संपादकीय: संकल्प और संकेत

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Published By Monis Khan
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प्रधानमंत्री का यह कहना कि ‘दुनिया की कोई भी ताकत भारत को झुका नहीं सकती’ केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में राष्ट्रीय मनोबल को मजबूत करने वाला सशक्त संदेश भी है। यह वक्तव्य ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में युद्ध की आशंकाएं, वैश्विक ऊर्जा संकट, भू-राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक अनिश्चितता विश्व राजनीति को प्रभावित कर रही हैं, इसलिए प्रधानमंत्री के हालिया भाषणों को केवल घरेलू राजनीति के संदर्भ में नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय मनोविज्ञान और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के संदर्भ में भी समझना होगा। 

भारत आज ऐसे वैश्विक दौर में खड़ा है, जहां बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा तीव्र हो चुकी है। चीन सीमा और रणनीतिक प्रभाव के स्तर पर चुनौती बना हुआ है। पाकिस्तान लगातार अस्थिरता और आतंकवाद के माध्यम से दबाव बनाने की कोशिश करता रहा है। पश्चिमी शक्तियां कभी-कभी व्यापार, मानवाधिकार, प्रतिबंधों या भू-राजनीतिक अपेक्षाओं के माध्यम से दबाव बनाती दिखाई देती हैं। ऊर्जा बाजार, डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं भी आधुनिक दौर में रणनीतिक दबाव के औजार बन चुकी हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का संदेश वस्तुतः यह था कि भारत बाहरी दबावों के बावजूद अपनी स्वतंत्र नीति और राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा।

 सोमनाथ अमृत महोत्सव को ‘प्रेरणा पर्व’ बताने के पीछे भी यही सोच दिखाई देती है। सोमनाथ मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की पुनर्स्थापना और आत्मविश्वास का प्रतीक भी माना जाता है। इतिहास में अनेक आक्रमणों और विध्वंस के बाद भी उसका पुनर्निर्माण भारतीय समाज की सांस्कृतिक जिजीविषा का प्रतीक बना। प्रधानमंत्री इस प्रतीक को आधुनिक भारत की आत्मनिर्भरता और पुनरुत्थान की कथा से जोड़ते दिखाई देते हैं। यही कारण है कि उन्होंने इस अवसर पर परमाणु परीक्षणों और चंद्रयान-3 के ‘शिवशक्ति’ नामकरण का भी उल्लेख किया। इसका निहितार्थ स्पष्ट है— भारत अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों और सांस्कृतिक विरासत को विरोधाभासी नहीं, बल्कि पूरक मानता है। 

वास्तव में पिछले कुछ वर्षों में सरकार ‘विकास और विरासत’ को साथ लेकर चलने का राजनीतिक-सांस्कृतिक विमर्श गढ़ रही है। एक ओर हाईवे, सेमीकंडक्टर, डिजिटल इंडिया और अंतरिक्ष कार्यक्रम की चर्चा होती है, दूसरी ओर काशी, अयोध्या, महाकाल और सोमनाथ जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा जाता है। यह भाजपा की व्यापक वैचारिक राजनीति का भी हिस्सा है।प्रधानमंत्री के हालिया भाषणों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वे संकट की आशंकाओं के बीच जनमानस को भयभीत होने से रोकना चाहते हैं। पश्चिम एशिया में युद्ध की आशंकाएं, ट्रंप द्वारा ईरान के प्रस्ताव को खारिज करने के बाद युद्धविराम के वेंटीलेटर पर होने जैसा कठोर बयान, ईरान-संबंधी तनाव और तेल बाजार की अनिश्चितता स्वाभाविक रूप से भारत जैसी ऊर्जा आयातक देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

 प्रधानमंत्री द्वारा साहस, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय शक्ति पर जोर देने वाले भाषणों का समग्र प्रभाव जनता को एक ओर संभावित वैश्विक संकटों के प्रति सजग करेगा तो दूसरी ओर यह भरोसा जगाएगा कि भारत आर्थिक, सामरिक और मानसिक रूप से उनसे निपटने में सक्षम है। यह संकट-प्रबंधन की मनोवैज्ञानिक रणनीति भी हो सकती है। अनिश्चिततापूर्ण  वर्तमान परिस्थितियों में यह आवश्यक भी है।