Bareilly : मुंह में छिपे करोड़ों दोस्त-दुश्मन बैक्टीरिया पर रुहेलखंड विवि की बड़ी रिसर्च

Amrit Vichar Network
Published By Pradeep Kumar
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मुंह में छिपे करोड़ों दोस्त-दुश्मन बैक्टीरिया पर रुहेलखंड विवि की बड़ी रिसर्च

रतन सिंह गुर्जर बरेली, अमृत विचार। रिसर्च के क्षेत्र में महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्व विद्यालय को बड़ी सफलता मिली है। पादप विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. पंकज अरोड़ा की अगुवाई में बरेली और गोरखपुर के वैज्ञानिक दल की रिसर्च ने आधुनिक ओमिक्स तकनीक से स्वास्थ्य क्षेत्र में नई उम्मीद जगाई है। रिसर्च से साबित हुआ है कि हर इंसान के मुंह में मौजूद सूक्ष्मजीवों से उसके शरीर में हो रही अच्छी-बुरी हर तरह की उथल-पुथल का पता लगाया जा सकता है। कैंसर और डायबिटीज की पहचान भी संभव है। वैज्ञानिक शोध अंतरराष्ट्रीय एंटोनी वैन लीउवेनहोक जनरल में प्रकाशित होने के बाद सबकी निगाहें इस ओर टिकी नजर आ रही हैं।

यह बात तो सभी जानते हैं कि इंसानी मुंह में करोड़ों सूक्ष्मजीव रहते हैं। ये ही सूक्ष्मजीव आपके शरीर में केवल दांतों की सफाई तक सीमित नहीं बल्कि आपके पूरे शरीर की सेहत से जुड़े होते हैं। वैज्ञानिक इन्हीं सूक्ष्मजीवों की मदद से कैंसर, डायबिटीज और गठिया जैसी गंभीर बीमारियों की पहचान और इलाज के नए तरीके खोज रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार आपके मुंह में ही इंसानी सेहत की पूरी कहानी छिपी है।एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए महत्वपूर्ण शोध में यह बात सामने आई है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय एंटोनी वैन लीउवेनहोक जनरल में प्रकाशित हुआ है। शोध में वैज्ञानिकों ने बताया कि आधुनिक ओमिक्स तकनीक के माध्यम से मुंह में मौजूद सूक्ष्मजीवों का गहराई से अध्ययन कर कई बीमारियों का समय रहते पता लगाया जा सकता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार मानव शरीर में करीब 38 ट्रिलियन बैक्टीरिया मौजूद होते हैं और पेट के बाद मुंह सूक्ष्मजीवों का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र है। एक मिलीलीटर लार में करीब 10 करोड़ सूक्ष्मजीव पाए जा सकते हैं। इनमें बैक्टीरिया के साथ वायरस, फंगस और अन्य सूक्ष्म जीव भी शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि पहले माना जाता था कि ये सूक्ष्मजीव केवल दांतों की सड़न और मसूड़ों की बीमारी का कारण बनते हैं, लेकिन अब पता चला है कि इनका संबंध मुख कैंसर, मधुमेह और रूमेटोइड अर्थराइटिस जैसी गंभीर बीमारियों से भी है। आधुनिक तकनीकों की मदद से अब इन सूक्ष्मजीवों के डीएनए और उनकी कार्यप्रणाली का अध्ययन किया जा रहा है, जिससे भविष्य में हर व्यक्ति के लिए अलग और सटीक इलाज संभव हो सकेगा। इस शोध कार्य में एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय से डॉ. पंकज कुमार अरोड़ा, प्रो.आलोक श्रीवास्तव, प्रो.संजय कुमार गर्ग, छात्र मुश्ताक अली, आदित्य प्रताप सिंह के अलावा महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय से प्रो. विमल कुमार दुबे का भी सहयोग रहा है।

1680 की पहली खोज से 2026 की आधुनिक ओमिक्स तक
एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय के पादप विज्ञान के डॉ. पंकज अरोड़ा ने बताया कि मुख माइक्रोबायोलॉजी की शुरुआत 1680 में एंटोनी वैन लीउवेनहॉक ने की थी। जिन्होंने अपने दांतों के सैंपल में पहली बार एनीमल्कुल्स देखे थे। आज के आधुनिक विज्ञान ने क्रांति करते हुए 345 साल बाद विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि हम 16एस राइबोसोमल आरएनए सीक्वेंसिंग और मेटाजेनोमिक्स जैसी तकनीकों से इन सूक्ष्मजीवों के डीएनए और उनके कार्यों का गहराई से विश्लेषण कर सकते हैं।

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