विश्व रंगमंच दिवस : रंगमंच की साझा विरासत
हर साल 27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस मनाया जाता है। यह दिन उस कला का है, जो बिना किसी पर्दे के दर्शकों से आमने-सामने बात करती है। उत्तराखंड के नैनीताल में रहने वाले रंगकर्मी जहूर आलम को इस कला को आगे बढ़ाने के लिए साल 2023 में ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। उनका काम दिखाता है कि रंगमंच सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, संस्कृति और लोगों को जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है।
एक शुरुआत, जो धीरे-धीरे आंदोलन बन गई
युगमंच के बारे में बात करते हुए जहूर आलम बताते हैं कि साल 1976 में ‘युगमंच’ की शुरुआत हुई। युगमंच को शुरू करने का मकसद यह था कि पहाड़ की लोक परंपराएं, गीत-संगीत और कहानियां भी मंच तक पहुंचें। ‘अंधा युग’ के साथ इसकी शुरुआत हुई और उसी से ‘युगमंच’ नाम निकला। खास बात यह रही कि नाटक को उसी रूप में नहीं किया गया, बल्कि उसमें कुमाऊं की लोक शैली, संगीत और परंपराओं को भी जोड़ा गया। इससे नाटक लोगों के और करीब आ गए और युगमंच की एक अलग पहचान बनी।
जब मंच पर दिखने लगी अपनी ही दुनिया
जहूर आलम की हमेशा यह कोशिश रही कि युगमंच के नाटक लोगों के अपने अनुभवों से जुड़े हों। कुमाऊं की लोक गाथाएं, पहाड़ी संगीत और यहां के किस्से नाटकों का हिस्सा बने। उन्होंने आधुनिक और लोक रंगमंच को साथ मिलाकर काम किया, जिससे दर्शकों को मंच पर अपनी ही जिंदगी दिखाई देने लगी। जहूर कहते हैं कि होली में हुड़दंग बढ़ने लगा था, इसके बदलते स्वरूप को देखकर युगमंच ने पहल करते हुए बैठ और खड़ी होली को मंच पर लाने का प्रयास किया। उत्तराखंड के अलग-अलग स्थानों से कलाकार बुलाए गए और महिलाओं को भी मंच पर आने के लिए तैयार किया गया। नई पीढ़ी को सिखाने के लिए कार्यशालाएं की गईं। इसका असर यह हुआ कि नैनीताल की होली फिर से एक सलीकेदार सांस्कृतिक उत्सव की तरह सामने आई, जिसमें आज भी परंपरा और अनुशासन दोनों साथ दिखते हैं।
थिएटर के लिए जरूरी है सहारा
जहूर आलम यह भी मानते हैं कि रंगमंच को पेशे के रूप में मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कलाकारों को सम्मान के साथ काम करने के लिए आर्थिक और सामाजिक सहयोग मिलना चाहिए। तभी यह कला व मजबूत हो सकती है और नई पीढ़ी भी इसे अपनाएगी।
जहां लोग मिलते हैं, नहीं दिखते भेद
जहूर आलम का काम यह दिखाता है कि कला लोगों को जोड़ती है। एक मुस्लिम परिवार से होने के बावजूद उन्होंने होली जैसे आयोजन को पूरी ईमानदारी से आगे बढ़ाया। उनके लिए यह त्योहार साथ मिलकर रहने का सबसे उम्दा जरिया है। इतिहासकार शेखर पाठक भी कहते हैं कि जहूर ने उस साझा विरासत को आगे बढ़ाया है, जिसमें अलग-अलग धर्म और समुदाय के लोग साथ मिलकर अपनी संस्कृति को जीते हैं और आज के समय में धीरे-धीरे यह दुर्लभ होती जा रही है। पंचायत फेम अभिनेत्री सुनीता रजवार भी जहूर आलम और युगमंच को इसी नजर से देखती हैं। वह कहती हैं कि जहूर दा युगमंच में नाटकों के स्तंभ हैं और उन्होंने नैनीताल में रंगमंच की परंपरा को सहेज कर रखा है। उनके लिए युगमंच सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि परिवार की तरह है, जहां उन्होंने हमेशा दूसरों के लिए रास्ते बनाए।
