महाशिवरात्रि: आस्था और इतिहास के संगम हैं शहर के ये सात पौराणिक नाथ मंदिर

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Published By Monis Khan
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बरेली, अमृत विचार। बरेली शहर न केवल अपने व्यापार और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसे नाथ नगरी के रूप में भी वैश्विक पहचान मिली हुई है। शहर के चारों ओर स्थित सात प्राचीन शिव मंदिर न केवल करोड़ों भक्तों की आस्था के केंद्र हैं, बल्कि इनका इतिहास महाभारत काल की गाथाओं को भी समेटे हुए है।

अमृत विचार की टीम ने शुक्रवार को 15 फरवरी को महाशिवरात्रि पर्व मनाए जाने को लेकर सातों नाथ मंंदिरों की व्यवस्था परखी। इस दौरान मंदिरों में समितियां तैयारियां कराते हुए मिलीं। मंदिर में रंग-पुताई के साथ साज-सज्जा कराई जा रही हैं। मंदिरों की फूलों से सजावट की जा रही हैं। महाशिवरात्रि के पर्व पर रात से ही भक्तों की लंबी-लंबी लाइनें लगना शुरु हो जाएगी। शहर के सात नाथ मंदिर पशुपतिनाथ मंदिर, वनखंडीनाथ मंदिर, धोपेश्वरनाथ मंदिर, तपेश्ववरनाथ मंदिर, मढ़ीनाथ मंदिर, अलखनाथ मंदिर, त्रिवटीनाथ मंदिर में देर रात 3 बजे से ही भक्तों के दर्शन के लिए कपाट खोल दिए जाएगे। सभी शिवालयों में रुद्राभिषेक के साथ महायज्ञ और शाम को नगर में शिव बारात निकलेगी।

पशुपतिनाथ मंदिर के पुजारी मुकेश मिश्रा ने बताया कि मंदिर में सारी तैयारियां पूरी कर ली गई। महाशिवरात्रि के मौके पर शाम के समय सांस्कृतिक कार्यक्रम आयाेजित किए जाएंगे। वहीं, वनखंडीनाथ मंदिर के पुजारी केदारपुरी ने बताया कि मंदिर परिसर में पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया जाएगा। इसके बाद श्रृंगार करके के शिव बारात नगर में निकलेगी। बरात के निमंत्रण के लिए शादी का कार्ड भी छपवाया गया। कार्ड में मंदिर में आयोजित होने वाले सभी कार्यक्रम का विवरण दिया गया।

शहर के प्रमुख सात मंदिरों की मान्यता

अलखनाथ मंदिर
किला क्षेत्र स्थित अलखनाथ मंदिर का इतिहास 6500 वर्षों से भी पुरातन माना जाता है। अलखनाथ मंदिर 84 बीघा क्षेत्रफल में स्थापित है। मुगलकाल के दौरान जब सनातन संस्कृति पर संकट आया। तब बाबा अलखिया ने यहां कठोर तपस्या कर शिवलिंग की स्थापना की थी। उनके तपोबल के कारण ही विदेशी आक्रांता इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सके। बाबा अलखिया के नाम पर ही मंदिर का नाम अलखनाथ रखा गया। मंदिर में 40 दिनों तक जल चढ़ाने की विशेष महत्ता है। मंदिर परिसर में ही 51 फीट ऊंची हनुमान प्रतिमा भक्तों के लिए आस्था और आकर्षण का केंद्र बनती है।

त्रिवटीनाथ मंदिर
प्रेमनगर क्षेत्र में स्थित बाबा त्रिवटीनाथ मंदिर का विवरण विक्रम संवत 1474 से सरकारी लेखों में सहज उपलब्ध मिलता है। मंदिर की मान्यता एक चरवाहे की कथा से जुड़ी है। मंदिर के चारों ओर कभी सघन वृक्षों से घिरा जंगल हुआ करता था। तीन वट वृक्षों के नीचे एक चरवाहा गहरी नींद में सो रहा था। सोते हुए उसे लगा कि कोई उसे उठा रहा है। भगवान शिव ने तीन वट वृक्षों के नीचे चरवाहा को दर्शन दिए। उनके सामने ही खुदाई के दौरान यहां शिवलिंग प्रकट हुआ। इसकी चर्चा चारों ओर फैल गई। इसके कारण मंदिर का नाम त्रिवटीनाथ पड़ा। मान्यता है कि यहां जो श्रद्धालु नंदी के कान में अपनी मनोकामनाएं कहते हैं। उसकी सभी मनो आकांक्षाएं पूर्ण होती हैं।

