संपादकीय: महत्वाकांक्षी बजट

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Published By Monis Khan
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यह बजट एक नियमित विशिष्ट वित्तीय दस्तावेज़ से कहीं अधिक व्यापक अर्थ रखता है। यह उस दीर्घकालिक राष्ट्रीय दृष्टि का हिस्सा है, जिसके केंद्र में ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्संतुलन, तकनीकी बदलावों और भू-राजनीतिक तनावों के बीच प्रस्तुत यह बजट संकेत देता है कि भारत केवल परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की नहीं, बल्कि उन्हें आकार देने की तैयारी में है।

इस बजट की बुनियादी विशेषता इसका संतुलित राजकोषीय दर्शन है। सरकार ने एक ओर पूंजीगत व्यय को ऐतिहासिक स्तर पर बढ़ाकर 12.20 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाया है, तो दूसरी ओर राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा है। यह संयोजन दर्शाता है कि विकास और अनुशासन को परस्पर पूरक तत्व के रूप में देखा जा रहा है। 

एक दशक पूर्व लगभग दो लाख करोड़ रुपये के आसपास रहा पूंजीगत व्यय आज जिस स्तर पर पहुंचा है, वह अवसंरचना-आधारित विकास मॉडल के प्रति सरकार की स्पष्ट प्रतिबद्धता का संकेत है। अवसंरचना निवेश का उद्देश्य केवल सड़कों, जलमार्गों या लॉजिस्टिक्स गलियारों का विस्तार भर नहीं है, बल्कि भारत के आर्थिक भूगोल को पुनर्परिभाषित करना है। समर्पित माल ढुलाई गलियारे, राष्ट्रीय जलमार्ग और ‘पूर्वोदय’ जैसी परियोजनाएं उत्पादन, वितरण और निर्यात की लागत को कम कर प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने की दिशा में निर्णायक साबित हो सकती हैं।

 दीर्घकाल में यही निवेश निजी क्षेत्र के लिए गुणक प्रभाव उत्पन्न करेगा। विनिर्माण क्षेत्र में बजट का रुख स्पष्ट रूप से रणनीतिक आत्मनिर्भरता की ओर है। रक्षा विनिर्माण में आयात शुल्क में दी गई रियायतें घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ तकनीकी क्षमताओं के विकास का आधार बन सकती हैं। यह दृष्टिकोण आर्थिक नीति को सामरिक नीति से जोड़ने का संकेत देता है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए प्रस्तावित त्रिपक्षीय रणनीति, विकास कोष, डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से नकदी प्रवाह सुगमता और छोटे शहरों में व्यावसायिक मार्गदर्शन तथा रोज़गार सृजन की रीढ़ को मजबूत कर सकती है। 

सरकार विकास को केवल बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं रखना चाहती। सेवा और डिजिटल अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में कर अवकाश, डेटा केंद्रों और क्लाउड सेवाओं को प्रोत्साहन तथा चिकित्सा पर्यटन व आयुर्वेद के आधुनिकीकरण की योजनाएं भारत को वैश्विक डिजिटल और वेलनेस हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में रणनीतिक कदम है। कृषि क्षेत्र में बजट की दृष्टि उत्पादन-केंद्रित सोच से आगे बढ़कर पारिस्थितिकी-तंत्र निर्माण की ओर है। कृत्रिम मेधा आधारित पहल  और उच्च मूल्य फसलों के लिए समर्पित मिशन किसानों को उद्यमी बनाने की संभावना रखते हैं। 

यदि इन पहलों का प्रभावी क्रियान्वयन हो, तो ग्रामीण आय और मूल्य संवर्धन दोनों में वृद्धि संभव है। हालांकि, किसी भी बजट की वास्तविक परीक्षा उसके क्रियान्वयन में निहित होती है। पूंजीगत व्यय का समयबद्ध निष्पादन, राज्यों के साथ सहकारी संघवाद और नियामकीय प्रक्रियाओं का सरलीकरण इसकी सफलता की शर्तें होंगी, इन्हें सुसंगत रूप से धरातल पर उतारना आवश्यक है।