समकालीन कला में महिला शरीर : सौंदर्य से प्रतिरोध तक
61वें वेनिस बिएनाले में ऑस्ट्रियाई कलाकार फ्लोरेंटिना होल्जिंगर द्वारा पीतल के एक विशाल घंटे के भीतर निर्वस्त्र होकर प्रस्तुत किया गया प्रदर्शन समकालीन कला जगत में तीखी बहस का विषय बन गया है। देखा जाए तो अपने शरीर को ही चेतावनी, प्रतिरोध और अभिव्यक्ति के माध्यम में बदल देने वाली यह प्रस्तुति केवल एक कलात्मक प्रयोग नहीं, बल्कि हमारे समय की सांस्कृतिक, नैतिक और राजनीतिक जटिलताओं को भी उजागर करती है। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या महिला शरीर की सार्वजनिक उपस्थिति को केवल नग्नता और अश्लीलता के चश्मे से देखा जाना चाहिए या उसे कलात्मक स्वतंत्रता और वैचारिक प्रतिरोध के रूप में भी समझा जाना चाहिए?-
स्त्री-देह का बदलता विमर्श
दरअसल, कला इतिहास में महिला शरीर सदैव आकर्षण, नियंत्रण, सौंदर्य और सत्ता के विमर्शों का केंद्र रहा है। अंतर केवल इतना है कि पहले स्त्री-देह को पुरुष कलाकार की दृष्टि नियंत्रित करती थी, जबकि आज अनेक महिला कलाकार स्वयं अपने शरीर को अभिव्यक्ति और प्रतिरोध के औजार के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। फिर भी पितृसत्तात्मक समाज में महिला शरीर अब भी विवाद का विषय बना रहता है। ऐसे समय में फ्लोरेंटिना होल्जिंगर का यह प्रदर्शन समकालीन कला में महिला शरीर की उपस्थिति, उसकी वैचारिक भूमिका और उससे जुड़ी नैतिक बहसों को नए सिरे से देखने का अवसर प्रदान करता है। स्पष्ट है कि समकालीन वैश्विक कला में अब महिला शरीर केवल सौंदर्य या आकर्षण का विषय नहीं रह गया है, बल्कि वह सत्ता, प्रतिरोध, हिंसा, स्मृति, राजनीति और सामाजिक नियंत्रण के विमर्शों का सक्रिय स्थल बन चुका है। विशेषतः प्रदर्शन कला में महिला कलाकारों ने अपने शरीर को एक जीवित माध्यम की तरह प्रयोग करते हुए उन दृष्टियों और संरचनाओं को चुनौती दी है, जिन्होंने सदियों तक स्त्री-देह को केवल देखने योग्य वस्तु के रूप में स्थापित किया था। जाहिर है ऐसे में 61 वें वेनिस बिएनाले में ऑस्ट्रियाई कलाकार होल्जिंगर द्वारा प्रस्तुत घंटी-प्रदर्शन इसी परंपरा का एक उग्र और विवादास्पद उदाहरण है। क्योंकि यहां फ्लोरेंटिना होल्जिंगर का प्रदर्शन केवल एक दृश्यात्मक बिम्ब नहीं था। जहां वे एक विशाल कांस्य घंटी के भीतर उल्टी लटकी हुई थीं और अपने नग्न शरीर से उसके अंदर के हिस्सों पर प्रहार कर रही थीं। विदित हो कि घंटी की ध्वनि यूरोपीय सांस्कृतिक संदर्भों में चेतावनी, आपदा और सामुदायिक संकट का प्रतीक रही है।
घंटा, शरीर और जलवायु संकट
होल्जिंगर अपने इस प्रदर्शन से इसी प्रतीक को जलवायु संकट और पारिस्थितिक विनाश के संदर्भ में पुनर्परिभाषित करती हैं। ऐसे में यहां स्त्री-शरीर स्वयं चेतावनी का यंत्र बन जाता है। इस क्रम में शरीर ध्वनि पैदा करता है, पीड़ा सहता है और आसन्न संकट का सार्वजनिक उद्घोष करता है। किन्तु यह प्रदर्शन केवल पर्यावरणीय सक्रियता नहीं है। यह समकालीन कला में स्त्री-शरीर की बदलती भूमिका का भी उदाहरण है। बीसवीं सदी के मध्य तक आधुनिक कला