चिकनाई हजम करने वाली 131 प्रोटीस
वसा या फैट इंसानी डाइट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भोजन घी-तेल के बिना भी बनाया जा सकता है, लेकिन मनुष्य ने बहुत पहले ही वसा के स्वाद और उपयोगिता को पहचान लिया था। इसी कारण भोजन को या तो वसा में फ्राई किया जाता है या वसा में पकाया जाता है, जिससे उसका स्वाद बढ़ता है और उसे चबाना-निगलना भी आसान हो जाता है, लेकिन आम आदमी को यह विज्ञान बहुत कम मालूम है कि वह वसा का सेवन आखिर क्यों करता है और शरीर उसके साथ क्या करता है। दरअसल शरीर को वसा बहुत अधिक मात्रा में नहीं चाहिए। सामान्य परिस्थितियों में लगभग 45 से 75 ग्राम वसा 24 घंटे में पर्याप्त होती है। इसके बावजूद हम अक्सर जरूरत से ज्यादा वसा खा लेते हैं, क्योंकि स्वाद और आदत हमें इसके लिए प्रेरित करती है। कोलेस्ट्रॉल को आम तौर पर लोग वसा ही समझते हैं, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक प्रकार का लिपिड है।
लिपिड का रासायनिक ढांचा
लिपिड एक व्यापक श्रेणी है, जिसमें विभिन्न प्रकार के फैट शामिल होते हैं। शरीर में कोलेस्ट्रॉल की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह कोशिकाओं की झिल्ली अर्थात सेल मेम्ब्रेन का एक जरूरी घटक है और कई हार्मोन तथा विटामिन-डी के निर्माण में भी मदद करता है। इसलिए कोलेस्ट्रॉल को केवल हानिकारक मान लेना वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं है। लिपिड का रासायनिक ढांचा मुख्य रूप से फैटी एसिड और ग्लिसरॉल से बना होता है। ये कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन परमाणुओं से निर्मित लंबी हाइड्रोकार्बन श्रृंखलाएं होती हैं। लिपिड के तीन प्रमुख प्रकार माने जाते हैं- ट्राइग्लिसराइड्स, फॉस्फोलिपिड्स और स्टेरोल्स। ट्राइग्लिसराइड्स में ग्लिसरॉल के साथ तीन फैटी एसिड जुड़े होते हैं। फॉस्फोलिपिड्स में एक ऐसा सिरा होता है, जो पानी को आकर्षित करता है और दूसरा ऐसा जो पानी से दूर रहता है। यही संरचना कोशिकाओं की झिल्ली बनाने में मदद करती है। स्टेरोल्स का ढांचा अपेक्षाकृत जटिल रिंग संरचना वाला होता है, जिसमें कोलेस्ट्रॉल भी शामिल है। इन संरचनाओं की वजह से लिपिड जैविक प्रणालियों में कई तरह के काम करते हैं। ऊर्जा का भंडारण, कोशिका झिल्ली का निर्माण और कई जैव रासायनिक प्रक्रियाओं को स्थिर रखना। जब हम भोजन के साथ वसा लेते हैं तो शरीर के भीतर उसे संभालने के लिए कई जटिल प्रक्रियाएं शुरू हो जाती हैं। इनमें पहली प्रक्रिया है लिपोजेनेसिस। यह फैट बनाने की प्रक्रिया है, जिसमें कोशिकाओं के साइटोप्लाज्म में एसिटाइल कोएंजाइम-ए से फैटी एसिड का निर्माण होता है। यह प्रक्रिया दो-दो कार्वन परमाणु जोड़ते हुए चलती रहती है, जब तक फैटी एसिड आवश्यक लंबाई तक न पहुंच जाए।
