घरों में रखा है 10 हजार अरब डॉलर का सोना ! वित्तीय प्रणाली में लाने से देश को होगा फायदा 

Amrit Vichar Network
Published By Virendra Pandey
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नयी दिल्ली : भारत को घरों में रखे सोने के भंडार को वित्तीय प्रणाली में लाया जाना चाहिए। पूर्व केंद्रीय मंत्री पी.पी. चौधरी और बाजार के वरिष्ठ अधिकारियों ने बुधवार को यह बात कही और तर्क दिया कि भौतिक रूप से सोना जमा रखने से आर्थिक वृद्धि में उसकी भूमिका सीमित रह जाती है। संसद की वित्त पर स्थायी समिति के सदस्य चौधरी ने कहा कि सोने के अधिक वित्तीयकरण से भारत की सर्राफा आयात पर निर्भरता कम हो सकती है और चालू खाते के घाटे (कैड) पर दबाव घट सकता है। 

उद्योग मंडल एसोचैम के एक कार्यक्रम में यहां उन्होंने कहा कि रत्न एवं आभूषण क्षेत्र पहले ही देश के कुल माल निर्यात में करीब 15 प्रतिशत योगदान देता है और करीब 50 लाख लोगों को रोजगार प्रदान करता है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के मुख्य कारोबार विकास अधिकारी श्रीराम कृष्णन ने कहा कि भारत के घरों तथा मंदिरों में मिलाकर कुल 50,000 टन सोना है जिसकी कीमत करीब 10,000 अरब डॉलर आंकी जाती है और इसका बड़ा हिस्सा औपचारिक वित्तीय प्रणाली से बाहर है। उन्होंने सरकार से इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (ईजीआर) के माध्यम से सोने के वित्तीयकरण में आने वाली बाधाओं को दूर करने का आग्रह करते हुए कहा, '' हमारे पास मंच है, क्षमता है एवं प्रौद्योगिकी भी है।'' ईजीआर, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) समर्थित एक साधन है जिसके तहत उपभोक्ता भौतिक सोना जमा कर उसे शेयर की तरह स्टॉक एक्सचेंज पर कारोबार के लिए उपयोग कर सकते हैं।

कृष्णन ने कहा कि ईजीआर ढांचे के तहत सोना जमा करने पर लगने वाला तीन प्रतिशत माल एवं सेवा कर (जीएसटी) इसके व्यापक उपयोग में सबसे बड़ी बाधा है। इस समस्या के समाधान के लिए एनएसई ने एक श्वेत पत्र भी प्रस्तुत किया है। रेटिंग एजेंसी इक्रा लिमिटेड के वरिष्ठ उपाध्यक्ष जितिन मक्कड़ ने कहा कि पिछले दो वित्त वर्ष में सोने की कीमतों में लगभग 30-30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसके कारण सोने को वित्तीय प्रणाली में लाने पर चर्चा हो रही है। उन्होंने कहा कि कीमतों में तेज बढ़ोतरी के बावजूद आभूषणों की मांग मजबूत बनी हुई है। प्रमुख खुदरा विक्रेताओं ने दो अंक की राजस्व वृद्धि दर्ज की है और वित्त वर्ष 2024-25 तथा 2025-26 में अपनी दुकानों की संख्या में लगभग 20 प्रतिशत विस्तार किया है। मक्कड़ ने बताया कि बैंकों एवं गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले 'गोल्ड लोन' का जोखिम हाल के वर्षों में लगभग एक लाख करोड़ रुपये से बढ़कर चार लाख करोड़ रुपये हो गया है। उन्होंने कहा कि अनिवार्य हॉलमार्किंग और 'इंडियन गुड डिलिवरी स्टैंडर्ड' जैसे नियामकीय कदमों से देश में उत्पादित सर्राफा पर भरोसा बढ़ा है जिससे कुछ हद तक आयात पर निर्भरता भी कम हुई है। 

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