संपादकीय: सफाए के बाद सवाल
गृहमंत्री अमित शाह ने देश को नक्सलियों से मुक्त होने के घोषणा कर दी। 24 अगस्त 2024 को उन्होंने प्रण लिया था कि 31 मार्च तक वे देश से नक्सल समस्या का खात्मा कर देंगे और उसके एक दिन पहले लोकसभा में यह घोषणा की। निःसंदेह देश में अब भी दो प्रमुख नक्सली कमांडर, कुछ एरिया कमेटियां और चंद नक्सली बाकी हैं। जल्द ही इनकी भी गिरफ्तारी, समर्पण अथवा खात्मा होने के बाद आधिकारिक तौर पर यह कहा जा सकता है कि दुनिया का सबसे लंबे समय से चल रहा माओवादी उग्रवाद का अवसान हो चुका है।
निश्चित तौर पर छह दशक से चल रही, इस समस्या के निवारण का श्रेय केंद्रीय गृहमंत्री को जाता है, जिनकी नीति अनुसार सुरक्षाबलों, जंगलों में गुरिल्ला लड़ाई के लिए विशेष प्रशिक्षित बलों, राज्य की पुलिस इकाइयों ने मिलकर उस काम को अंजाम दिया, जो कुछ ही बरस पहले तकरीबन असंभव माना जा रहा था। 2019 से 2026 के बीच 7049 नक्सली गिरफ्तार किए गए और 5880 ने आत्म समर्पण किया।
गृहमंत्री के प्रण के बाद तेलंगाना-छत्तीसगढ़ सीमा पर 23 मई 2025 को ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ के दौरान कई हार्डकोर नक्सलियों की मौत ने उनकी कमर तोड़ दी। इसी साल कई कमांडरों के साथ 317 नक्सली मारे गए, 800 पकड़े और 2300 ने सरेंडर किया। सुरक्षा बलों ने 2024 के बाद से 748 गुरिल्लों को मार कर कीर्तिमान बनाया। इन सबके चलते बीते महीने तक, माओवादी गतिविधियों वाले जिलों की संख्या 800 से घटकर केवल सात रह गई।
इस बरस के पहले तीन महीनों में ही तकरीबन 700 नक्सलवादी हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे। सरकार के प्रलोभन और प्रताड़ना, पुचकारने और फटकारने वाली नीति भी सफल रही। उसने पिछड़े जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, बैंकिंग और मोबाइल कनेक्टिविटी मिशन चलाया। सख्ती बढ़ाने के साथ नक्सलियों के लिए सरेंडर और रिहैबिलिटेशन पॉलिसी, नकद प्रोत्साहन का लालच, नौकरी, कौशल प्रशिक्षण की बात की और समझा दिया कि अन्याय का समाधान संविधान में है, हथियार में नहीं। इन सबका फलितार्थ आज सामने है और नक्सलवाद की बस चंद सांसें ही बची हैं।
इस समाधान के पश्चात भी कुछ सवाल शेष हैं। क्या ‘जंगल राज’ के अंत के बाद आदिवासी क्षेत्रों में ‘न्याय का राज’ स्थापित होगा, या उसकी जगह ‘खनन राज’ ले लेगा? देश के लगभग 40 प्रतिशत खनिज भंडार आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्थित हैं और स्वतंत्रता के बाद विकास परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों लोगों के विस्थापन का इतिहास हमारे सामने है, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासियों की ही है।
नक्सलवाद के खात्मे के बाद इन क्षेत्रों में केवल सड़कें, खदानें और उद्योग ही दिखाई दें और सामाजिक न्याय, स्थानीय भागीदारी न आए, तो इस शांति के स्थायित्व पर शंका बनी रहेगी। यदि विकास आदिवासियों की सहमति और भागीदारी के बिना थोपा गया, तो यह असंतोष को जन्म दे सकता है और बेशक उपेक्षा और अन्याय विद्रोह की जमीन तैयार करते हैं। नक्सल विचारधारा से सहानुभूति रखने वाले ग्रामीण और आदिवासी अभी मौजूद हैं, इसलिए नक्सलवाद भले मरे पर विचारधारा जिंदा रही, तो वह फिर हिंसक या अहिंसक रूप सामने आ सकती है।