वनखंडीनाथ मंदिर
जोगी नवादा क्षेत्र स्थित वनखंडीनाथ मंदिर महाभारत काल की याद दिलाता है। मंदिर का इतिहास 5 हजार साल पुराना द्वापर युग के समकक्ष माना जाता हैं। वनखंडीनाथ मंदिर में कई संतों और सन्यासियाें ने कठोर तप किया और कुछ मंदिर में ही समाधिस्थ भी हुए। पांचाल देश के राजा महाराज द्रुपद की कन्या राजकुमारी द्रौपदी ने अपने राजगुरु के आदेश पर विधिवत पूजा-अर्चना कर यहां शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की थी। माना जाता है कि उस समय गंगा नदी यहां से होकर गुजरती थी। वन में स्थित होने के कारण इस मंदिर का नाम वनखंडी नाथ पड़ा। वर्तमान में पंचदशनाम जूना अखाड़ा की ओर से मंदिर में पूजा अर्चना की जाती है। मंदिर प्रांगण में प्राचीन गौशाला भी है। मंदिर में प्रत्येक वर्ष रामलीला का मंचन किया जाता है।

धोपेश्वरनाथ मंदिर
कैंट क्षेत्र के सदर बाजार में स्थित धोपेश्वरनाथ मंदिर त्रेता युग में अत्रि ऋषि के शिष्य धूम्र ऋषि जो पांडवों के गुरु थे। उन्होंने यहां तप किया। तप पूरा होने के बाद भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देकर वरदान मांगने को कहा। तब धूम्र ऋषि ने भगवान को यहां स्थापित होकर अपने भक्तों के कल्याण करने के लिए कहा। इस पर भगवान यहां शिवलिंग के रूप में स्थापित हुए। शिवलिंग धोपेश्वरनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह मंदिर अपनी अलौकिक शक्तियों के लिए जाना जाता है।

मढ़ीनाथ मंदिर
मढ़ीनाथ क्षेत्र में स्थित मढ़ीनाथ मंदिर प्राचीन पांचाल नगरी का हिस्सा है। मंदिर का इतिहास लगभग 800 वर्ष पुराना है। मान्यता है, कि एक तपस्वी की ओर से यहां कुआं खोदते समय शिवलिंग प्रकट हुआ था। शिवलिंग पर एक मणिधारी नाग लिपटा हुआ था। यहां मंदिर की स्थापना कराई गई। मणिधारी नाग के कारण ही मंदिर का नाम मढ़ीनाथ रखा गया। यहां 1960 तक शिवलिंग से दूध निकलने की बात कही जाती है।

तपेश्वरनाथ मंदिर
सुभाषनगर क्षेत्र स्थित तपेश्वरनाथ मंदिर को साधु संतों की तपोभूमि माना जाता है। मंदिर का पौराणिक इतिहास 5 हजार साल पुराना माना जाता है। पहले यहां एक वन था। इसमें कई संतों के साथ भालू बाबा ने 400 वर्षों तक यहां कठोर तप किया। संतों की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और यहां विराजमान हुए। इसके बाद मंदिर का नाम तपेश्वरनाथ मंदिर रखा गया। मंदिर के वर्तमान स्वरूप को वर्ष 2003 में पूर्ण किया गया।

पशुपतिनाथ मंदिर
पीलीभीत बाईपास पर स्थित यह मंदिर नेपाल के काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है। मंदिर में नेपाल के पशुपतिनाथ के समान ही भव्य पंचमुखी शिवलिंग है। मंदिर का निर्माण समाजसेवी जगमोहन सिंह ने कराया था। मंदिर में एक मुख्य शिवलिंग के साथ 108 छोटे शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिर को पैगोडा शैली में बनाया गया है। जो तालाब के मध्य स्थित होने के कारण अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं। परिसर में एक कैलाश स्वरूपी पर्वत है, जिसमें 1101 नर्मदेश्वर शिवलिंग हैं।

 

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