Bareilly: सपा में PDA फॉर्मूले पर मंथन, नवरात्रि बाद मिलेगा ''सेनापति''

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
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बरेली, अमृत विचार। समाजवादी पार्टी में लंबे समय से भंग चल रही जिला कार्यकारिणी को लेकर अब इंतजार की घड़ियां समाप्त होने वाली हैं। पार्टी सूत्रों की मानें तो सपा हाईकमान नवरात्रि के बाद नए जिलाध्यक्ष के नाम की घोषणा कर सकता है। आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस बार अखिलेश यादव का पूरा जोर पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को जमीन पर उतारने पर है। पार्टी का लक्ष्य एक ऐसे चेहरे को कमान सौंपना है जो न केवल जातीय समीकरणों को साध सके, बल्कि बिखरे हुए कुनबे को भी एक सूत्र में पिरोकर सोशल इंजीनियरिंग के इस बड़े दांव को सफल बनाए।

जातीय समीकरणों पर नजर डालें तो यादव समाज से तीन प्रमुख नाम चर्चा के केंद्र में हैं। पूर्व जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव अपनी पुरानी सक्रियता और कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत पकड़ के कारण रेस में सबसे आगे माने जा रहे हैं। वहीं, पार्टी के प्रति अटूट निष्ठा रखने वाले पूर्व महासचिव योगेश यादव के नाम पर भी गहन मंथन चल रहा है, जो लंबे समय से संगठन के हर उतार-चढ़ाव में साथ रहे हैं। 

पार्टी इन चेहरों के माध्यम से पार्टी अपने आधार वोट बैंक को एकजुट रखने की रणनीति पर काम कर रही है। संजीव यादव को लेकर भी चर्चाए तेज हैं। वहीं, गैर-यादव चेहरों में पूर्व मंत्री भगवत शरण गंगवार का नाम सबसे वजनदार बनकर उभरा है। पूर्व जिलाध्यक्ष और पूर्व विधायक के रूप में उनका लंबा अनुभव उन्हें ''सेफ कार्ड'' के रूप में पेश करता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भगवत शरण एक ऐसा निर्विवाद चेहरा हैं जो जिले की गुटबाजी खत्म कर सबको साथ लेकर चल सकते हैं। पाल समाज में पैठ मजबूत करने के लिए राजकुमार पाल, कुर्मी समाज से मनोहर पटेल का नाम भी पार्टी नेताओं के बीच चर्चा में है, जो पीडीए के ''पिछड़ा'' घटक को मजबूती दे सकते हैं।

बहरहाल, हाईकमान इस बार किसी भी विवादित चेहरे से बचकर साफ-सुथरी छवि वाले अनुभवी सिपहसालार पर दांव लगाने की तैयारी में हैं। पार्टी सूत्र बताते हैं कि नए जिलाध्यक्ष की पहली चुनौती संगठन के रिक्त पदों को भरना और निष्क्रिय पड़े मोर्चों में नई जान फूंकना होगी। 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर अखिलेश यादव इस बार सोशल इंजीनियरिंग और जमीनी पकड़ को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि लखनऊ से जारी होने वाले आधिकारिक पत्र में पुराने अनुभव को तवज्जो मिलती है या किसी नए चेहरे को कमान सौंपकर चौंकाया जाता है। फिलहाल, दावेदारों की धड़कनें तेज हैं और सबकी नजरें नवरात्रि के समापन पर टिकी हैं।

तो इसलिए हो रही है देरी?
विगत विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बाद से ही जिला संगठन में बड़े बदलाव की प्रतीक्षा की जा रही थी। कार्यकारिणी भंग होने की वजह से कई बार जमीनी स्तर पर समन्वय की कमी भी देखी गई। माना जा रहा है कि इस बार प्रदेश नेतृत्व किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिए ''''क्लीन इमेज'''' और ''''अनुभव'''' को प्राथमिकता देगा।


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