सहारनपुर की बूढ़ी हवेलियां खस्ताहाल 

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Published By Anjali Singh
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सहारनपुर की हवेलियां देखने के लिए मैं तीन बार आया और इन्हें मुख्य मार्ग और फिर कुदरती नदी जो अब गंदा नाला बना दिया गया है, का पुल पार करते हुए नगर के दिल कहे जाने वाली पुरानी बस्ती की तरफ कटरा में गया। ये हवेलियां भारतीय वास्तु कला के अच्छे नमूने हैं और हमारी निर्मित वास्तु-सांस्कृतिक विरासत के जीते-जागते नमूने। नगर के पुराने हिस्सों को ये एक सजीव चरित्र देती हैं। अब ऐसे भवनों का निर्माण नहीं होता और न ही इन्हें निर्मित किये जाने और मरम्मत के लिए पारंपरिक चूना अवलेह और मुगलिया ईंटों जैसी सामग्री आसानी से उपलब्ध होती है। हवेलियों के वास्तु-वैभव में संस्कृति, आर्किटेक्चरल हिस्ट्री, भू-दृश्य और अलंकरण शामिल हैं। यहां आने से पहले इस जनपद की जियोग्राफी, भू-दृश्यावली और हिमालय की निकटता और प्राकृतिक संपदा को समझना जरूरी है, तभी हवेलियों की मौजूदगी और इनसे जुड़े कृतित्व को ठीक से समझा जा सकता है।-रणवीर सिंह फोगाट

वास्तुकला का भरपूर इस्तेमाल

वायरल तस्वीर (41)

हवेलियों के निर्माण में विजुएल एस्थेटिक्स का जिस प्रकार से ध्यान रखा जाता था और इसके बाहरी एवं भीतरी हिस्सों को आकर्षक और अलंकृत किया जाता था, उनके सृजन के लिए सामग्री को स्थानीय तौर से उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों यथा शिवालिक पर्वतमाला, नदी तट और जंगल से लिया जाता था, जिसे मानव कौशल से संवारा जाता था। एक हवेली का मुखौटा अथवा फसाद इसका सबसे प्रमुख हिस्सा होता है, जिसका अभिकल्प मेहराबदार और छोटी-छोटी मेहराबों या बंगड़ियों अर्थात फोलियेटेड और कस्प्ड आर्क्स से किया जाता था। इसके नीचे दायां-बायां दो छोटी चौंतरियां बनाई जाती, दोनों के बीच धरती से सटी हुई सपाट और पत्थर की पाद-शिला या दांसा लगाया जाता था, जिसकी तीन इंच मोटी सतह के सामने वाले हिस्से पर पीपल के पत्ते की कार्विंग की जाती थी, जो एक पंक्ति के रूप में दिखती थी। चौंतरी की बाहरी मुख-शिला पर एक चित्रार्ध उकेरा जाता था, जिसका विषय आम जनजीवन से लिया गया एक दृश्य, जियोमेट्रिकल प्रतीक या फूल-पत्तियां और मंगलकारी जानवर या पक्षी हो सकते थे। फसाद की रचना को कलात्मक और दीर्घजीवी बनाने के लिए वास्तुकला का भरपूर इस्तेमाल किया जाता था। घर में जो भी प्रवेश करता, उसे यह मनमोहक लगता था और सकारात्मक प्रभाव छोड़ता था। देखा गया कि जर्जर होने के बाद जब पूरी ईमारत ढहने को हो, तब भी मुखौटा डटकर खड़ा रहता था। 

भित्ति चित्रकला

सहारनपुर की वास्तुकला में कुछ पहाड़ी तत्व तो हैं, लेकिन इनमे शैली ज्यादातर हिन्दुस्तानी-मुगल प्रभाव की है, जो उत्तर भारत की स्थानीय आवश्यकताओं, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और संस्कृति का एक नायाब प्रतिनिधित्व है। हिन्दू व्यापारी वर्ग जैन और अग्रवाल समुदाय की जो हवेलियां कटरा में मौजूद हैं या रहीं, उनके वास्तुशिल्प को प्रभावी अभिव्यक्ति देने के लिए को भित्ति चित्रांकन किया गया और मुखद्वार की चौखट में काष्ठ-नक्काशी वाले पल्ले लगाए गए थे, जिसमें स्थानीय मुस्लिम कारीगरों को महारत हासिल है। नगर की सर्वाधिक शानदार हवेलियों में से एक नंदा गाटे की हवेली हुआ करती, जिसे ढहा दिया गया है। भित्ति चित्र दीवार की सतह पर और धनुषाकार मेहराब की बाहरी परत पर चूने का पलस्तर करने के बाद गीली सतह पर अंकित किए जाते थे। 

भित्ति चित्रकला के विज्ञान और तकनीकों में हमारे चितेरे प्रवीण थे, क्योंकि इससे पहले इन्होंनें औरंगजेब के शासन काल के मध्य समय में देहरादून में गुरु राम राय निर्मित झंडा साहेब के विशाल प्रवेश द्वार की सपाट सतहों पर शानदार चित्रांकन किया है। इसे संभवतः सन्  1790 के आसपास बनाया और अलंकृत किया लगता है। इस पद्धति में फ्रेस्को, सेक्को-फ्रेस्को और टेंपेरा पद्धति के चित्र हमें सहारनपुर और देहरादून के अलावा इस क्षेत्र के कुछ गांवों में कनखल तक बने हुए भवनों में देखने को मिलते थे, जिनमें से अब कुछ ही भवन बचे हैं। ये चित्र सिक्को-टेंपरा पद्धति से बनाए गए थे न कि फ्रेस्को पद्धति से, जैसा कि कुछेक अध्येताओं ने कहा है। हवेलियों के बुनियादी ढांचे और रखरखाव और संरक्षण के प्रति वर्तमान मालिकों में विशेष उत्साह नहीं है। हालांकि फोटोग्राफी करते समय मुझसे इनके मालिकों ने सद्व्यवहार किया।

