सहारनपुर में शुरु हुआ त्रिपुर मां बाला देवी सुंदरी मेला, दुकानें, झूले तथा खेल-तमाशे आकर्षण का केंद्र

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Published By Anjali Singh
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देवबंद। उत्तरी भारत का प्रसिद्ध श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी मेला देवबंद में मंगलवार शाम उद्घाटन के साथ शुरू होगा। नगर पालिका परिषद देवबंद के तत्वावधान में सैकड़ों वर्षों से लगने वाला यह मेला 19 अप्रैल तक चलेगा। नगर पालिका अध्यक्ष विपिन गर्ग ने बताया कि मेले को आकर्षक और सुव्यवस्थित बनाने के लिए सभासद एवं अधिवक्ता विपिन त्यागी को मेला चेयरमैन बनाया गया है। 

मेला चेयरमैन विपिन त्यागी ने बताया कि सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और इस बार पिछले वर्षों की तुलना में अधिक दुकानें, झूले तथा खेल-तमाशे आकर्षण का केंद्र होंगे। उन्होंने बताया कि इस बार भगवती जागरण को छोड़कर अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसे कवि सम्मेलन, मुशायरा, कव्वाली आदि आयोजित नहीं किए जाएंगे। इसका कारण दर्शकों की घटती रुचि और आयोजनों के लिए प्रायोजकों की कमी बताया गया है। 

उन्होंने कहा कि मेले का मुख्य उद्देश्य इसकी धार्मिक एकता और परंपरा को बनाए रखना है, साथ ही श्रद्धालुओं, ग्रामीणों और व्यापारियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना है। मेले का उद्घाटन जिलाधिकारी मनीष बंसल और एसएसपी अभिनंदन सिंह करेंगे, जबकि क्षेत्रीय विधायक एवं राज्यमंत्री बृजेश सिंह मुख्य अतिथि रहेंगे। देवबंद स्थित बाला सुंदरी देवी मंदिर सदियों से सामाजिक समरसता का प्रतीक रहा है। 

यहां सभी वर्गों, विशेषकर दलित और पिछड़े समुदाय के लोगों को पूजा-अर्चना की पूरी स्वतंत्रता रही है और मेले में उनकी सक्रिय भागीदारी देखी जाती है। यह मेला, जिसे 'चमार चौदस' के नाम से भी जाना जाता है, सामाजिक समन्वय का अनूठा उदाहरण है, जिसमें विभिन्न समुदायों के लोग मिलकर उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले इस मेले की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। 

मान्यता है कि यह स्थल देवी वन के नाम से प्रसिद्ध रहा है और पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान यहां समय बिताया था। मंदिर परिसर के सामने स्थित सरोवर और प्राकृतिक वातावरण श्रद्धालुओं को विशेष आकर्षित करते हैं।

मंदिर से जुड़ी एक विशेष मान्यता यह भी है कि यहां स्थापित देवी की प्रतिमा स्वयं प्रकट हुई थी और इसे विशेष तरीके से ढककर रखा जाता है, जिसके प्रत्यक्ष दर्शन संभव नहीं होते। देवबंद का यह मेला आज भी आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है, जिसमें हर वर्ग और समुदाय के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। 

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