निकोबारी मेगापोड- विकास में विलुप्त होती विरासत

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

प्रकृति की प्रयोगशाला का वह बेजोड़ पक्षी, जो अपनी चोंच से घोंसले की तपिश मापता है और अंडों को सेने के लिए देह की गर्मी नहीं, बल्कि वनस्पतियों की जैविक ऊर्जा का उपयोग करता है। कभी सुनामी के संकट से तो कभी ‘विकास’ की दौड़ से, कैसे अपनी ही ज़मीन पर बेगाना-सा हो रहा है निकोबारी मेगापोड? 2026 के नवीनतम शोध में मात्र 4.5% रह गए पर्यावास में अस्तित्व की आखिरी जंग लड़ती इस दुर्लभ विरासत की विशेष पड़ताल।

कल्पना कीजिए एक ऐसे पक्षी की जिसे किसी द्वीप के तटवर्ती जिले ने अपनी लोकतांत्रिक पहचान चुनाव शुभंकर के रूप में चुना हो, ताकि मतदाता जागरूक हों और मतदान प्रतिशत को बढ़ाया जा सके, लेकिन विडंबना यह है कि जिस जीव को हमने लोकतंत्र का प्रतीक बनाया उसका अपना अस्तित्व ही आज विकास और विनाश के बीच झूल रहा है। यह कहानी है अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के एक अनोखे, शर्मीले लेकिन अद्भुत इंजीनियर निकोबारी मेगापोड की इसे 2024 के लोकसभा चुनावों में निकोबार के लिए चुनावी शुभंकर बनाया गया था।  -डॉ. कैलाश चंद सैनी

प्राकृतिक हीटर और मिट्टी के महल

‘मेगापोड’ का अर्थ है - बड़े पैरों वाला, लेकिन इसकी असली पहचान इसके पैर नहीं, बल्कि असाधारण इंजीनियरिंग क्षमता है। यह पक्षी अन्य पक्षियों की तरह अंडों को सेने के लिए उन पर नहीं बैठता। एक जोड़ा मिलकर लगभग 4 से 5 मीटर व्यास और 2 मीटर तक ऊंचे टीले का निर्माण करता है जो रेत, मिट्टी और सूखी पत्तियों का एक विशाल टीला होता है। सूखी पत्तियों के अपघटन (सड़ने) से उत्पन्न ऊष्मा ही इसके अंडों को सेने का काम करती है। यह व्यवहार इसे दुनिया के अन्य पक्षियों से बिल्कुल अलग और विशेष बनाता है। निकोबार के आदिवासी इसे ‘कुआउ’ के नाम से भी पुकारते हैं। 

इसका टीलेनुमा घोंसला ही एक तरह का प्राकृतिक इनक्यूबेटर है। अंडों के विकास के लिए टीले के अंदर का तापमान 32 से 34 डिग्री सेल्सियस के बीच होना आवश्यक है। जरा-सी भी ऊंच-नीच अंडों को नष्ट कर सकती है। यहाँ नर मेगापोड दिन में कई बार अपनी चोंच को टीले की गहराई में डालकर तापमान की जांच करता है। उसकी चोंच में मौजूद तंत्रिकाएं एक डिजिटल थर्मामीटर से भी अधिक सटीक होती हैं। तापमान बढ़ने पर वह टीले की ऊपरी परत हटाकर गर्मी बाहर निकाल देता है। तापमान कम होने पर अधिक गीली पत्तियां और मिट्टी ऊपर चढ़ा देता है। तापमान का यह संतुलन बनाए रखना किसी चमत्कार से कम नहीं है।

सिकुड़ती दुनिया: 2026 का वैज्ञानिक सच

वन्यजीव संस्थान के 2026 के नवीनतम शोध इस पक्षी के भविष्य को लेकर गंभीर चेतावनी देते हैं:

सीमित आवास: निकोबार द्वीप समूह के कुल क्षेत्रफल का मात्र 4.5% (लगभग 79.30 वर्ग किमी) क्षेत्र ही इसके पर्यावास के लिए उपयुक्त बचा है।

समुद्र पर निर्भरता: इसके 97% घोंसले (टीले) समुद्र तट से मात्र 100 मीटर के भीतर पाए जाते हैं।

