नहीं करता और न ही उनके ज्ञान को समकालीन कला शिक्षा में स्थान दिलाने की कोशिश करता है, तो ऐसे में यह प्रक्रिया सांस्कृतिक उपभोग का रूप ले लेती है। इस हालात में लोक कला या प्रतीक प्रेरणा नहीं, बल्कि कच्चा माल बन जाती है।
इस संदर्भ में इस धारणा को आंशिक रूप से सही कहा जा सकता है, कि अभिजात्य कला समाज लोक कलाओं से चोरी कर रहा है, क्योंकि समस्या “उधार लेने” या प्रभावित होने में नहीं, बल्कि उस संस्थागत पाखंड में है। जहां एक ओर कला महाविद्यालयों और कला संकायों में लोक कलाओं को अकादमिक ज्ञान नहीं माना जाता, वहीं दूसरी ओर समाज में सदियों से प्रचलित लोक दृश्यता समकालीन कला की प्रतिष्ठा और कला बाजार का आधार बन जाती है। जाहिर है, ऐसे में यह असंतुलन लोक परंपराओं के प्रति एक संरचनात्मक अन्याय को उजागर करता है, जिसकी जड़ों में रचा बसा होता है अभिजात्य समाज का पाखंड।
वैसे यह कहना कि सभी अभिजात्य कलाकार “चोरी” कर रहे हैं या करते हैं, महज सरलीकरण होगा, किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि जब तक भारतीय कला शिक्षा अपने केंद्र में भारतीय कला परंपरा को पुनः स्थापित नहीं करती, तब तक लोक और शिल्प कलाओं का यह उपयोग नैतिक और वैचारिक सवालों से घिरा रहेगा। आवश्यकता है संरचनात्मक सुधार, न कि केवल शैलीगत समावेशन की। इस पूरे विमर्श का निष्पक्ष आकलन करते हुए यह स्वीकार करना आवश्यक है कि समकालीन भारतीय कला में लोक और पारंपरिक कलाओं का उपयोग न तो स्वभावतः गलत है और न ही स्वतः शोषणकारी। कला का इतिहास परस्पर ग्रहण, रूपांतरण और संवाद से ही निर्मित हुआ है। समस्या वहां उत्पन्न होती है, जहां यह ग्रहण असमान शक्ति-संरचना के भीतर होता है और संस्थागत स्तर पर लोक कलाओं को समान वैचारिक दर्जा नहीं मिलता।
यदि कोई समकालीन कलाकार लोक या शिल्प परंपराओं से प्रेरणा लेते हुए उनके ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों के साथ ईमानदार संवाद करता है, श्रेय और सहभागिता सुनिश्चित करता है, तो यह प्रक्रिया रचनात्मक और नैतिक कही जा सकती है। किंतु जब वही तत्व केवल वैश्विक दृश्यता या बाजार की मांग के लिए अपनाए जाते हैं, तब यह सांस्कृतिक उपभोग का रूप ले लेती है।
ऐसे में आज सबसे आवश्यक कदम कला शिक्षा के पाठ्यक्रम मंं संरचनात्मक सुधार होना चाहिए। साथ ही भारतीय लोक, जनजातीय और शिल्प परंपराओं को केवल सैद्धांतिक अध्ययन का विषय भर नहीं, बल्कि समकालीन अभ्यास के सक्रिय स्रोत के रूप में अपनाया जाना चाहिए। साथ ही कलाकारों और कला संस्थानों को भी लोक समुदायों के साथ दीर्घकालिक, समानतापूर्ण सहयोग की दिशा में बढ़ना होगा। तभी सदियों से जारी यह अंतर्विरोध रचनात्मक संवाद में बदल पाएगा।
