नवरात्रि कल से, कलश स्थापना को एक घंटे का मुहूर्त शुभ, अष्टमी का व्रत 26 को, 27 मार्च को नवमी पर होगा हवन पूजन

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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अयोध्या, अमृत विचार : चैत्र शुक्ल नवरात्रि का पर्व 19 मार्च को प्रतिपदा से आरंभ हो रहा है। 27 मार्च को नवमी तिथि पर हवन पूजा के बाद संपन्न हो जाएगा। अष्टमी का व्रत-पूजन 26 मार्च को रहेगा। नवरात्रि महापर्व पर विभिन्न शक्तिपीठों के साथ राम मंदिर सहित 5000 मंदिरों के गर्भगृह में कलश स्थापना कर आठ दिवसीय अनुष्ठान प्रारंभ होगा। सभी मठ मंदिरों में प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराया जाएगा।

ज्योतिषाचार्य पंडित प्रवीण शर्मा के मुताबिक इस वर्ष पड़ रहे नवरात्रि में 19 मार्च को ब्रम्हमुहूर्त से ही प्रतिपदा तिथि प्रारंभ हो जाएगी और 27 मार्च को समाप्त होगी। प्रतिपदा पर अनुष्ठान व पूजन के लिए कलश स्थापना का लगभग एक घंटे का सुबह 6:52 से 7:43 मिनट तक सबसे पवित्र मुहूर्त रहेगा। दोपहर अभिजीत मुहूर्त में 11:38 से 12:26 के बीच भी कलश पूजन स्थापना कर सकते हैं।

गुरुवार से प्रारंभ हो रहे नवरात्र पर मुख्य रूप से शक्तिपीठ छोटी देवकाली, बड़ी देवकाली और जालपा मंदिर सहित अन्य देवी मंदिरों में आस्था का मेला होगा। ब्रह्म मुहूर्त से सभी मंदिरों के कपाट खोल दिए जाएंगे और सुबह से ही मां भक्तों का दर्शन करने के लिए पहुंचेंगे, जिसको लेकर मंदिरों में दर्शन व्यवस्था को लेकर व्यापक इंतजाम किए गए हैं। छोटी देवकाली मंदिर के पुजारी अजय द्विवेदी ने बताया कि नवरात्र को लेकर मंदिरों में विशेष व्यवस्था की गई है।
राम मंदिर के गर्भगृह में भी कलश स्थापना होगी

19 मार्च को राम मंदिर के गर्भगृह में भी सुबह विधि विधान से कलश स्थापना की जाएगी। 27 मार्च तक दुर्गा सप्तशती का पारायण पुजारी के द्वारा किया जाएगा। नवरात्र को लेकर रामलला को फलहार व्यंजनों का भोग लगाया जाएगा। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने तैयारी पूरी कर ली है। ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा ने बताया कि उत्सव को परंपरागत रूप से मनाए जाने के लिए तैयारी की गई है। अनुष्ठान के साथ-साथ राम मंदिर के गर्भगृह के निकट प्रतिदिन शाम को उत्सव में भजन और बधाई गायन का भी आयोजन किया जाएगा।

नवरात्र के पहले दिन ऐसे स्थापित करें कलश

नवरात्र पर पूजन के लिए विधि विधान से पूजन की परंपरा है। पंडित सुरेंद्रधर द्विवेदी बताते हैं कि नवरात्रि के प्रतिपदा पर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान ध्यान कर कलश, नारियल-चुन्नी, श्रृंगार का सामान, अक्षत, हल्दी, फल-फूल, मिष्ठान्न आदि यथासंभव सामग्री साथ रख लें। कलश, सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का हो। उस पर रोली से ॐ और स्वास्तिक बनाएं। पूजा आरंभ के समय ''''ऊं पुण्डरीकाक्षाय'''' नमः कहते हुए कुशा से अपने ऊपर जल छिड़कें। अपने पूजा स्थल से दक्षिण-पूर्व के कोने में घी का दीपक ''''ॐ दीपो ज्योतिः परब्रह्म दीपो ज्योतिः जनार्दनः। दीपो हरतु में पापं पूजादीप नमोस्तु ते।।'''' मंत्र बोलते हुए प्रज्ज्वलित करें।

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