अनोखी परंपरा: रामनामी समुदाय, शरीर पर अंकित आस्था की संस्कृति

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

भारत विविध संस्कृतियों, परंपराओं और आस्थाओं का देश है। यहां कई ऐसे समुदाय हैं, जिनकी धार्मिक मान्यताएं और जीवनशैली उन्हें विशेष पहचान देती हैं। छत्तीसगढ़ का रामनामी समुदाय भी ऐसी ही एक अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। इस समुदाय के लोग अपने पूरे शरीर पर भगवान राम का नाम गुदवाकर अपनी अटूट श्रद्धा और भक्ति का प्रदर्शन करते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक संघर्ष, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पहचान की कहानी भी है।

रामनामी समुदाय की शुरुआत लगभग एक सदी पहले मानी जाती है। कहा जाता है कि उस समय समाज में जातिगत भेदभाव बहुत गहरा था और दलित वर्ग के लोगों को मंदिरों में प्रवेश तक की अनुमति नहीं थी। ऐसे में इस समुदाय के लोगों ने भगवान राम को अपने भीतर बसाने का संकल्प लिया और शरीर पर “राम” नाम अंकित करवाना शुरू किया। उनका मानना था कि जब शरीर पर ही राम का नाम लिखा होगा, तो कोई भी उन्हें भगवान से दूर नहीं कर सकेगा। धीरे-धीरे यह परंपरा उनकी पहचान बन गई।

रामनामी समाज के लोग बचपन से ही शरीर पर टैटू बनवाना शुरू कर देते हैं। पहले माथे पर “राम” लिखा जाता है, फिर उम्र बढ़ने के साथ हाथ, छाती, पीठ 
और पूरे शरीर पर राम नाम अंकित किया जाता है। कुछ लोग तो पलकों और जीभ तक पर राम नाम गुदवाते हैं। इस प्रक्रिया को वे बेहद पवित्र मानते हैं और इसे धार्मिक अनुष्ठान की तरह निभाते हैं। इस समुदाय की एक और विशेष पहचान उनके वस्त्र हैं। रामनामी लोग सफेद कपड़े पहनते हैं, जिन पर काले रंग से “राम-राम” लिखा होता है। उनके सिर पर मोरपंख से सजा मुकुट भी देखा जाता है। धार्मिक आयोजनों में वे भजन-कीर्तन करते हुए सामूहिक रूप से भगवान राम का स्मरण करते हैं। उनके गीतों और भजनों में भक्ति के साथ सामाजिक समानता और मानवता का संदेश भी छिपा होता है।

आधुनिक समय में टैटू फैशन का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन रामनामी समुदाय के लिए यह केवल सजावट नहीं, बल्कि जीवनभर की आध्यात्मिक साधना है। बदलते समय और आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद यह समुदाय अपनी परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए है। रामनामी समाज यह संदेश देता है कि आस्था केवल मंदिरों और पूजा-पद्धतियों तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह व्यक्ति के जीवन और अस्तित्व का हिस्सा बन सकती है।