ऋषियों की तपोभूमि चंदौली है प्राचीन काशी
पूर्वी उत्तर प्रदेश की पावन भूमि पर स्थित चंदौली जनपद को सामान्यतः आधुनिक प्रशासनिक इकाई के रूप में देखा जाता है, किंतु इतिहास, पुरातत्व और आध्यात्मिक परंपराओं की दृष्टि से यह क्षेत्र प्राचीन काशी परंपरा का अविभाज्य अंग रहा है। काशी केवल वर्तमान वाराणसी तक सीमित नहीं रही, अपितु प्राचीन काल में इसका सांस्कृतिक-धार्मिक विस्तार चंदौली, मिर्जापुर, सोनभद्र और गाजीपुर तक फैला हुआ था। मां गंगा ने संगम नगरी प्रयागराज के पश्चात विन्ध्य पर्वत को छूते हुए वाराणसी के दक्षिण दिशा से बाबा विश्वनाथ मंदिर वाले भाग काशी को अपनी गोद में लिया, तो तपस्थली वाले भाग प्राचीन काशी चंदौली को भी गाजीपुर के पूर्व ही उत्तर दिशा से काशी के दोनों संपूर्ण भाग को सामान्य रूप से गौरवान्वित किया है।
प्राचीन काशी चंदौली के भौगोलिक मानचित्र पर ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व के रसूलपुर से वैराठ तक आज भी विद्यमान है। इसकी महत्ता पौराणिक ग्रंथों में विधिवत वर्णित है। यहां ऋ षियों की तपोभूमि, शिव-शक्ति उपासना और वैदिक संस्कृति की सशक्त छाप आज भी विद्यमान है। चंदौली का नाम चंद्रसाह नामक बरहौलिया राजपूत के नाम पर बताया जाता है, जिन्होंने यहां एक किला बनवाया था।
चंदौली की प्राचीनता
यह पूरा जिला काशी राज्य के अधिकार में था। इस जिले से संबंधित अनेक कथाओं के अतिरिक्त यहां प्राचीनकाल की मूल्यवान धरोहरों के प्रमाण पाए गए हैं। ईंट आदि के अवशेष जहां-तहां बिखरे पड़े हैं, अनेक तालाब और कुंड हैं। एक बहुत प्राचीन क्षेत्र बलुआ है, जो सकलडीहा तहसील से 22 किलोमीटर दक्षिण गंगा नदी के तट पर स्थित है। यहां हिंदुओं का एक धार्मिक मेला हर वर्ष माघ महीने में मौनी अमावस्या के दिन लगता है। यह पश्चिम वाहिनी मेला के नाम से जाना जाता है।
सकलडीहा तहसील का गांव एक महान अघोरेश्वर संत कीनाराम की जन्मभूमि है। वे वैष्णव धर्म के अनुयायी थे, इनका शिव और शक्ति में गहरा विश्वास था। हेतमपुर गांव एक प्राचीन स्थान है, यहां एक किला है, जिसे ‘हेतमपुर किला’ कहा जाता है। कहा जाता है कि इसको 14 वीं - 15 वीं शताब्दी के बीच राजा टोडरमल के द्वारा निर्मित कराया गया था,जो शेरशाह सूरी के राज्य में निर्माण पर्यवेक्षक थे। मुगलकाल के बाद जागीरदार हेतमखां ने इस पर कब्जा कर लिया।
20.jpg)
चंदौली के राजदरी, देवदरी, चन्द्रप्रभा क्षेत्र तथा आसपास की पहाड़ियों में शैलचित्र, पत्थर के औजार और गुफाएं मिली हैं। ये प्रमाण बताते हैं कि यहां आदिम मानव निवास करता था और यह क्षेत्र जीवन, साधना और प्रकृति-पूजा का केंद्र था। चंदौली का चौसठी देवी क्षेत्र, चन्द्रप्रभा वन्य क्षेत्र और आसपास के स्थल बौद्ध काल में भी महत्वपूर्ण रहे। समीप स्थित सारनाथ से इसका सीधा सांस्कृतिक संबंध रहा। बौद्ध भिक्षु ध्यान और साधना हेतु इन वनों में निवास करते थे।
मोक्षदायिनी नगरी
‘काश्यां मरणान्मुक्तिः’ काशी की यह आध्यात्मिक ऊर्जा केवल एक नगर तक सीमित नहीं थी। चंदौली उस ऊर्जा का वनांचली और तपस्वी स्वरूप रहा। चंदौली क्षेत्र में शिवलिंगों, देवी मंदिरों और शक्ति स्थलों की प्राचीन परंपरा है। यहां की लोक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने काशी क्षेत्र की रक्षा हेतु इन वनों में विचरण किया। चंदौली में स्थित चन्द्रप्रभा नदी और वन क्षेत्र को अत्यंत पवित्र चंद्रप्रभा तीर्थ के माना जाता है। यहां स्थित जलप्रपात और कुंडों को प्राचीन काल में तपस्या और स्नान के लिए श्रेष्ठ माना गया। यह स्थान केवल प्राकृतिक सौंदर्य ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक शांति का केंद्र रहा है।
चंदौली है ऋषियों की तपोभूमि
