संपादकीय: राज्यों से राष्ट्रीय संकेत 

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Published By Monis Khan
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देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया के अलावा राष्ट्रीय राजनीति के भविष्य की दिशा भी तय कर सकते हैं। लगभग साढ़े सत्रह करोड़ मतदाता 824 विधानसभा सीटों पर मतदान करेंगे। इन राज्यों से लोकसभा के 116 और राज्यसभा के 51 सदस्य आते हैं, इसलिए इनके नतीजों से मिले सियासी संकेत स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय सत्ता समीकरणों को प्रभावित करेंगे। 

चुनाव वाले राज्यों तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरलम, असम में सामाजिक संरचना, राजनीतिक परंपराएं और आर्थिक चुनौतियां भिन्न हैं, इसलिए मतदाताओं के मुद्दे भी अलग-अलग हैं। मतदाताओं के सामने मुख्य मुद्दों में बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक सुरक्षा, क्षेत्रीय पहचान और विकास का प्रश्न प्रमुख रहेगा। पिछले वर्षों में रोजगार के अवसरों में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई, जबकि जीएसटी संग्रह और विदेशी निवेश में शानदार बढ़ोतरी हुई। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि आर्थिक वृद्धि का लाभ आम नागरिक तक किस हद तक पहुंचा है, इसलिए इन चुनावों में मतदाता केवल वैचारिक नारों के बजाय रोज़गार, शिक्षा और बुनियादी सेवाओं जैसे ठोस मुद्दों पर वोट करते दिखाई दे सकते हैं। 

इन चुनावों के किसी दल या गठबंधन को अधिकतर राज्यों में निर्णायक जीत मिलती है, तो उसका प्रभाव लोकसभा और राज्यसभा की रणनीतियों में दिखाई देगा। क्षेत्रीय दलों की मजबूती भी राष्ट्रीय राजनीति में उनकी सौदेबाज़ी की क्षमता बढ़ा सकती है, फिलहाल राजनीतिक दृष्टि से कुछ राज्यों के मुकाबले दिलचस्प होंगे। तमिलनाडु में द्रविण मुनेत्र कषगम का लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटने का प्रयास हो अथवा पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस चौथी बार सत्ता में आने की चुनौती हो या फिर केरल में पारंपरिक सत्ता परिवर्तन की परंपरा को देखते हुए कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, मार्क्सवादी के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा और कांग्रेस के गठबंधन का सीधा संघर्ष यह देखने लायक होगा, तो वहीं असम और पुडुचेरी में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के सामने सत्ता बरकरार रखने की चुनौती भी दर्शनीय है। 

इन चुनावों के अलावा गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, नगालैंड और त्रिपुरा की आठ विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनावों से यद्यपि इनकी विधानसभाओं का संतुलन बहुत अधिक नहीं बदलेगा, लेकिन यह दलों की लोकप्रियता के संकेत अवश्य देंगे। इन चुनावों के संदर्भ में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर बहुतों को संदेह है, तो मतदाता सूची विशेष पुनरीक्षण प्रक्रियाओं में बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं नाम कटने के आरोप भी जायज हैं। ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। 

आयोग को पारदर्शिता, निष्पक्षता और समान अवसर सुनिश्चित करके यह साबित करना होगा कि चुनावी मैदान सभी दलों के लिए समान है। लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब भी होते हैं। यदि चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी रहती है तथा राजनीतिक दल विकास और जनकल्याण के वास्तविक मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करने वाला कदम होगा।