तत्काल संरक्षण की पहल जरूरी

इस क्षेत्र की अधिकांश हवेलियां सन 1960 तक मौजूद रहीं, लेकिन अब कुछेक उपेक्षित है और अन्य ध्वस्त हो हैं। नगर के पुराने हिस्सों के चरित्र को बचाने के लिए इन हवेलियों के जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए तत्काल पहल होनी चाहिए। सहारनपुर ही क्यों, उत्तराखंड के दो-तीन जिले और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के नगरों और गांवों की बिल्ट हेरिटेज अथवा भवन निर्माण विरासत के समग्र संरक्षण की जरूरत है। पहले इन सभी की सूची और जीपीएस लोकेशन की डॉक्यूमेंटेशन होनी चाहिए। थोड़ा सा ऐसा काम अखिल भारतीय संस्था इंटेक ने किया है, लेकिन यह अपर्याप्त है। 

स्थानीय वास्तुकला या वर्नाक्युलर आर्किटेक्चर के दृश्य तत्वों और सजावट के लिए स्थानीय आवश्यकताओं, पर्यावरण, सामाजिक परिवेश, काम-धंधा और संस्कृति हेतु एक चित्रात्मक प्रतिनिधित्व को समझना जरूरी है। अतीत का प्रतिनिधित्व करने वाली सहारनपुर की कुछ हवेलियां में क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत के बतौर शीशम की लकड़ी का उपयोग दरवाज़ों, दरवाज़ों के चौखटों, खिड़कियों और ब्रैकेट आदि के कलात्मक रूप में देखा जा सकता है। 

सहारनपुर लकड़ी की नक्काशी के कारीगरों का शहर है। पहले सारा काम हैण्ड टूल्स से किया जाता था, लेकिन बिजली के उपकरण आने से इसमें तेज़ी बेशक है, लेकिन अनगढ़ सौंदर्य तत्वों का ह्रास हुआ है। सहारनपुर शहर की दो-तीन पुरानी हवेलियों में लकड़ी की नक्काशी से बनाए गए विशिष्ट डिजाइनों को दल्हों में अपनाया गया है। ये विशुद्ध रूप से भारतीय बटन डोर या गुजराती किवाड़ों की नकाशी जैसी नहीं हैं। छत्ता जंबुदास की विशाल हवेली, बरताला यादगार की हवेली, दीना नाथ बाज़ार में आत्मा राम की हवेली हिन्दुस्तानी-मुगल मिश्रित प्रभाव वाले वास्तुशिल्प और अलंकरण शैली में हैं।  मुगल काल के दौरान, लकड़ी पर नक्काशी का काम सहारनपुर के इतिहास में एक नई घटना के रूप में सामने आया। अनुमान है कि यहां काम करने वाले कारीगरों के कुछ वंश मुल्तान, चिनियोट (पाकिस्तान) और कश्मीर से यहां लाकर बसाए गए थे। 

सहारनपुर के मुगल गवर्नरों शाह रणबीर सिंह और मुहम्मद बक्का के कार्यकाल के दौरान कुछ बेहतरीन हवेलियां बनाई गईं थी। शाह रणबीर सिंह एक समृद्ध जैन समुदाय से ताल्लुक रखते थे और उन्होंने जैन व्यापारी लोगों को सहारनपुर में अपना कारोबार स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया। जैन परिवार सहारनपुर में बस गए और उन्होंने अपनी हवेलियां और 'छत्ते' बनवाए। इस क्षेत्र की मशहूर हवेलियां जैन समुदाय द्वारा ही बनवाई गई थीं। हवेलियां में मुख भित्ति में मुख द्वार के आजू-बाजू बाहर निकले हुए गोखे अथवा गवाक्ष, बारीक जाली का काम और कस्पड आर्च या नोकदार मेहराब जिसे बंगड़ी कहा गया, का इस्तेमाल हवेलियों के निर्माण के समय हुआ। कुछेक मालिकों ने इन हवेलियों पर नए और कंज़र्वेशन के लिहाज़ से असम्बद्ध मटीरियल से रंग-रोगन करवाकर इनके मूल रूप को बदल दिया है। हवेलियों का बाहरी हिस्सा अब बेजान और उदास दिखने लगा है। 

जीवनशैली ने खराब की खूबसूरती

छत्ता जंबुदास में हवेलियों के सामने के हिस्से को बीड़ी, सिगरेट और पान-मसाला बेचने के स्टॉल, ठेले और खोखे लगाने के लिए इस्तेमाल करते पाए गए। हवेली के मुखावरण दीवार की बाहरी सतह पर कीलें गाड़ कर बड़े होर्डिंग लगा दिए गए हैं। इन हवेलियों के सामने बिजली, टेलीफोन और इंटरनेट केबल्स के लटकते हुए तारों के जाल ने इनकी दृश्यावली को दूषित किया है। बरताला यादगार की यह खूबसूरत हवेली हमें ब्रिटिश शासन की याद दिलाती थी। यह हवेली मुगल, ब्रिटिश और भारतीय वास्तुकला के मेल का सबूत थी। इसकी दीवारों पर किए गए चित्रांकन में ब्रिटिश व्यक्तियों के चित्र और प्रवेश द्वार पर फूलों और ज्यामितीय आकृतियों के पैटर्न बने हुए थे। लोगों की जीवनशैली में आए बदलावों के साथ, इन हवेलियों का ऑर्गनिक ढांचा खराब कर दिया गया है।