चंदौली भूभाग पर हजारों वर्षों से अब तक ऋ षि-महर्षियों के तप करने का प्रमाण उपलब्ध है। गंगा नदी के तटों से लेकर वाणगंगा और चकिया नौगढ़ के जंगलों तक विस्तृत यह क्षेत्र सभी दृष्टिकोण से सुरक्षित और शांतिप्रिय रहा है, जहां सैकड़ों वर्षों तक एक मुद्रा में बैठे ऋ षि-मुनियों ने साधना की। प्राचीन काशी में ही महर्षि याज्ञवल्क्य को चकिया के पठारी तथा जंगली क्षेत्र की शांति खींच लाई थी। जहां उन्होंने एक पैर पर खड़े होकर सैकड़ों वर्ष तपस्या किया। भगवान शंकर से नाराज होकर महर्षि वेदव्यास ने प्राचीन काशी (चंदौली) के साहूपुरी (व्यासनगर) में आए, जहां अपना क्रोध - त्याग किया और वहीं साधना करने लगे। महर्षि विश्वामित्र ने अपनी कर्मस्थली और लीलास्थली नौगढ़ क्षेत्र को बनाया, इसका प्रमाण कर्मनाशा के रूप में विस्तृत है। महाराज दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कहानी इसी भूभाग से जुड़ी है, जहां मगरौर में महाराज भरत के जन्म का प्रमाण मिलता है, इनके नाम पर ही इस देश का नाम भारत पड़ा। विद्वानों का यह भी मानना है कि इस समृद्ध क्षेत्र में कभी हैहयवंशी क्षत्रियों के संहार हेतु यमदग्नि-पुत्र परशुराम ने अशांति फैलायी थी, जिसका प्रमाण रायल ताल को माना जाता है।
लोक आस्थाएं एवं परंपराएं
19.jpg)
चंदौली की ग्राम्य संस्कृति में आज भी काशी की परंपराएं जीवित हैं। श्रावण मास की शिव पूजा, कार्तिक स्नान, लोक देवी-देवताओं की आराधना, संस्कारों में वैदिक मंत्रोच्चार यह सब दर्शाता है कि चंदौली केवल भौगोलिक इकाई नहीं, अपितु यहां के लोक जीवन में आध्यात्मिक निरंतरता व्याप्त है। चंदौली की लोक संस्कृति में काशी की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। यहां की भोजपुरी-काशी बोली में राम, शिव, गंगा और काशी से जुड़े असंख्य लोकगीत प्रचलित हैं। विवाह, जन्म और पर्वों पर गाए जाने वाले गीतों में काशी को पुण्य स्थल के रूप में स्मरण किया जाता है। यहां के शिवरात्रि मेले,नवरात्र उत्सव, कार्तिक पूर्णिमा आदि आयोजनों में काशी परंपरा की झलक मिलती है।
चंदौली का वर्तमान स्वरूप
आज का चंदौली जनपद आध्यात्मिक विरासत और आधुनिक विकास के संतुलन का उदाहरण है। वाराणसी से 20 मई, 1997 में अलग होकर चंदौली जनपद बना। यह उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित है, जो वाराणसी से 30 किलोमीटर दूरी पर है। यह जनपद वाराणसी, मिर्जापुर, सोनभद्र से घिरा हुआ है, जो इसके ऐतिहासिक-धार्मिक महत्व को और पुष्ट करता है। चंदौली को उत्तर प्रदेश का ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है। उपजाऊ भूमि, नहर प्रणाली, कर्मनाशा और चन्द्रप्रभा के जल से परिपूरित यह क्षेत्र कृषि के साथ-साथ अब औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों की ओर भी बढ़ रहा है। यहां पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। यहां चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य, जलप्रपात, ऐतिहासिक स्थल और अनेक धार्मिक स्थल पर्यटकों के आकर्षण के केंद्र हैं। यदि इनका समुचित विकास किया जाए, तो चंदौली आध्यात्मिक-पर्यटन मानचित्र पर विशेष स्थान प्राप्त कर सकता है। चंदौली और काशी का पुराना अटूट संबंध है। जहां काशी (वाराणसी) ज्ञान, मोक्ष और चेतना का केंद्र रही, वहीं चंदौली उसका वन्य, तपस्वी और प्राकृतिक विस्तार क्षेत्र कहा जा सकता है। चंदौली ने काशी की आत्मा को अपने वनों, नदियों, लोक जीवन और आस्थाओं में सुरक्षित रखा है। आज आवश्यकता है कि इस विरासत को पहचाना जाए, संरक्षित किया जाए और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाए। चंदौली केवल एक जनपद नहीं, अपितु यह प्राचीन काशी की जीवित स्मृति है।-गौरीशंकर वैश्य विनम्र
