संपादकीय:विकास का महामार्ग

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Published By Monis Khan
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उत्तर प्रदेश का गंगा एक्सप्रेस वे केवल 594 किलोमीटर लंबा राजमार्ग नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक संरचना को पुनर्परिभाषित करने की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसे एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य की धुरी कहना अतिशयोक्ति नहीं, परंतु यह तभी संभव होगा, जब सड़क निर्माण के साथ-साथ औद्योगिक, सामाजिक और संस्थागत सुधार समान गति से और साथ-साथ आगे बढ़ें। मेरठ से प्रयागराज तक 12 जिलों को जोड़ने वाला यह एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश के पश्चिमी, मध्य और पूर्वी हिस्सों को एक आर्थिक गलियारे में बदलने की क्षमता रखता है।

पहले जहां इन क्षेत्रों के बीच यात्रा में 13 से 14 घंटे लगते थे, अब यह दूरी 6 से 7 घंटे में सिमट सकती है। 120 किमी प्रति घंटे की डिजाइन गति केवल यात्रियों की सुविधा नहीं बढ़ाएगी, बल्कि लॉजिस्टिक्स लागत को घटाकर व्यापार की प्रतिस्पर्धात्मकता भी बढ़ाएगी। तेजी से माल की ढुलाई होने से कृषि उत्पाद, डेयरी, हस्तशिल्प और लघु उद्योगों को नए और बड़े बाजार मिलेंगे। यह कहना भी सर्वथा उचित है कि यह परियोजना उत्तर प्रदेश के बदलते विकास मॉडल की अभिव्यक्ति है। जो राज्य कभी पलायन और अवसरहीनता के लिए जाना जाता था, वह अब निवेश आकर्षित करने की दिशा में सक्रिय है। 

एक्सप्रेसवे के किनारे प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्रों— जिनमें लॉजिस्टिक्स पार्क, वेयरहाउसिंग, खाद्य प्रसंस्करण और एमएसएमई क्लस्टर शामिल हो सकते हैं— स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देंगे, हालांकि इन क्षेत्रों में वास्तविक निवेश और रोजगार सृजन इस बात पर निर्भर करेगा कि भूमि, बिजली, श्रम और नीति स्थिरता कितनी प्रभावी ढंग से उपलब्ध कराई जाती है। धार्मिक और पर्यटन दृष्टि से भी यह परियोजना महत्वपूर्ण है। मेरठ से प्रयागराज, जो कुंभ और संगम के कारण वैश्विक पहचान रखता है का सीधा जुड़ाव तीर्थ यात्रियों के लिए वरदान होगा, परंतु टोल शुल्क का सवाल यहां प्रासंगिक है। यदि टोल अत्यधिक हुआ, तो आम यात्रियों के लिए यह सुविधा सीमित हो सकती है, इसलिए टोल नीति में संतुलन आवश्यक है, ताकि लागत वसूली और सामाजिक समावेशन दोनों साथ चल सकें। 

रणनीतिक दृष्टि से शाहजहांपुर के पास 3.5 किमी की हवाई पट्टी इस परियोजना को विशेष बनाती है। आपातकालीन या युद्ध की स्थिति में यह लड़ाकू विमानों के लिए आपातकालीन वैकल्पिक रनवे के रूप में काम कर सकती है, जिससे हिंडन, आगरा और बरेली एयरबेस को लाभ पहुंचेगा, युद्ध या ऐसी स्थितियों में इन सैन्य एयर बेस पर दबाव कम होगा और सामरिक लचीलापन बढ़ेगा। जहां तक इस एक्सप्रेस वे की लागत का प्रश्न है, इसके निर्माण में करीब 37,350 करोड़ रुपये, यानी लगभग 63 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर खर्च हुए हैं। पहली नजर में अधिक लग सकता है, लेकिन भूमि अधिग्रहण, उच्च गुणवत्ता निर्माण, पुलों, इंटरचेंज और सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखें, तो यह लागत राष्ट्रीय औसत के अनुरूप ही है। असली सवाल लागत नहीं, बल्कि निवेश पर मिलने वाले सामाजिक-आर्थिक प्रतिफल का है। वस्तुत: गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश के लिए ‘सड़क’ से अधिक ‘संभावनाओं का मंच’ है। यह विकास का गेटवे तभी बनेगा, जब इसके किनारे उद्योग, कौशल और निवेश की वास्तविक धारा बहे। अन्यथा यह केवल तेज़ रफ्तार यातायात का माध्यम बनकर रह जाएगा।