मुख्य आश्रय: ग्रेट निकोबार द्वीप इसका सबसे बड़ा गढ़ है, जहाँ लगभग 31.39 वर्ग किमी उपयुक्त क्षेत्र मौजूद है। ये आँकड़े इस ओर संकेत देते हैं कि इसका अस्तित्व एक बेहद संकीर्ण भौगोलिक दायरे में सिमट चुका है।

सुनामी की मार और विकास का दबाव

2004 की विनाशकारी सुनामी ने इस पक्षी प्रजाति को गहरा आघात पहुँचाया जिससे इसकी आबादी में 71% तक गिरावट दर्ज की गई। हालांकि प्रकृति के इस प्रहार से उबरने की कोशिशें जारी थीं, लेकिन अब मानव-निर्मित विकास परियोजनाएँ ही इसके लिए एक नये संकट के रूप में सामने आई हैं। पत्रिका फ्रंटलाइन की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित निर्माण कार्यों के चलते इस पक्षी के लगभग 80% प्रजनन स्थल खतरे में हैं। इसके अलावा, द्वीपों पर मनुष्यों द्वारा पाले गए कुत्तों, बिल्लियों और सूअरों ने इनके अंडों और चूजों को भारी नुकसान पहुँचाया है। सड़क निर्माण और तटीय विकास के कारण इनके प्राकृतिक आवास सिमटते जा रहे हैं। मानवीय हस्तक्षेप का इतना व्यापक असर हो रहा है कि यह पक्षी कार निकोबार और चौरा द्वीप जैसे क्षेत्रों से लगभग विलुप्त हो चुका है।

सुपर-कमांडो चूजों की अद्भुत आत्मनिर्भरता  

मेगापोड के चूजे पक्षी जगत में जिजीविषा के अनोखे जीव माने जाते हैं। अंडे से निकलने के बाद वे टीले की गहराई में दबे होते हैं और उन्हें बाहर निकलने के लिए स्वयं ही रास्ता खोदना पड़ता है। ये ‘सुपर-प्रिकॉशियल’ होते हैं अर्थात जन्म के तुरंत बाद पूरी तरह आत्मनिर्भर। इन्हें न तो माता-पिता की देखरेख की जरूरत होती है और न ही ही किसी शिक्षण-प्रशिक्षण की। ये चूजे 24 घंटे के भीतर उड़ने और भोजन खोजने में सक्षम हो जाते हैं।

संरक्षण: नीति के साथ ही नीयत भी यह पक्षी हमें सिखाता है कि प्रकृति में ऊर्जा के कैसे-कैसे स्रोत छिपे हैं। निकोबारी मेगापोड केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता इकोसिस्टम है। इसके द्वारा बनाए गए टीलों का उपयोग अक्सर अन्य जीव भी अपने लाभ के लिए करते हैं। इसे बचाना केवल एक प्रजाति को बचाना नहीं, बल्कि निकोबार की प्राचीन प्राकृतिक विरासत को बचाना है।

निकोबारी मेगापोड केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि द्वीपों की पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग है। सरकार ने इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत उच्चतम सुरक्षा प्रदान की है, लेकिन इसकी संकटग्रस्त स्थिति को देखते हुए इसकी कागज़ी सुरक्षा पर्याप्त नहीं है। इसका वास्तविक संरक्षण तभी संभव है, जब विकास योजनाओं में पारिस्थितिक संवेदनशीलता को केंद्र में रखा जाए और स्थानीय जैव-विविधता को प्राथमिकता दी जाए।

लोकतंत्र की असली परीक्षा

आज विकास का एक ऐसा मॉडल चुना जाना चाहिए जिसमें प्रकृति और प्रगति साथ-साथ चल सकें। यदि हम इस ‘चुनावी शुभंकर’ को बचाने में सफल होते हैं, तो यह केवल एक प्रजाति का संरक्षण नहीं, बल्कि यह हमारी वैज्ञानिक समझ, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक परिपक्वता की सच्ची और सार्थक जीत होगी। - डॉ. कैलाश चन्द सैनी, वन्य जीव लेखक जयपुर -  302004