संपादकीय: एकपक्षीय युद्धविराम

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Published By Monis Khan
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पश्चिम एशिया में जारी उथल-पुथल के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एकतरफा “पांच दिन के युद्ध विराम” की घोषणा कूटनीतिक पहल के अलावा कई स्तरों पर दबावों का परिणाम है। यह कदम उस समय आया है, जब इजराइल-ईरान तनाव अपने चरम पर है और वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति तथा सामरिक संतुलन सभी खतरे में हैं। 

ट्रंप के इस निर्णय के पीछे घरेलू राजनीतिक मजबूरियां साफ दिखाई देती हैं। अमेरिका में आगामी मिडटर्म चुनावों की आहट के बीच उनकी लोकप्रियता में गिरावट और संभावित महाअभियोग का खतरा उन्हें जोखिम लेने से रोक रहा है। रक्षा बजट, जो लगभग 19 लाख करोड़ रुपये के समकक्ष है, पर भी दबाव है। ऐसे में लंबा युद्ध अमेरिकी करदाताओं पर भारी पड़ सकता है, जिसे राजनीतिक रूप से उचित ठहराना कठिन होगा। 

दूसरी ओर इजराइल का ट्रंप के इस फैसले पर आश्चर्य जताना इस बात का संकेत है कि वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच इस मुद्दे पर पूर्ण सहमति नहीं है। इजराइल, जो ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले के बाद रणनीतिक बढ़त मान रहा था, किसी भी जल्दबाजी में युद्धविराम को अपने हितों के विरुद्ध मान सकता है। अतः यह स्पष्ट है कि अमेरिका की प्राथमिकताएं अब केवल इजराइल की सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक वैश्विक और घरेलू समीकरणों से प्रभावित हैं। 

ट्रंप का अपने पूर्व आक्रामक बयानों से यू-टर्न लेना भी कई संकेत देता है। खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा अवसंरचना के लगभग 40 प्रतिशत के प्रभावित होने से तेल की कीमतों में उछाल आया है। ताइवान में चिप उत्पादन बाधित होने की आशंका ने एप्पल और एनवीडिया जैसी अमेरिकी कंपनियों के हितों को भी खतरे में डाल दिया है। यह आर्थिक दबाव किसी भी सैन्य महत्वाकांक्षा पर भारी पड़ता है। इसके अतिरिक्त, नाटो और अन्य पश्चिमी सहयोगियों का सीमित समर्थन अमेरिका को “अकेले पड़ने” की स्थिति में ला सकता है। यूरोपीय देश पहले ही यूक्रेन संकट से थके हुए हैं और एक नए युद्ध में गहराई से शामिल होने को इच्छुक नहीं दिखते। ऐसे में ट्रंप का युद्ध विराम प्रस्ताव सामरिक पुनर्संतुलन का प्रयास भी हो सकता है।

अमेरिका-ईरान वार्ता में पाकिस्तान की मध्यस्थता और कतर, तुर्किये व मिस्र की सक्रिय भूमिका ने इस धारणा को चुनौती दी है कि भारत ही एकमात्र संतुलनकारी शक्ति है। हालांकि भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” और सभी पक्षों से संवाद की क्षमता उसे अब भी एक महत्वपूर्ण, अनौपचारिक भूमिका देती है। युद्धविराम की आशंकित असफलता हमारी ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य आपूर्ति और खाड़ी देशों में फंसे लाखों भारतीयों की सुरक्षित निकासी ली चुनौती बनेगी।

होर्मुज जलडमरूमध्य का संभावित बंदी भारत के लिए अस्वीकार्य होना स्वाभाविक है, हमारी लगभग 60 प्रतिशत तेल आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोकसभा में दी गई चेतावनी इस मामले में संकेत है कि हमें वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाएं, सामरिक तेल भंडार और आपातकालीन निकासी योजनाओं को तुरंत सक्रिय करना होगा। इसमें ऊर्जा विविधीकरण, कूटनीतिक सक्रियता, रक्षा सतर्कता और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करना शामिल है। भारत को इस अनिश्चितता के दौर में अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए संतुलित, व्यावहारिक और दूरदर्शी नीति अपनानी होगी।