मानवता की पुकार, युद्ध नहीं समाधान 

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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पिछले 40 वर्षों में उसने इराक, सीरिया, लेबनान और यमन जैसे देशों के भीतर एक ऐसा गुप्त नेटवर्क खड़ा किया है, जिससे उसकी रणनीतिक गहराई का पता मिलता है। यह नेटवर्क राजधानी तेहरान से शुरू होकर भूमध्य सागर से लाल सागर तक फैला हुआ है। सीरिया की सरकार, लेबनान का हिजबुल्लाह, यमन का हूती आंदोलन और फिलिस्तीन का हमास जैसे समूह शामिल हैं, ये सभी किसी न किसी रूप में ईरान के समर्थन और संसाधनों पर निर्भर हैं और अक्सर अमेरिका और इजराइल के खिलाफ सक्रिय रहते हैं, इनका मकसद अपने क्षेत्र से अमेरिका और इजराइल के प्रभाव को खत्म करना है। ईरान इन समूहों को फंडिंग, हथियार और ट्रेनिंग देकर इतना मजबूत करता है, ताकि देश के भीतर शांति बनी रहे और संघर्ष बाहर ही बाहर चलता रहे। इस दौरान ईरान ने अपनी सैन्य और साइबर ताकत को भी लगातार बढ़ाया, पर्शियन गल्फ के पास स्थित भूमिगत मिसाइलों के बसे शहर इसका उदाहरण हैं।

मार्च 2026 तक भारतीय नया रुपया 94 से 95 प्रति डॉलर के आसपास पहुंच चुका था और यह गिरावट जारी है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है और जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे रुपए पर दबाव बढ़ता है और उसकी कीमत गिरती है। वैश्विक बाजार में उत्पन्न किसी भी अनिश्चितता का असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की मुद्रा पर पड़ता है। हमारा रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है। हम तो यही चाहेंगे कि मिडिल ईस्ट जितनी जल्दी संघर्ष विराम लग जाय, हमारे लिए हितकर है। ट्रंप की हालत तो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसी है। उनके मन: स्थिति पल-पल में बदल रही है। ये दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राष्ट्राध्यक्ष का व्यवहार तो बिल्कुल भी नहीं है। इजराइल और ईरान के बीच चल रहा तनाव अब बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। 

पिछले महीने यानी मार्च में भी इजरायल ने ईरान के इसी गैस प्लांट को निशाना बनाया था, जिसके बाद ट्रंप का बयान आया था कि अब ईरान के एनर्जी इंफ्रा, खासकर साउथ पार्स प्लांट पर हमला नहीं किया जाएगा। ज्ञात हो कि साउथ पार्स ईरान का सबसे बड़ा गैस इंफ्रा है। ईरान की 70 प्रतिदिन गैस यहीं से आती है। यह ईरान के लिए सोने की खान से कम नहीं है। कह सकते हैं कि यह सीधे तौर पर ईरानी अर्थव्यवस्था पर हमला है। साउथ पार्स का इसका होर्मुज से बेहद नजदीक है, अब होर्मुज रूट पर भी संकट मडराने लगा है। तेल गैस फैसिलिटी पर चुन-चुनकर मिसाइल दागकर हमला करना और हबशान फुजैरा पाइपलाइन में आग लगना सिर्फ यूएई के लिए ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए। हम एलपीजी के लिए लाइन में खड़े हैं। इस तरह के हमले हमारी भी चिंता के विषय हैं।

ईरान इजराइल युद्ध ने दुनियाभर में ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है, जहां कई देशों को एनर्जी इमरजेंसी लगानी पड़ रही है। भारत में चलने वाले ढाबे, रेस्टोरेंट बंद होने के कगार पर हैं। कुछ बंद हो चुके हैं। भारत सरकार द्वारा मुश्किल समय आने का संकेत दिया गया है। हमारे तेल भंडार पर्याप्त नहीं हैं। उड़ीसा और कर्नाटक में नए तेल भंडार बनने जा रहे हैं, जिन्हें पूरा होने में 2030 तक का समय लगेगा। हालांकि पेट्रोलियम को लेकर अभी देश में बांग्लादेश और पाकिस्तान की तरह मारामारी नहीं है। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने करीब 5 मिलियन बैरल ईरानी क्रूड खरीदा है।  रेल हमारे देश में सबसे बड़ा यातायात का साधन है और राहत की बात यह है कि हमारे पास कोयले का रिजर्व भंडार है और हाइड्रो पावर भी है, जो रेल यातायात को सुचारू रखने में मददगार साबित होंगे, लेकिन युद्ध के लंबा खींचने पर विषम स्थिति आ सकती है।

युद्ध के ठेकेदारों को आम जनता की परेशानी से कोई मतलब नहीं रहता। ऋ षिकेष में रहने वाले एक मित्र सपरिवार एक महीने के लिए सैन फ्रांसिस्को से भारत आए थे। जैसे ही वापस जाने का समय आया तो फ्लाइट कैंसिल होने लगीं। टिकटों के दाम बढ़ने लगे। आनन-फानन में लंबा ले-ओवर लेकर टिकट कराई ताकि समय से पहुंच कर नौकरी ज्वाइन कर सकें और आर्थिक संकट से भी बचें। एक ईरानी गीतकार अपना गिटार लेकर प्लांट के पास ही बैठ गया था। ऐसे मौके पर देश में एकता होनी बहुत जरूरी है। क्योंकि सबसे बड़ी बात यह कि कोई भी युद्ध केवल हथियारों का टकराव नहीं होता, बल्कि यह मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी लंबे समय तक गहरा प्रभाव छोड़ता है। दुनियाभर में बैठे युद्ध के ठेकेदारों को इस बात को समझना होगा।-अमृता पांडे, स्वतंत्र लेखिका