इसके बाद अगला चरण आता है लिपोलिसिस। इसमें वसा छोटे-छोटे अणुओं मोनोग्लिसराइड्स और फ्री फैटी एसिड में टूटती है। इन अणुओं का उपयोग शरीर ऊर्जा के लिए करता है या उन्हें एडिपोज टिश्यू में जमा कर देता है। एडिपोज टिश्यू शरीर का एक विशेष ऊतक है, जिसमें ऊर्जा को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जाता है। यह संग्रह उस समय काम आता है, जब शरीर को लंबे समय तक भोजन नहीं मिलता या कोई संकट की स्थिति पैदा होती है। इसके बाद आता है एब्जॉर्प्शन अर्थात अवशोषण का चरण। छोटी आंत की भीतरी परत के एपिथेलियल सेल्स फैटी एसिड को अपने भीतर लेते हैं और उन्हें पैक करके शरीर के विभिन्न हिस्सों में भेजने के लिए तैयार करते हैं। यह पैकिंग प्रक्रिया अत्यंत व्यवस्थित होती है। जब यह ‘माल’ पैक हो जाता है, तो इसे शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने के लिए वाहनों की जरूरत पड़ती है। शरीर में यह काम लिपोप्रोटीन्स करते हैं। लिपोप्रोटीन्स को उनके आकार और घनत्व के आधार पर कई श्रेणियों में बांटा जाता है। इन्हें मोटे तौर पर उस गाड़ी की तरह समझा जा सकता है, जो लिपिड को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाती है। जब यह लिपिड अपने गंतव्य तक पहुंच जाते हैं, तब उनका भंडारण होता है ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें फिर से ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल किया जा सके। ट्राइग्लिसराइड्स और अन्य लिपिड तब तक एडिपोज टिश्यू में रहते हैं, जब तक शरीर को उनकी आवश्यकता न हो। ये सारी प्रक्रियाएं शरीर में ऊर्जा संतुलन बनाए रखने, कोशिका झिल्ली की संरचना को स्थिर रखने और हार्मोन निर्माण को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक हैं। लिपिड मेटाबॉलिज़्म का सही संचालन हमारी समग्र सेहत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। आहार, व्यायाम और कई चयापचय संबंधी रोग इस पर प्रभाव डाल सकते हैं। यदि यह प्रक्रिया धीमी पड़ जाए या असंतुलित हो जाए तो शरीर में कई प्रकार की बीमारियां जन्म लेने लगती हैं।
लगातार काम करती हैं मानव कोशिकाएं
मानव कोशिकाएं हजारों प्रकार के लिपिड बनाती हैं। इन सभी का सामूहिक रूप लिपिडोम कहलाता है। लिपिडोम की संरचना कोशिका की जरूरतों के अनुसार बदलती रहती है और यह कोशिका की पहचान तथा उसके विशेष कार्यों को निर्धारित करने में मदद करती है। लिपिड का वितरण कोशिका के भीतर अलग-अलग स्थानों पर होता है। कुछ लिपिड विशेष ऑर्गेनेल या माइक्रोडोमेन की झिल्लियों का निर्माण करते हैं। इस पूरे सिस्टम को व्यवस्थित रखने में कई प्रकार के लिपिड मेटाबॉलिज़्म और ट्रांसपोर्ट सिस्टम शामिल होते हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण भूमिका लिपिड ट्रांसफर प्रोटीन्स (LTPs) निभाते हैं। इन प्रोटीनों की संरचना अलग-अलग होती है, लेकिन उनका काम लगभग समान होता है। वे कोशिका झिल्ली की परतों से विशेष लिपिड अणुओं को निकालते हैं और उन्हें अपने भीतर मौजूद हाइड्रोफोबिक पॉकेट में रख लेते हैं। इस तरह पानी में घुलने योग्य प्रोटीन-लिपिड कॉम्प्लेक्स बनते हैं, जो लिपिड को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं। इस प्रक्रिया को लिपिड मोबिलाइजेशन कहा जाता है। कई बार ये प्रोटीन केवल मुख्य लिपिड ही नहीं, बल्कि सहायक लिपिड भी