कानपुर में कल फिर उड़ेगा अबीर गुलाल, निकलेगा रंगों का ठेला, दशकों पुरानी है परंपरा
कानपुर। यूं तो पूरे देश में होली का खुमार पूरी तरह उतर चुका है और लोग अपनी नियमित दिनचर्या में लौट चुके हैं मगर औद्योगिक नगरी कानपुर में मंगलवार को एक बार फिर जम कर अबीर गुलाल उड़ेगा और लोग जम कर होली के रंग में तरबतर होंगे। दरअसल,कानपुर में अनुराधा नक्षत्र में होली खेलने की परंपरा दशकों पुरानी है और यह परंपरा आजादी की लड़ाई से जुड़ी है।
इतिहासकारों के अनुसार गंगा मेला के नाम से मशहूर इस परंपरा की नींव 1942 में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पड़ी थी जब कानपुर के हटिया बाज़ार में अंग्रेजों ने होली खेलने पर पाबंदी लगा दी थी। अंग्रेज अधिकारी मिस्टर लुईस ने पाबंदी के बावजूद होली खेलने के आरोप में 45 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को गिरफ्तार कर लिया था, क्योंकि उन्होंने होली के दिन तिरंगा फहराया था।
इस गिरफ्तारी की भनक लगते ही कानपुर में स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी ने आग पकड़ ली और पूरा शहर धधक उठा था। शहर में गिरफ्तारी के विरोध में व्यापक प्रदर्शन हुये जिसके बाद अंग्रेजों को मजबूर होकर सभी 45 हुरियारों को अनुराधा नक्षत्र के दिन रिहा करना पड़ा। रिहाई के बाद सरसैया घाट पर गुलाल से होली खेली गई, जिसे 'गंगा मेला' या 'गंगा होली' कहा जाता है।
होली खेलने की इस परंपरा का निर्वहन 84 साल बाद भी पूरी शिद्दत के साथ किया जाता है। इसके तहत मेला उत्सव की शुरुआत दिन में रंगों से भरे ड्रम लेकर एक "भैंसा ठेला" से होती है जो हटिया के रज्जन बाबू पार्क से सरसैया घाट तक निकाला जाता है। इस ठेले के साथ हजारों की संख्या में युवा,जवान चलते हैं और लंबी पिचकारी से एक दूसरे को भिगोते चलते हैं।
शाम ढलते ही सरसैया घाट पर एक मेला लगता है जहां समाज के विभिन्न वर्ग जिनमे राजनेता,उद्योगपति गरीब अमीर का भेद मिटाते हुये प्रेम भाव से गले मिलते हैं और गुझिया,मिष्ठान आदि से होली मनाते हैं। इस बार गंगा मेला को देखते हुये जिला एवं पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के चाक चौबंद इंतजाम किये हैं। रेलवे स्टेशन से हटिया की तरफ जाने वाले यात्रियों को सावधान किया जाता है। कई जगत यातायात परिवर्तन भी किया गया है। सीसीटीवी कैमरों की मदद से भीड़ पर नजर रखी जायेगी।
