सामयिकी : दावानल लील लेती है प्राकृतिक जीवन
पिछले गुरुवार 21 मई को उत्तराखंड के गोपेश्वर जनपद के जंगल में आग बुझाने गए फायर वॉचर राजेंद्र सिंह की जलने से मौत हो गई। उनका झुलसा हुआ शव करीब 70 मीटर नीचे गहरी खाई में मिला था। पिछले साल भी कुमाऊं में आग बुझाने गए वन कर्मियों की मौत हुई थी। सवाल है कि इस आग को समय रहते क्यों नहीं बुझाया गया और हर साल उत्तराखंड के जंगलों में यह आग लगना क्या सामान्य है? मई माह में उत्तराखंड के जंगल झुलस रहे हैं, अभी जून माह बाकी है।
उत्तराखंड के जंगलों में आग का यह सिलसिला 1995 की गर्मियों में शुरू हुआ था। तब से हर साल आग की विशालकाय लपटें हिमालय की हरीतिमा के एक बड़े हिस्से को कालिमा और राख में तब्दील कर रही है। इस आग से हर साल जहां हजारों की संख्या में हरे वृक्ष स्वाहा हो जाते हैं, वहीं वन्य जीवों की कई प्रजातियां झुलस कर मर जाती हैं। अब तो आग बुझाने जा रहे लोग भी इस भीषण आग की भेंट चढ़ जा रहे हैं। जन सहभागिता का अभाव, सुदूर गांव में संचार माध्यमों की कमी, जंग खाते अग्नि शमन यंत्र, वन विभाग के पास मैन पॉवर की कमी के चलते इस बार भी अब तक हजारों हेक्टर वन क्षेत्र अग्नि की भेंट चढ़ चुका है।
उत्तराखंड के जंगल असाधारण रूप से जल रहे हैं और यह आग हर साल बढ़ती ही जा रही है। अभी तक उत्तराखंड में डेढ़ हजार हेक्टेयर से अधिक जंगल आग की आगोश में समा चुका हैं। स्थिति बहुत खराब है। हिमालय के जंगल लगभग इंडोनेशिया के जंगलों जैसे हो गए हैं, जो गर्मी के मौसम में हमेशा आग से घिरे रहते हैं। इस साल अप्रैल-मई के माह में जंगलों की आग बेकाबू हो चुकी है। नैनीताल से लेकर पौड़ी तक पूरी घाटी में धुंध और धुआं फैलने से लोग खासे परेशान हैं। लोगों को सांस लेने में तकलीफ हो रही है। हर साल आग लगने की घटनाएं अब एक आम बात बन चुकी है, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद जंगलों के धधकने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। शुष्क मौसम के चलते जंगल की आग विकराल होती जा रही है।
हर साल आग लगती है, पर इस आग को बुझाने का सिस्टम नाकाफी है। देखा जाए तो वन विभाग के पास कितने बड़े पैमाने पर लगने वाली आग से निपटने की न तो क्षमता है और न ही इच्छा शक्ति। जिम्मेदार अफसर गाड़ियों में घूम कर जंगल में लगी आग का आकलन कर नुकसान की भरपाई के लिए बजट की रूपरेखा तय करते हैं, वहीं दूसरी ओर वन कर्मियों के हाथों में पुराने उपकरण थमाकर भीषण आग को बुझाने के लिए भेज दिया जाता है।
31 साल पहले 1995 में पहाड़ के जंगलों में भीषण आग लगी थी। तब लगभग छह हजार हेक्टेयर वन भूमि आग की भेंट चढ़ गई थी। उस भीषण दावानल की पुनरावृत्ति न हो, इसलिए तत्कालीन केंद्र सरकार ने आग लगने के कारणों और निवारण की रणनीति सुझाने के लिए इस्पात मंत्रालय के पूर्व सचिव आरपी खोसला की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, लेकिन समिति द्वारा सुझाए दिशा-निर्देशों को कभी लागू नहीं किया गया। दरअसल खोसला समिति की रपट का भी वही हश्र हुआ जो देश में अमूमन इस तरह की समिति की रिपोर्टों का होता है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
