संपादकीय: भगवान भरोसे भीड़
बिहार के नालंदा जिले में मघड़ा गांव में स्थित प्राचीन शीतला माता मंदिर में हुई भगदड़ की घटना महज एक ‘दुर्घटना’ नहीं, बल्कि व्यवस्थागत पंगुता और प्रशासनिक संवेदनहीनता का जीवंत प्रमाण है। 8 महिलाओं की मृत्यु और 15 से अधिक का घायल होना यह सवाल उठाता है कि क्या आधुनिक भारत में नागरिक के जीवन का मूल्य केवल कुछ हजार रुपयों के मुआवजे तक सिमट कर रह गया है? इस त्रासदी का मुख्य दोषी पंडा कमेटी और स्थानीय पुलिस-प्रशासन का वह ‘अहंकारी समन्वय’ है, जिसने 25 हजार की भीड़ को भगवान भरोसे छोड़ दिया।
पंडा कमेटी का पुलिस से सुरक्षा की मांग न करना उनकी अक्षमता और वर्चस्ववादी सोच को दर्शाता है, लेकिन क्या प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से केवल इसलिए पल्ला झाड़ सकता है कि उसे व्यवस्था प्रबंध हेतु ‘आमंत्रण’ नहीं मिला? खुफिया विभाग और स्थानीय पुलिस को हर साल चैत्र के आखिरी मंगलवार को जुटने वाली इस भीड़ का पूर्वानुमान क्यों नहीं था? क्या पुलिस इतनी दिशाहीन हो गई है कि उसे 25,000 लोगों के जमावड़े की आहट तक नहीं मिली? सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति सुरक्षा प्राथमिकताओं की है।
जिस दिन यह त्रासदी हुई, उसी दिन राष्ट्रपति की सुरक्षा में 2,500 पुलिसकर्मी तैनात थे, जबकि मंदिर में 25,000 आम नागरिकों के लिए एक भी नहीं। यह ‘अतिविशिष्ट’ बनाम ‘आम जनता’ का वह असंतुलन है, जो लोकतंत्र के मूल ढांचे पर प्रहार करता है। घटना के बाद कुछ अधिकारियों का निलंबन मात्र प्रशासनिक ‘खानापूरी’ है, जिससे मूल समस्याओं का समाधान नहीं होता। एंबुलेंस और सहायता में देरी यह पुष्टि करती है कि आपदा प्रबंधन की योजनाएं केवल कागजों तक सीमित हैं। देश में मंदिरों और बाबाओं के समागमों में होने वाली भगदड़ की घटनाओं में पिछले कुछ बरसों में 12,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। सत्य है कि आस्था भीड़ लाती है, लेकिन सच यह भी है कि प्रशासन को उस भीड़ का प्रबंधन करना होता है। हर विफलता के बाद शासन-प्रशासन अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर डालकर बच निकलता है।
इन हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए केवल संवेदना प्रकटीकरण या मुआवजा पर्याप्त नहीं है। हमें एक ‘राष्ट्रीय भीड़ प्रबंधन प्रोटोकॉल’ की आवश्यकता है। हर धार्मिक स्थल की एक ‘वहनीय क्षमता’ तय होनी चाहिए। भीड़ बढ़ने पर ‘होल्डिंग एरिया’ का निर्माण और प्रवेश पर नियंत्रण अनिवार्य हो। ड्रोन और सीसीटीवी के माध्यम से वास्तविक समय में भीड़ की घनत्व की निगरानी की जानी चाहिए ताकि ‘क्राउड क्रिटिकल पॉइंट’ की पहचान पहले ही हो सके। धार्मिक समितियों और पुलिस के बीच एक अनिवार्य समन्वय केंद्र हो, जहां बिना किसी औपचारिक मांग के भी पुलिस तैनाती सुनिश्चित की जाए।
तंग जगहों पर स्थित मंदिरों में ‘वन-वे’ प्रवेश और निकास के साथ आपातकालीन निकासी मार्ग की सख्त व्यवस्था होनी चाहिए। समाज और सरकार को यह समझना होगा कि व्यवस्था की कमी से होने वाली मौतें ‘ईश्वर की इच्छा’ नहीं, बल्कि ‘मानवीय भूल’ हैं। यदि हमने आदिवासी नक्सल प्रभावित जैसे दुर्गम क्षेत्रों में डिजिटल व्यवस्था पहुंचा दी है, तो हम अपने तीर्थस्थलों पर बुनियादी सुरक्षा ढांचा क्यों नहीं विकसित कर सकते? आस्था का सम्मान तभी होगा जब श्रद्धालु सुरक्षित घर लौट सकें।
