स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने किया 'चतुरंगिणी सेना' का गठन, परशु के साथ पीले वस्त्र में होंगे सैनिक

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Published By Deepak Mishra
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वाराणसी। ज्योतिष पीठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सोमवार को श्री विद्यामठ में गौ-माता, ब्राह्मण और अन्य सनातनी प्रतीकों की रक्षा तथा निर्बल सनातनियों की सहायता के लिए 'शंकराचार्य चतुरंगिणी' (शं.च.) सेना के गठन की औपचारिक घोषणा की। 

शंकराचार्य ने कहा कि वर्तमान संक्रमण काल में गौ-माता, विद्वान ब्राह्मण और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े निर्बल सनातनियों पर अत्याचार बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में केवल शास्त्र-चर्चा पर्याप्त नहीं है। भगवान परशुराम के अमर संकल्प को पुनर्जीवित करते हुए आज 'शंकराचार्य चतुरंगिणी' सेना के गठन की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। 

उन्होंने बताया कि यह सेना विशुद्ध रूप से धर्म-प्रतीकों की रक्षा और समाज के निर्बल सनातनियों की सहायता के लिए समर्पित होगी। सेना का मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज के भीतर भय को समूल नष्ट करना है ताकि किसी भी सनातनी को अन्याय का प्रतिकार करने या सत्य बोलने में तनिक भी संकोच न हो। 

सेना का संचालन प्राचीन भारतीय सैन्य विज्ञान के आधार पर नौ स्तरीय पदानुक्रम में होगा। पदनाम क्रमशः पत्तिपाल, सेनामुखपति, गुल्मपति, गणपति, वाहिनीपति, पृतनापति, अनीकिनीपति और महासेनापति होंगे। संगठन के सर्वोच्च शिखर पर एक 'शं.च. परमाध्यक्ष' होंगे, जिनके अधीन तीन 'शं.च. सर्वाध्यक्ष' (सह-सर्वाध्यक्ष एवं संयुक्त सर्वाध्यक्ष सहित) कार्य करेंगे। 

इसमें पुरुष, स्त्री और तृतीय लिंग के प्रतिनिधि शामिल होंगे। सेना को चार प्रमुख अंगों मनबल, तनबल, धनबल और जनबल में विभाजित किया गया है। मनबल के अंतर्गत संत, विद्वान, पुरोहित, वकील और मीडिया विभाग बौद्धिक मोर्चा संभालेंगे। तनबल के योद्धा मल्ल-युद्ध, लाठी, परशु, खड्ग और आधुनिक शस्त्र संचालन के माध्यम से प्रत्यक्ष रक्षा करेंगे। 

धनबल सेना का पोषक आधार होगा, जिसमें प्रकट दाता, अप्रकट दाता, भूमि-दाता, भवन-दाता और वस्तु-दाता शामिल हैं। ये प्रत्यक्ष सैन्य टुकड़ी का हिस्सा नहीं होंगे, बल्कि सेना संचालन हेतु संसाधन उपलब्ध कराएंगे। जनबल में सार्वकालिक, वार्षिक, मासिक, साप्ताहिक और दैनिक श्रेणी के स्वयंसेवक धर्म-सेवा में संलग्न रहेंगे।

सेना की सबसे बुनियादी कार्यकारी इकाई पत्तिपाल होगी, जो 10 योद्धाओं की टुकड़ी का नेतृत्व करेगी। शंकराचार्य ने मंगलकामना व्यक्त की कि यह चतुरंगिणी प्रत्येक सनातनी की 'अभिभावक' के रूप में कार्य करे और हिंदू समाज में भय को समाप्त करने में सक्षम बने। इस अवसर पर अनेक धार्मिक विद्वान, साधु-संत और समाजसेवी उपस्थित रहे।

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