अक्षम और अप्रभावी हो चुका संयुक्त राष्ट्र संघ

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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संयुक्त राष्ट्र संघ अब अप्रासंगिक हो गया है। ऐसा लगता है कि अमेरिका और रूस जैसी महाशक्तियों के सामने यह संगठन लाचार और मजबूर है। न तो इसके पास कोई अधिकार है न ही इसकी कोई सुनता है। पूरी शक्ति का प्रयोग यह संगठन सिर्फ छोटे देशों पर ही कर पाता है। बड़ी महाशक्तियां तो उसकी सुनती ही नहीं। ऐसा लगता है कि किसी देश के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पेश करने का मंच बनकर रहे गए इस संगठन को भंग करने का समय आ गया है। अपनी आर्थिक, सामरिक ताकत के दम पर इस संगठन को अमेरिका, रूस, चीन जैसे देशों ने बंधक बना लिया है। कई ध्रुवों में बंट चुके देशों को अब एकजुट होना होगा और अपने हितों के लिए दंत विहीन इस संगठन को मजबूत करना होगा। अब भी अगर सदस्य देश एकजुट नहीं हुए तो फिर अमेरिका जैसे देशों की दादागिरी चलती रहेगी। आज ईरान में बेनुगाह मारे जा रहे हैं कल किसी और देश की धरती को बारूद से पाट दिया जाएगा।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा संघ की फिर से बैठक बुलाई जाएगी। निंदा प्रस्ताव पास किया जाएगा, लेकिन युद्ध नहीं रुकेगा। 
युक्रेन के बड़े भूभाग पर कब्जा जमाने की चाहते में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पड़ोसी देश की धरती को खंडहर में तब्दील कर दिया। बम रूस की धरती पर भी फट रहे हैं। जानें वहां भी जा रही हैं लेकिन चार से साल से संयुक्त राष्ट्र संघ बार- बार निंदा प्रस्ताव पास करने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सका। कई बार वहां युद्ध रोकने का प्रस्ताव भी पास हुआ पर नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। फरवरी 2022 में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध में दोनों पक्षों के 10 लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज  की रिपोर्ट 2026 के अनुसार इस युद्ध में लगभग 325,000 रूसी सैनिक व  140,000 यूक्रेनी सैनिकों की मौत हो चुकी है।

संयुक्त राष्ट्र संघ  की स्थापना 1945 में की गई थी। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने, भविष्य में युद्धों को रोकने, राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करना था। साथ ही अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से मानव अधिकारों की रक्षा व सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देना था। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह अपने उद्देश्य को पूरा कर पा रहा है। तो जवाब आता है नहीं। 1950 के दशक में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव डैग हैमरस्कजोल्ड ने मजाकिया लहजे में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र हमें स्वर्ग तक पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि नरक से बचाने के लिए बनाया गया था। लेकिन यह संस्था हमें युद्ध रूपी नरक से बचा नहीं पा रही है।

इसलिए अब यह धारणा बनती जा रही है कि संयुक्त राष्ट्र एक संगठन के रूप में तेजी से अक्षम और अप्रभावी होता जा रहा है। वैसे तो इस संगठन में 193 देश हैं लेकिन कब्जा सिर्फ वीटो पावर वाले देशों अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन का ही है। रूस ने यूक्रेन पर यह कहकर हमला किया था कि वह नाटो का सदस्य बनकर उसके लिए खतरा बन रहा है लेकिन इस युद्ध के पीछे युक्रेन के बड़े भूभाग पर कब्जे की योजना थी। जो साफ दिखती है। युक्रेन- रूस युद्ध रोकवाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावे तो बड़े- बड़े किए थे। रूस के राष्ट्रपति के साथ बैठक भी की थी लेकिन दुनिया को शांति का संदेश देते- देते वे खुद ही युद्ध करने में जुट गए।

ईरान में सत्ता किसकी रहेगी यह तय करने का अधिकार वहां की जनता का है लेकिन सत्ता परिवर्तन के नाम पर ट्रंप  ने इजरायल के साथ मिलकर इस देश को युद्ध में झोक दिया और इसकी आग से सऊदी अरब, बहरीन, ओमान, यूएई जैसे देश भी झुलस रहे हैं। उनकी धरती पर भी गोले बरस रहे हैं। अमेरिका की धरती पर कोई बारूद तो नहीं गिर रहा है लेकिन मारी इजरायल की जनता भी जा रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव ने  युद्ध रोकने की अपील करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। निंदा प्रस्ताव भी पास हो गया लेकिन इससे मिला क्या कुछ नहीं।  ट्रंप ने जिस सत्ता परिवर्तन के मकसद से ईरान पर हमले किए थे वह तो पूरा नहीं हुआ। निकट भविष्य में पूरा होता दिख भी नहीं रहा है। ट्रंप को लगा था कि अयातुल्ला अली खामनेई की मौत के बाद ईरान सरेंडर कर देगा लेकिन हुआ इसका उल्टा। ईरान पूरी दमदारी से पलटवार कर रहा है।

अमेरिकी युद्ध पोतों को निशाना बनाने के साथ ही इजरायल, बहरीन, कतर, यूएई, सऊदी अरब जैसे देशों पर करारा हमला कर रहा है। इन देशों में स्थित अमेरिकी बेस भी तबाह हो गए हैं। अब डोनाल्ड ट्रंप युद्ध से बाहर आने का बहाना तो खोज रहे हैं पर लगता है कि अब उन्होंने देर कर दी है क्योंकि ईरान ने तीन शर्तें रखकर उन्हें बता दिया है कि युद्ध अमेरिका और इजरायल ने जरूर शुरू किया था लेकिन खत्म अब उसकी मर्जी से ही होगा। जो हालात बन रहे हैं उससे तो यही लगता है कि ईरान खुद तो खंडहर में तब्दील होगा ही सऊदी अरब, कतर, बहरीन, इजरायल, यूएई जैसे देशों को भी खंडहर बनाकर छोड़ेगा। साथ ही पूरी दुनिया में तेल और गैस के संकट को और बढ़ा देगा। ईरान से युद्ध में उलझे ट्रंप अब क्यूबा को भी तबाह करने की धमकी दे रहे हैं। ग्रीन लैंड पर कब्जे का तानाबाना वे अब भी बुन रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि अगर संयुक्त राष्ट्र संघ ऐसे ही निंदा प्रस्ताव पास करता रहेगा तो फिर अमेरिका और रूस जैसे देशों की दादागिरी रुकेगी कैसे। आर्थिक और सामरिक रूप से कमजोर देश खुद की सुरक्षा कैसे कर पाएंगे।

डॉ. विकास शुक्ला, कानपुर

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