क्रिकेट की 'कैश मशीन' की रफ़्तार हो रही धीमी
विज्ञापन पर सख़्ती से टीमों के लिए कमर्शियल पिच पर खुल कर खेलना मुश्किल हो गया है। क्या आईपीएल का आर्थिक स्वर्णकाल स्थिरता के दौर में प्रवेश कर रहा है?
बार्क इंडिया और टैम स्पोर्ट्स की रिपोर्ट कहती है कि आईपीएल की पहले फेज में टीवी रेटिंग्स 19 फीसद घट गई और औसत व्यूवरशिप में 26 फीसद की गिरावट आई। टीवी रेटिंग्स घटने से विज्ञापनदाता कम हुए। मैच के दौरान आने वाले टीवी विज्ञापनों में भी 31 प्रतिशत की कमी आई। पिछले सीजन में 65 से ज्यादा ब्रांड्स आईपीएल के साथ थे, तो इस सीजन में 44 रह गए। 44 ब्रांड्स ने नाता तोड़ा और महज 24 नए जुड़े, हालांकि जिओ स्टार का दावा कि आईपीएल की रीच बढ़ कर 110 करोड़ पार हो गई, सच हो सकता है, क्योंकि रीजनल भाषा में कमेंट्री सुनने वालों में 45 फीसद की बढ़ोतरी हुई है, पर मोबाइल पर दर्शक बढ़ने का मतलब प्रतियोगिता या आयोजन का सफल होना या उसकी कुल कमाई, मुनाफा बढ़ना नहीं है। घाटे के इस भय को चमकदार प्रचार के नीचे छिपाना अब कुछ कठिन हो गया है?
साल 2008 में, 'अंडरडॉग' मानी जाने वाली राजस्थान रॉयल्स ने पहले ही टूर्नामेंट को जीतकर सबको चौंका दिया था। उस समय इंडियन प्रीमियर लीग की वह सबसे कम वैल्यू वाली क्रिकेट टीम थी। टीम के उत्साहित मालिक मनोज बदाले ने 2020 में प्रकाशित अपनी किताब ‘ए न्यू इनिंग्स' में लिखा कि खिलाड़ियों को बधाई देने के लिए जब मैं पिच पर उतरा, तो मेरे साथ आए एक वेंचर कैपिटलिस्ट बिज़नेस पार्टनर ने थोड़ा मज़ाकिया अंदाज़ में कहा था, ‘शायद अब इसे बेचने का समय आ गया है!’ हालांकि, बदाले ने लगभग दो दशकों तक टीम को अपने पास ही रखा, लेकिन अब आईपीएल के पुराने निवेशक अपनी हिस्सेदारी बेचकर मुनाफ़ा कमा रहे हैं, क्योंकि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि लीग की कमर्शियल रफ़्तार अब धीमी पड़ने लगी है।
जब बदाले ने लाचलन मुर्डोक और रेड बर्ड कैपिटल पार्टनर के साथ मिलकर आईपीएल की शुरुआती आठ फ्रेंचाइज़ियों में से सबसे सस्ती फ्रेंचाइज़ी को सिर्फ़ 67 मिलियन डॉलर में खरीदा था, तब से लेकर अब तक टीम की वैल्यूएशन में ज़बरदस्त उछाल आया है। मगर अब बदाले भी लगभग 1.65 अरब डॉलर की एक डील में टीम का कंट्रोल, स्टील टाइकून लक्ष्मी मित्तल के परिवार और वैक्सीन अरबपति अदार पूनावाला जैसे लोगों के एक ग्रुप को बेच कर 'माइनॉरिटी शेयरहोल्डर' बन गए। ड्रिंक्स की दिग्गज कंपनी ड्याजिओ जिसने कभी रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु को अपने सबसे ‘ताक़तवर ब्रांड्स’ में से एक बताया था, उसने भी मार्च में अपनी टीम को 1.8 अरब डॉलर में बेचने पर सहमति जताई। यह डील ब्लैकस्टोन और भारतीय टाइकून कुमार मंगलम बिड़ला जैसे लोगों के एक कंसोर्टियम के साथ हुई ।
जब इंडियन प्रीमियर लीग को शुरुआत में क्रिकेट की परंपरागत आत्मा के विरुद्ध ‘मनोरंजन आधारित प्रयोग’ माना गया, इसको लेकर शुद्धतावादियों के मन में कुछ शंकाएं उभरीं। पुराने क्रिकेट फ़ैन्स को रंगीन कपड़ों, तेज़ म्यूज़िक और खेल के इस आक्रामक अंदाज़ से काफ़ी हैरानी और नाराज़गी तो हुई, लेकिन वे आशंकाएं बहुत जल्द ग़लत साबित हो गईं। आईपीएल ने क्रिकेट की कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था को बदला और इस खेल पर भारत के वैश्विक राजनीतिक दबदबे को मज़बूत किया।
यह बॉलीवुड के तमाशे को अमेरिकी-शैली के खेल प्रचार और ब्रांडिंग के साथ का मिश्रण बना, जिसमें चीयर लीडर्स और स्टेडियम को गुंजा देने वाले साउंडट्रैक भी शामिल हैं। यह केवल एक खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि भारत की नई उपभोक्ता अर्थव्यवस्था, मनोरंजन उद्योग, डिजिटल स्ट्रीमिंग और कॉरपोरेट पूंजी का सबसे चमकदार संगम बन गया। इंडियन प्रीमियर लीग भारतीय क्रिकेट की ‘कैश मशीन’ बन गई, लेकिन अब संकेत मिलने लगे हैं कि इस सुनहरे मॉडल की रफ्तार धीमी पड़ रही है। प्रसारण और स्ट्रीमिंग अधिकारों की अगली नीलामी को लेकर उत्साह पहले जैसा नहीं दिख रहा, विज्ञापन बाज़ार पर नियामकीय दबाव बढ़ रहा है और लीग की व्यावसायिक संरचना कई नई चुनौतियों का सामना कर रही है।
ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या आईपीएल का आर्थिक स्वर्णकाल अब स्थिरता के दौर में प्रवेश कर रहा है, या यह केवल अस्थायी मंदी है। हर तेज़ उछाल एक समय के बाद स्थिरता की सीमा तक पहुंचता है। 2008 से 2023-27 के मीडिया अधिकार चक्र तक आईपीएल की कमाई लगभग छह गुना बढ़ी, किंतु अब अनुमान है कि अगली नीलामी लगभग 5.4 अरब डॉलर के आसपास ही ठहर सकती है। इसका कारण केवल बाजार की थकान नहीं, बल्कि वह बदलता डिजिटल परिदृश्य भी है, जिसने पिछले दशक की विस्फोटक वृद्धि को संभव बनाया था।
2022 में रिलायंस समर्थित वायकॉम-18 और डिज्नी स्टार के बीच जो आक्रामक बोली युद्ध हुआ था, उसने कीमतों को असाधारण स्तर तक पहुंचा दिया। अब जब मीडिया कंपनियों के बीच विलय और पुनर्गठन हो चुके हैं, वैसी प्रतिस्पर्धा की संभावना कम दिखती है। अमेजन और नेटफ्लिक्स जैसे वैश्विक मंच अभी भी भारतीय क्रिकेट के प्रसारण अधिकार खरीदने के लिए उतने आक्रामक नहीं हैं, जितनी उम्मीद की जा रही थी। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