सुनीता कहती हैं कि वह खुद भी उसी रास्ते से आगे बढ़ने वालों में से एक हैं। युगमंच के साथ पच्चीस साल से ज्यादा के अपने सफर को याद करते हुए नवीन बेगाना बताते हैं कि उनके पिता भी युगमंच से जुड़े थे। किशोरावस्था में वह अक्सर लड़ाई-झगड़ों में उलझे रहते थे। ऐसे समय में जहूर आलम ने उन पर भरोसा जताया और उन्हें युगमंच से जोड़ा। यही वह मोड़ था, जहां से उनकी जिंदगी ने नई दिशा ली। आगे चलकर नवीन ने ओपन यूनिवर्सिटी से संगीत की पढ़ाई की, शिक्षक बने और अपनी एक अलग पहचान बनाई। वह कहते हैं कि जहूर दा और युगमंच ने न सिर्फ नैनीताल का नाम आगे बढ़ाया, बल्कि थिएटर को जीवित और सक्रिय बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाई है। जहूर कहते हैं कि कई मौके ऐसे आए जब लोग बड़े शहरों की ओर गए, लेकिन उन्होंने यहीं रहकर काम करना चुना। उन्होंने खुद अभिनय और निर्देशन किया और नई पीढ़ी को तैयार किया। युगमंच से जुड़े कई कलाकार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और अन्य संस्थानों तक पहुंचे। कुछ ने मुंबई में अपनी अलग पहचान भी बनाई।
इंतखाब की दुकान, जहां रंगमंच सांस लेता था
जहूर आलम के लिए नैनीताल और रंगमंच क्या हैं, इसे स्मिता कर्नाटक की किताब ‘डीएसबी के गलियारों से’ के शब्दों में बेहतर समझा जा सकता है। वह लिखती हैं कि पहली बार वह नैनीताल के सांस्कृतिक अड्डे ‘इंतखाब’ में जहूर दा से मिलीं, जहां कपड़े की दुकान होने के बावजूद माहौल किसी साहित्यिक बैठक जैसा होता था। परिवार की सलाह पर उन्होंने कपड़े की दुकान जरूर खोली, लेकिन मन उनका रंगमंच में ही लगा रहा। काउंटर पर कपड़ा नापते हुए भी वह उसी दुनिया में रहते थे। ‘इंतखाब’ में दिनभर ग्राहकों से ज्यादा कवियों, लेखकों और कलाकारों का जमावड़ा लगा रहता। चाय और कॉफी के दौर चलते और उनके साथ गंभीर बातचीत भी। यह दुकान धीरे-धीरे एक सांस्कृतिक अड्डा बन गई, जहां से कई विचार और कलाकार आगे बढ़े। यही वह जगह थी, जहां से युगमंच से जुड़े कई कलाकार आगे निकले। निर्मल पांडे, ललित तिवारी, सुनीता अवस्थी, सुदर्शन जुयाल और इदरीस मलिक जैसे नाम इसी जमीन से जुड़े रहे। छोटे शहर के इस माहौल ने बड़े मंच तक पहुंचने वाले कलाकारों को रास्ता दिया।
जहूर आलम के लिए नाटक सिर्फ मनोरंजन नहीं है। उनका कहना है कि रंगमंच में जीवन के लगभग हर पहलू की झलक मिलती है, इसलिए यह लोगों तक सबसे असरदार तरीके से बात पहुंचाता है। उनके नाटकों में अक्सर ऐसे विषय होते हैं, जो समाज से जुड़े होते हैं और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं। युगमंच ने नुक्कड़ नाटकों के जरिए भी लोगों के बीच जाकर सामाजिक मुद्दों पर संवाद किया और रंगमंच को सीधे समाज से जोड़ा।-हिमांशु जोशी,लेखक