में महिला शरीर प्रायः पुरुष कलाकार की दृष्टि के अधीन रहा। यवेस क्लेन ने अपनी एक चर्चित चित्र श्रृंखला में नग्न महिला मॉडलों को जीवित ब्रश की तरह उपयोग किया था। यहां स्त्री-शरीर कलाकार की अवधारणा का उपकरण मात्र था। इसके विपरीत होल्जिंगर स्वयं अपने शरीर की स्वामिनी बनकर सामने आती हैं। वे दर्शक की दृष्टि को नियंत्रित करने की कोशिश करती हैं। उनका शरीर निष्क्रिय वस्तु नहीं, बल्कि सक्रिय राजनीतिक वक्तव्य बन जाता है। इस परंपरा की सबसे प्रभावशाली कलाकारों में मरीना अब्रामोविच का नाम प्रमुख है। अब्रामोविच ने अपने शरीर को सहनशीलता, हिंसा और दर्शकीय सहभागिता के परीक्षण-स्थल में बदल दिया। उनकी प्रसिद्ध कृति “रिदम-0” (Rhythm 0) में उन्होंने दर्शकों को अपने शरीर के साथ कुछ भी करने की अनुमति दी थी। इस प्रदर्शन ने यह उजागर किया कि समाज स्त्री-शरीर के प्रति कितनी हिंसक और अधिकारवादी प्रवृत्ति रखता है। होल्जिंगर की कला इसी विरासत को आगे बढ़ाती है, किंतु अधिक शारीरिक उग्रता और दृश्य-नाटकीयता के साथ।
प्रदर्शन कला में शरीर की राजनीति
इससे पहले फ्रांसीसी कलाकार ओरलान ने अपने शरीर को प्लास्टिक सर्जरी के माध्यम से बदलकर सौंदर्य के पितृसत्तात्मक मानकों पर प्रश्न उठाए। इसी तरह एना मेंडिएटा ने अपने शरीर को मिट्टी, रक्त और प्रकृति के साथ जोड़ते हुए स्त्री-अस्तित्व और विस्थापन के प्रश्नों को व्यक्त किया। इन कलाकारों के यहां शरीर केवल जैविक सत्ता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक भूगोल है। भारतीय संदर्भ में भी महिला कलाकारों ने शरीर को प्रतिरोध और अनुभव के माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया है। नलिनी मलानी के वीडियो और इंस्टॉलेशन कला स्त्री-स्मृति, हिंसा और मिथकीय संरचनाओं को उद्घाटित करती है। वहीं एन पुष्पमाला ने फोटोग्राफिक परफॉर्मेंस के माध्यम से स्त्री-प्रतिनिधित्व और दृश्य संस्कृति की रूढ़ियों को विखंडित किया था।
क्या पीड़ा भी ‘दृश्य-उपभोग’ बन रही है
फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि क्या समकालीन प्रदर्शन कला में आत्मपीड़ा और नग्नता की बढ़ती प्रवृत्ति कभी-कभी “दृश्य-उपभोग” का हिस्सा नहीं बन जाती? होल्जिंगर का घंटी-प्रदर्शन जहां एक ओर जलवायु संकट की चेतावनी है, वहीं दूसरी ओर वह कला-बाजार और मीडिया की उस संरचना में भी शामिल हो जाता है, जहां पीड़ा स्वयं एक प्रदर्शनात्मक दृश्य में बदल जाती है। दर्शक कई बार संदेश से अधिक कलाकार के जोखिमपूर्ण शरीर को याद रखता है। आज समकालीन कला में महिला शरीर की उपस्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अब केवल प्रतिनिधित्व का विषय नहीं, बल्कि अर्थ-निर्माण की सक्रिय शक्ति बन चुका है। होल्जिंगर का यह घंटी-प्रदर्शन इसी परिवर्तन का ताज़ा उदाहरण है। क्योंकि यहां यह दर्शक को असहज करता है, आकर्षित करता है और विचलित करते हुए यह प्रश्न भी उठाता है कि क्या आज की दुनिया में आसन्न जलवायु एवं पर्यावरणीय संकट की चेतावनी देने के लिए कलाकार को अपने ही शरीर को संकट की घंटी बनाना पड़ेगा।