साथ ले जाते हैं, जो विनिमय मुद्रा या सह-कारक की तरह काम करते हैं। इससे यह तय होता है कि लिपिड किस दिशा में जाएगा और किस जैव रासायनिक प्रक्रिया में भाग लेगा। लिपिड मेटाबॉलिज़्म और उसका परिवहन वास्तव में सूक्ष्म स्तर पर चलने वाली अद्भुत रासायनिक प्रक्रियाएं हैं, जिनका हमें सामान्य जीवन में एहसास भी नहीं होता। हम भोजन के माध्यम से पशु और वनस्पति स्रोतों से वसा ग्रहण करते हैं। इन दोनों में फैटी एसिड की श्रृंखलाएं अलग-अलग लंबाई की होती हैं। शरीर में ये अणु विभिन्न एंजाइमों और अम्लों की सहायता से टूटते-बनते रहते हैं। यह सब कुछ हमारी कोशिकाएं लगातार करती रहती हैं। वे कभी आराम नहीं करतीं। पुरानी और थकी हुई कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाएं बनती रहती हैं और जीवन की यह रासायनिक मशीन चुपचाप चलती रहती है।
क्या कहते हैं शोध
हाल के वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि मनुष्य के शरीर में कम से कम 131 प्रकार के लिपिड ट्रांसफर प्रोटीन होते हैं। इनकी गड़बड़ी कई बीमारियों से जुड़ी पाई गई है। वैज्ञानिक इन प्रोटीनों और उनके लिपिड कॉम्प्लेक्स को समझने के लिए उन्नत तकनीकों जैसे एफिनिटी प्यूरिफिकेशन और मास स्पेक्ट्रोमेट्री का उपयोग कर रहे हैं। इन अध्ययनों से यह समझने की कोशिश की जा रही है कि कोशिकाओं के भीतर लिपिड का परिवहन और संतुलन कैसे बना रहता है। जब हम अपनी सेहत की जांच कराने डॉक्टर के पास जाते हैं, तो वह कई प्रकार के रक्त परीक्षण करवाने की सलाह देता है। रक्त में लगभग दो सौ से अधिक प्रकार के सूक्ष्म मेटाबोलाइट्स होते हैं, जिनकी उपस्थिति और मात्रा का पता आधुनिक मशीनों से लगाया जाता है। सामान्यतः किए जाने वाले परीक्षणों में पूर्ण रक्त गणना (CBC), रक्त शर्करा परीक्षण, लिपिड प्रोफाइल, लिवर फंक्शन टेस्ट और कॉम्प्रिहेंसिव मेटाबोलिक पैनल शामिल हैं। ये परीक्षण एनीमिया, मधुमेह, हृदय रोग, लिवर और किडनी की स्थिति जैसी कई बातों का संकेत देते हैं। इन जांचों के आधार पर डॉक्टर यह समझने की कोशिश करता है कि शरीर के भीतर चल रही जैव रासायनिक प्रक्रियाएं सही ढंग से काम कर रही हैं या नहीं, लेकिन सच यह है कि जब तक शरीर की प्राकृतिक क्षमता मजबूत रहती है, तब तक यह जटिल तंत्र अपने-आप संतुलित रहता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है और जीवनशैली असंतुलित होती है, यह संतुलन बिगड़ने लगता है। तब दवाइयों का सहारा लेना पड़ता है। आयुर्वेद में भी कहा गया है कि अधिकांश रोगों की शुरुआत पेट से होती है। आधुनिक विज्ञान भी अब इस बात की पुष्टि कर रहा है कि भोजन और चयापचय की प्रक्रिया हमारे स्वास्थ्य का मूल आधार है। इसलिए संतुलित आहार, सीमित वसा सेवन और नियमित व्यायाम शरीर की इन सूक्ष्म जैव रासायनिक प्रक्रियाओं को स्वस्थ बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। शरीर हमें अक्सर संकेत देता रहता है कि कौन-सी चीज हमारे लिए ठीक है और कौन-सी नहीं। इन संकेतों की अनदेखी करना लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
