ऐसे हुआ वेल्क्रो का आविष्कार

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Published By Anjali Singh
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वेल्क्रो का आविष्कार किसी बड़ी प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि एक साधारण सैर के दौरान हुआ और यही इसे खास बनाता है। साल 1940 के दशक में स्विट्जरलैंड के इंजीनियर जॉर्ज डे मेस्ट्रल अपने कुत्ते के साथ जंगल में घूमने निकले। लौटकर उन्होंने देखा कि उनके कपड़ों और कुत्ते के बालों पर छोटे-छोटे कांटेदार बीज चिपके हुए हैं। आमतौर पर लोग इन्हें झटककर फेंक देते, लेकिन मेस्ट्रल ने ऐसा नहीं किया। उनकी जिज्ञासा जाग उठी- आखिर ये बीज इतनी मजबूती से चिपकते कैसे हैं?

उन्होंने इन बीजों को माइक्रोस्कोप से देखा और जो सामने आया, वह चौंकाने वाला था। बीजों पर बहुत बारीक हुक (कांटे) थे, जो कपड़े और बालों के रेशों में फंस जाते थे। बस, यहीं से एक अनोखा विचार जन्मा- क्या इसी सिद्धांत पर कोई कृत्रिम चीज बनाई जा सकती है? कई सालों की मेहनत और प्रयोगों के बाद उन्होंने ‘हुक और लूप’ प्रणाली पर आधारित एक फास्टनर तैयार किया। 

एक सतह पर छोटे-छोटे हुक और दूसरी पर मुलायम लूप दोनों को दबाते ही वे चिपक जाते और खींचते ही अलग हो जाते। 1955 में इस आविष्कार का पेटेंट हुआ और इसका नाम रखा गया ‘वेल्क्रो’। शुरुआत में लोगों ने इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन जब नासा ने अंतरिक्ष मिशनों में इसका उपयोग किया, तब इसकी उपयोगिता दुनिया के सामने आई। आज वेल्क्रो जूतों, बैगों और कपड़ों से लेकर अंतरिक्ष तकनीक तक हर जगह इस्तेमाल हो रहा है-सिर्फ एक जिज्ञासा भरे सवाल की वजह से।

वैज्ञानिक के बारे में

जॉर्ज डे मेस्ट्रल का जन्म 1907 में स्विट्ज़रलैंड में हुआ था। वे बचपन से ही जिज्ञासु और आविष्कारशील स्वभाव के थे। केवल 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना पहला पेटेंट हासिल कर लिया था, जो उनके वैज्ञानिक रुझान को दर्शाता है। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और प्रकृति से प्रेरणा लेकर नए विचार विकसित किए। उनका जीवन साधारण लेकिन प्रयोगधर्मी था, जहां वे रोज़मर्रा की चीजों में भी नवाचार के अवसर खोजते थे। वे अपने परिवार के साथ शांत जीवन बिताते हुए शोध और प्रयोगों में लगे रहे और 1990 में उनका निधन हो गया।

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