Bareilly : वो भी क्या दिन थे...जब मन मोहती थी हरियाली की चादर

Amrit Vichar Network
Published By Pradeep Kumar
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बीसलपुर, नैनीताल और पीलीभीत हाईवे पर सड़कों के विकास से रुखसत हुई हरियाली

बरेली, अमृत विचार। वो भी क्या दिन थे...यह जुमला आज उन राहगीरों की जुबां पर अक्सर सुनने को मिलता है जो बरेली के नैनीताल, पीलीभीत या बीसलपुर हाईवे से गुजरते हैं। करीब एक दशक पहले तक इन सड़कों का नजारा किसी जन्नत से कम नहीं था। घने पुराने पेड़ों की टहनियां सड़क के ऊपर मिलकर एक प्राकृतिक सुरंग बना देती थीं। सूरज की तपिश जमीन तक नहीं पहुंच पाती थी और ठंडी हवा का झोंका राहगीरों की थकान मिटा देता था। आज वही सड़कें विकास की दौड़ में अपनी पहचान खो चुकी हैं और कंक्रीट के तपते जाल में बदल गई हैं। इतिहास और विकास की बात करें तो नैनीताल हाईवे और पीलीभीत रोड के चौड़ीकरण की परियोजनाओं ने बरेली के पर्यावरण को सबसे गहरी चोट पहुंचाई।

साल 2016 से 2022 के बीच हुए बड़े निर्माण कार्यों, विशेषकर नैनीताल हाईवे के फोरलेन होने और पीलीभीत रोड के सिक्सलेन विस्तारीकरण के दौरान हजारों की संख्या में 50 से 100 साल पुराने नीम, पीपल, पाकड़ और शीशम के पेड़ जमींदोज कर दिए गए। बीसलपुर रोड पर भी कुछ साल पहले तक आम और यूकेलिप्टस के झुरमुट हुआ करते थे, जिन्हें सड़क चौड़ी करने के नाम पर प्रशासन ने कुल्हाड़ी के हवाले कर दिया। आज इन हाईवे पर सफर करते हुए हरियाली की वो चादर सिर्फ यादों के एल्बम में बची है। इसका असर भी अब साफ दिखने लगा है। गर्मी के मौसम में इन हाईवे पर तापमान सामान्य से 2 से 3 डिग्री अधिक महसूस होता है। आलम यह है कि आज बरेली की इन प्रमुख सड़कों पर हरियाली की चादर की जगह वीरानगी नजर आती है। डिवाइडरों पर लगे सजावटी पौधे केवल दिखावे की वस्तु बनकर रह गए हैं, जो न तो पर्याप्त ऑक्सीजन दे पाते हैं और न ही चिलचिलाती धूप से बचाव करते हैं। राहगीर अब उन पुराने दिनों को याद करते हैं जब सफर लंबा होने के बावजूद थकान नहीं होती थी।

खेतों का व्यावसायिक इस्तेमाल भी एक बड़ी वजह
सड़कों के वीरान होने के पीछे सिर्फ हाईवे का चौड़ीकरण ही एकमात्र कारण नहीं है, बल्कि सड़कों के किनारे स्थित खेतों का व्यावसायिक इस्तेमाल भी एक बड़ी वजह बनकर उभरा है। कुछ साल पहले तक पीलीभीत और नैनीताल हाईवे के किनारे लहलहाती फसलें और बाग हुआ करते थे, जो वातावरण में नमी और ठंडक बनाए रखते थे। लेकिन, मुनाफे की होड़ में किसानों ने सड़क किनारे की इन बेशकीमती जमीनों को बेच दिया, जहां अब बड़े पैमाने पर प्लांटिंग कर दी गई है। हरियाली को काटकर वहां कंक्रीट के जंगल और कॉलोनियां बसाई जा रही हैं।

आज इस सड़क पर धूप देखकर यकीन नहीं होता कि कभी यहां दिन में भी अंधेरा रहता था। बीसलपुर रोड के दोनों ओर इतने घने नीम और पीपल के पेड़ थे कि उनकी टहनियां आपस में हाथ मिलाती थीं। हम लोग दोपहर में भी बिना छाते के मीलों पैदल चल लेते थे। अब तो कंक्रीट की ऐसी तपिश है कि सड़क पर पैर रखना मुश्किल है। -डा. जगत सिंह, ग्रीन पार्क।

पहले सवारी का इंतजार करते वक्त हम किसी भी पेड़ के नीचे ऑटो खड़ा कर सुस्ता लेते थे। बीसलपुर रोड पर इतने घने आम के बाग और पेड़ थे कि पंखे की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। अब तो पूरा रास्ता वीरान पड़ा है। पेड़ कटने के बाद गर्मी इतनी बढ़ गई है कि दोपहर में ऑटो के अंदर भट्टी जैसी तपिश महसूस होती है। -नैपाल सिंह, केसरपुर।

वो भी क्या दिन थे, जब इस हाईवे को ''ग्रीन टनल'' कहा जाता था। बरेली से बहेड़ी के बीच हज़ारों पुराने पेड़ थे जो सर्दियों में कोहरे और गर्मियों में धूप को रोकते थे। सरकार ने सड़क तो शानदार बना दी, पर वो रूह गायब कर दी जो इन रास्तों में जान फूंकती थी। हमने आने वाली पीढ़ी के लिए छांव नहीं, बल्कि सिर्फ गर्म डामर की सड़कें छोड़ी हैं।-सूरज, भोजीपुरा।

मैं इस शहर का पुराना बाशिंदा हूं। मैंने पीलीभीत रोड पर पेड़ों को बड़ा होते देखा था। आज सड़क किनारे के खेत बिक गए तो काफी हद तक जगह सड़क चौड़ीकरण की परियोजनाओं में चली गईं। यह बात सही है कि विकास जरूरी है, पर क्या पुराने पेड़ों के साथ तालमेल नहीं बिठाया जा सकता था। आज की चकाचौंध में हम उस हरियाली की कीमत भूल गए हैं। -वेदप्रकाश, मुडिया अहमदनगर।

मुझे याद है जब मैं साइकिल से अपनी ड्यूटी पर जाता था, तो पीलीभीत रोड की ठंडी हवा मेरी सारी थकान मिटा देती थी। शीशम और पाकड़ के उन पेड़ों पर हजारों पक्षियों का बसेरा था। सड़क चौड़ी करने के लिए जब कुल्हाड़ी चली, तो सिर्फ पेड़ नहीं गिरे, बल्कि विकास की इस अंधी दौड़ में हमने अपनी सबसे बड़ी दौलत खो दी है।-भूपेंद्र सिंह।

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