Moradabad: मोबाइल की दुनिया में खो रहे युवा, बढ़ी गेम्स की लत

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
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मुरादाबाद, अमृत विचार। मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन आज बच्चों की पूरी दुनिया बनती जा रही है। रंग-बिरंगे गेम, आभासी जीत और नकली रिश्ते इन सबके बीच बच्चे धीरे-धीरे असल जिंदगी से कट रहे हैं। इंटरनेट गेम्स की लत अब सिर्फ शौक या समय बिताने का जरिया नहीं रही, बल्कि यह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बन रही है।

जिला अस्पताल की मानसिक रोग ओपीडी में हर महीने औसतन 30 बच्चे इंटरनेट गेम्स एडिक्शन की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि इनमें कई बच्चे ऐसे हैं, जो पढ़ाई, परिवार और दोस्तों से लगभग कट चुके हैं। हाल ही में गाजियाबाद में सामने आई तीन बहनों की दर्दनाक मौत ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। यह घटना इस बात की भयावह चेतावनी है कि अगर समय रहते बच्चों की दुनिया को न समझा गया, तो परिणाम बेहद दर्दनाक हो सकते हैं।

जिला अस्पताल के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. अभिनव शेखर बताते हैं कि ओपीडी में आने वाले अधिकांश बच्चे मोबाइल या ऑनलाइन गेम्स में घंटों डूबे रहते हैं। खेलने से रोके जाने पर उनमें गुस्सा, चिड़चिड़ापन और हिंसक व्यवहार तक देखने को मिल रहा है। उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इसे गेमिंग डिसऑर्डर के रूप में मान्यता दे चुका है। इस स्थिति में व्यक्ति गेम पर नियंत्रण खो देता है और नुकसान होने के बावजूद उसे छोड़ नहीं पाता। 

कई बच्चे गेम की कहानी और आभासी किरदारों से भावनात्मक रूप से इतने जुड़ जाते हैं कि उन्हें वास्तविक जीवन नीरस और बोझिल लगने लगता है। माता-पिता की बात उन्हें टोकना लगती है, पढ़ाई दुश्मन लगने लगती है और अकेलापन उन्हें सुकून देने लगता है। उन्होंने बताया कि ओपीडी में आने वाले बच्चों में चिड़चिड़ापन, बेचैनी, बात-बात पर गुस्सा, दोस्तों से दूरी, अकेले रहने की आदत और पढ़ाई में लगातार गिरावट जैसे लक्षण आम हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि हर गेम खेलने वाला बच्चा खतरे में नहीं होता, लेकिन जब मोबाइल ही उसकी दुनिया बन जाए, तब खतरे की घंटी बजनी तय है।

पहचानिए गेमिंग डिसऑर्डर के लक्षण
- मोबाइल या गेम में घंटों खोए रहना
- खेलने से मना करने पर गुस्सा या बेचैनी
- अकेले रहना पसंद करना
- पढ़ाई और दिनचर्या से दूरी
- परिवार और दोस्तों से कटाव
- आभासी दुनिया को असल जिंदगी से ज्यादा अहमियत देना

अभिभावकों से अपील
बच्चों को मोबाइल देना आसान है, लेकिन उन्हें समय देना सबसे जरूरी है। अगर बच्चा अचानक चुप रहने लगे, गुस्सैल हो जाए या पढ़ाई से भागने लगे, तो इसे जिद नहीं मदद की पुकार समझें। साहिबाबाद की घटना एक चेतावनी है, जिसे अनसुना करना आने वाली पीढ़ी के लिए भारी पड़ सकता है। समय रहते बच्चों से संवाद करें, उनकी दुनिया समझें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेने में संकोच न करें।

 

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