कानपुर में 'स्मार्ट' सिर्फ नाम का! अतिक्रमण ने फुटपाथ-नहर-पार्क छीन लिए, मेट्रो-सीवर काम के बीच जनता परेशान
कानपुरः कपड़ा और चर्म उद्योग के कारण एक जमाने में पूरब के मैनचेस्टर के नाम से विख्यात उत्तर प्रदेश का औद्योगिक शहर कानपुर राजनीतिज्ञों की बेरुखी और अफसरशाही के उदासीन रवैये के चलते अतिक्रमण,गंदगी और ट्रैफिक जाम की समस्या से सिसक रहा है। अस्सी के दशक तक चिमनियों का शहर कहे जाने वाले कानपुर में समय के साथ बड़ा बदलाव देखने को मिला है। जेके जूट मिल, स्वदेशी काटन मिल, लाल इमली, म्योर मिल, अथर्टन मिल, एल्गिन मिल और लोहिया मशीन्स जैसी तमाम बड़ी कंपनियां आज खामोश हो चुकी हैं और इनका स्थान छोटे और कुटीर उद्योगों ने ले ली है जिसके चलते आज भी घनी आबादी वाला यह नगर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभा रहा है।
कानपुर में इन दिनों जलजीवन मिशन के तहत गहरी सीवर लाइन और यातायात की समस्या से निपटने के लिये मेट्रो रेल का कार्य चरम पर है जिससे आने वाले समय में कानपुर की तस्वीर पूरी तरह बदलने के पूरे आसार हैं मगर इन विकास कार्यो को पूरा करने के दौरान होने वाली जन समस्यायों का स्पष्ट अभाव देखा जा रहा है। शहर विशेषकर दक्षिण क्षेत्र में गड्ढों से भरी सड़कें, फुटपाथ पर पसरे अतिक्रमण, नहरों में तथा इसके किनारों पर जमा कूड़े के ढेर इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। सीटीआई नहर में सालों से जमी गाद और गंदगी अवैध रुप से बसे संजय नगर के अलावा पॉश इलाके रतनलाल नगर के वाशिंदों के लिये बीमारी का सबब बनी हुयी थी।
इस दौरान क्षेत्रीय भाजपा विधायक ने कई बार विशेषकर छठ पूजा के समय लोगों को विश्वास दिलाया कि नहर को शहर का सबसे खूबसूरत स्थल बनाया जायेगा मगर नतीजा सिफर रहा। पिछले महीने जेसीबी से नहर की गंदगी हटाकर सड़क किनारे किया गया मगर गंदगी के पहाड़ के ढेर अब भी लोगों का जीना दुश्वार किये हुये हैं।
इसके अलावा कानपुर विकास प्राधिकरण द्वारा बसायी गयी दबौली, बर्रा और गुजैनी कालोनियों के अधिकतर पार्को पर देवस्थानों के नाम पर बाहुबली कब्जा किये हुये हैं। यहां तक कि शास्त्री चौक के आसपास नाले के ऊपर बने क्षेत्र में छोटे बड़े मंदिर बना लिये गये हैं। इन क्षेत्रों से तमाम बार विधायक,सभासद और उच्च अधिकारी गुजरते हैं मगर किसी की निगाह इन अतिक्रमण पर नहीं पड़ती। बर्रा आठ से विजय नगर डबल पुलिया तक मेट्रो रेल का निर्माण प्रगति पर है मगर इसके दोनो ओर सड़क तक पसरी दुकानों और ठेलों से सड़क सिमट कर सकरी गली बन चुकी है जिससे इस मार्ग पर आये दिन घंटो का जाम लगा रहता है।
क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि पार्क आम शहरियों को स्वास्थ्य समस्या से निपटने के अलावा भूजल संग्रहण में भी अहम भूमिका अदा करते हैं मगर पार्को पर पक्का निर्माण प्रशासन की नजर में कब आयेगा, यह किसी को पता नही है। कमोवेश शहर के अन्य इलाकों का हाल भी यही है। यशोदा नगर,कर्रही,जाजमऊ समेत दर्जनों इलाकों में कई स्थानो पर सड़के गड्ढों में गुम हो चुकी है। शहर में पेयजल की समस्या विकट है।
जलकल विभाग द्वारा डाली गयी तमाम लाइने जर्जर हो चुकी हैं जिसके चलते दूषित जल की आपूर्ति की समस्या आम हो चुकी है। दूषित जल की समस्या से निपटने के लिये आधे से अधिक शहर सबमर्सिबल पंप के जरिये भूजल का दोहन कर रहा है और इस बारे में उच्च अधिकारी भी भलीभांति जानते है। इसके बावजूद नगर में पेयजल की समस्या का कोई स्थायी निदान नहीं हो पा रहा है।
दबौली क्षेत्र के लोगों का कहना है कि यहां उन्हे अपने घर के सामने फुटपाथ की सफाई खुद ही करनी पड़ती है क्योंकि सफाई कर्मचारी के दर्शन हफ्ते 15 दिन में एक बार ही होते हैं। हालांकि सभासद या दबंग नेता के घर के सामने बने फुटपाथ चकाचक रहते हैं। लोगो की यह भी शिकायत है कि नगर निगम के अधिकारी या कर्मचारी शिकायत के बावजूद उनकी नहीं सुनते है और सफाई कर्मचारियों की कमी का हवाला देते हुये टाल देते हैं। लिखित शिकायत के बावजूद अधिकारियों के कानो में जूं नहीं रेंगती है।
इतना जरुर है कि सरकारी दस्तावेजों में कानपुर तेजी से चमकता हुआ शहर है। यहां समय समय पर नगर निगम और अन्य विभाग अभियान चला कर सब कुछ सही करने का दावा करते है मगर आम नागरिक सुविधाओं के बारे में कानपुर में निवास करने वाला आम शहरी ही जानता है कि उसे हर रोज किन दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है।
कुल मिला कर कानपुर में बढ़ते अतिक्रमण ने न केवल जीवन के अन्य पहलुओं को प्रभावित किया है, बल्कि यह यातायात के प्रवाह और शहर की समग्र आर्थिक स्थिति पर भी गहरा असर डाल रहा है। सड़कों पर अवैध अतिक्रमण के कारण उत्पन्न होने वाले जाम से न केवल लोगों का समय बर्बाद होता है, बल्कि यह आर्थिक नुकसान का भी कारण बनता है। शहरों के ट्रैफिक सिस्टम के अतिक्रमण के कारण गंभीर आर्थिक परिणाम सामने आते हैं, जो विकास में रुकावट पैदा करते हैं।
