संभल हिंसा मामला: पुलिस अफसरों पर एफआईआर के आदेश को चुनौती की याचिका पर सुनवाई

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Published By Monis Khan
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विधि संवाददाता,प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार और एएसपी अनुज चौधरी की याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की, जिनमें संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) द्वारा नवंबर, 2024 की हिंसा के संबंध में एएसपी सहित अन्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश को चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकलपीठ के समक्ष हुई। यह आदेश मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विभान्शु सुधीर ने पिछले महीने घायल युवक के पिता यामीन की अर्जी पर पारित किया गया था।

उक्त आदेश पारित होने के लगभग एक सप्ताह बाद संबंधित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का तबादला सुल्तानपुर कर दिया गया। अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने राज्य की ओर से बताया कि मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175 के तहत निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया और कानून की सीमाओं का उल्लंघन किया। उन्होंने कहा कि धारा 175(4) लोक सेवकों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित मामलों में तुच्छ या उत्पीड़न आपराधिक कार्यवाही से बचाने के लिए दो-चरणीय प्रक्रिया अनिवार्य है, जैसे- वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट प्राप्त करना, घटना की परिस्थितियों के संबंध में संबंधित लोक सेवक के कथनों पर विचार करना। महाधिवक्ता ने यह भी बताया कि इस मामले में वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट तो मंगाई गई, लेकिन उस पर विचार नहीं किया गया और आदेश में उसका उल्लेख तक नहीं है।

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने अपने आवेदन में प्रारंभिक स्तर पर थाने में शिकायत करने का उल्लेख नहीं किया, जबकि यह विधि के तहत अपेक्षित शर्त है, साथ ही पुलिस रिपोर्ट में यह उल्लेख था कि घटना के संबंध में पहले से मामला दर्ज कर जांच की जा रही है, लेकिन उसे भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया। राज्य की ओर से यह भी रेखांकित किया गया कि बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि यदि आरोप प्रथमदृष्टया निराधार, असंगत या अत्यंत असंभावित हों तो आवेदन खारिज कर सकते हैं। समता भाव के कारण मामले की सुनवाई अगले दिन के लिए स्थगित कर दी गई।

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