क्यों बढ़ रहा है बाघ और मानव के बीच संघर्ष
बाघ जंगल का सबसे शक्तिशाली शिकारी अवश्य है, किंतु उसका स्वभाव निरंतर हिंसा से संचालित नहीं होता। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए, तो बाघ अत्यंत सतर्क, एकांतप्रिय और सीमित संपर्क पसंद करने वाला जीव है। वह सामान्य परिस्थितियों में मनुष्य से दूरी बनाए रखना चाहता है।
वन्यजीव वैज्ञानिकों के अनुसार बाघ की जैविक संरचना उसे “एम्बुश प्रीडेटर” अर्थात घात लगाकर शिकार करने वाला शिकारी बनाती है। वह खुलकर पीछा करने के बजाय छिपकर सही अवसर की प्रतीक्षा करता है। उसकी दृष्टि तीव्र होती है, श्रवण क्षमता अत्यंत संवेदनशील होती है और उसका पूरा व्यवहार ऊर्जा संरक्षण पर आधारित होता है। यही कारण है कि बाघ बिना आवश्यकता संघर्ष नहीं चाहता। वह अपनी शक्ति को बचाकर रखता है, क्योंकि जंगल में जीवित रहने के लिए ऊर्जा का संतुलन उसके अस्तित्व का आधार है।
किंतु जब यही बाघ अपने प्राकृतिक क्षेत्र से विस्थापित होने लगता है, जब उसके जंगल सिकुड़ते हैं, जब उसके पारंपरिक मार्गों पर सड़कें और मानव बस्तियां उग आती हैं, जब जंगल में शिकार कम होने लगता है, तब उसका व्यवहार बदलने लगता है। वह असामान्य क्षेत्रों की ओर बढ़ता है। कई बार खेतों, गांवों और मानव बस्तियों तक पहुंच जाता है। ऐसी परिस्थितियों में यदि अचानक उसका सामना मनुष्य से हो जाए, तो संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है। वैज्ञानिक अध्ययनों में यह पाया गया है कि अधिकांश मानव-बाघ संघर्ष योजनाबद्ध शिकार नहीं, बल्कि आकस्मिक आमना-सामना, भय, भूख, क्षेत्रीय तनाव अथवा शावकों की सुरक्षा से जुड़े होते हैं।
आज भारत इसी संकट के दौर से गुजर रहा है। उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र विशेषकर बहराइच, लखीमपुर, कतर्नियाघाट, पीलीभीत और दुधवा के आसपास पिछले कुछ महीनों में मानव-बाघ संघर्ष की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। स्थानीय वन विभागों और समाचार रिपोर्टों के अनुसार केवल हालिया एक महीने की अवधि में तराई क्षेत्र में दस से अधिक घटनाएं सामने आईं, जिनमें कहीं ग्रामीण घायल हुए, कहीं पशुधन मारा गया और कहीं बाघों को आबादी वाले क्षेत्रों के निकट देखा गया। कई गांवों में रात के समय लोग सामूहिक रूप से पहरा देने को विवश हुए। खेतों में जाने से भय का वातावरण उत्पन्न हो गया।
वहीं महाराष्ट्र के चंद्रपुर क्षेत्र में घटी वह भयावह घटना, जिसमें तेंदूपत्ता संग्रह करने गई चार महिलाओं को एक बाघिन ने मार डाला, पूरे देश के लिए चेतावनी बन गई। जंगल की नि:स्तब्धता अचानक चीखों और भय में बदल गई। विदर्भ क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में मानव-बाघ संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। महाराष्ट्र वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि केवल विदर्भ क्षेत्र में ही हर वर्ष अनेक लोग बाघ हमलों में जान गंवाते हैं। चंद्रपुर, ब्रह्मपुरी और ताडोबा के आसपास बढ़ती घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जंगल और मानव बस्तियों के बीच की दूरी तेजी से घट रही है। यह स्थिति केवल स्थानीय समस्या नहीं है, यह भारत की पर्यावरणीय और विकास संबंधी नीतियों के सामने खड़ा गंभीर प्रश्न है।
भारत आज विश्व के लगभग 75 प्रतिशत जंगली बाघों का घर है। वर्ष 2006 में देश में बाघों की संख्या लगभग 1411 थी। 2010 में यह संख्या 1706 हुई, 2014 में 2226, 2018 में 2967 और 2022 में बढ़कर 3167 तक पहुंच गई। यह उपलब्धि निस्संदेह भारत की संरक्षण नीति की सफलता का प्रमाण है। “प्रोजेक्ट टाइगर” ने विश्व स्तर पर भारत की पहचान एक सफल संरक्षण मॉडल के रूप में स्थापित की। इस सफलता का एक दूसरा पक्ष भी है। बाघों की संख्या तो बढ़ी, परंतु जंगल उसी अनुपात में नहीं बढ़े। कई क्षेत्रों में तो वन क्षेत्र और अधिक सिकुड़ गए। सड़कें, रेलवे लाइनें, खनन परियोजनाएं, औद्योगिक विस्तार और कृषि विकास ने प्राकृतिक जंगलों को छोटे-छोटे खंडों में विभाजित कर दिया।
पर्यावरण विज्ञान में इसे “हैबिटैट फ्रैग्मेंटेशन” अर्थात आवास विखंडन कहा जाता है। यह किसी भी बड़े शिकारी जीव के लिए अत्यंत खतरनाक स्थिति होती है। बाघ को विशाल क्षेत्र चाहिए। एक वयस्क नर बाघ को लगभग 60 से 100 वर्ग किलोमीटर तक का स्वतंत्र क्षेत्र चाहिए होता है। मादा बाघिन को भी अपने शावकों के पालन-पोषण के लिए सुरक्षित जंगल चाहिए। जंगल जब खंडित हो जाते हैं, तब युवा बाघ नए क्षेत्रों की तलाश में जंगलों से बाहर निकलते हैं। यही वह चरण होता है, जब वे मानव बस्तियों, खेतों और गांवों तक पहुंच जाते हैं।
बाघ का व्यवहार अत्यंत परिस्थितिनिष्ठ होता है। वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि सामान्य परिस्थितियों में वह मनुष्य को अपना प्राथमिक शिकार नहीं मानता। किंतु कुछ स्थितियां उसके व्यवहार को आक्रामक बना देती हैं। यदि बाघ घायल हो जाए, बूढ़ा हो जाए, उसके दांत या पंजे क्षतिग्रस्त हो जाएं अथवा प्राकृतिक शिकार की कमी हो, तो वह अपेक्षाकृत आसान लक्ष्य की ओर आकर्षित हो सकता है। कई बार खेतों में झुककर काम करते किसान या जंगल में अकेले चलते ग्रामीण उसे प्राकृतिक शिकार जैसे प्रतीत होते हैं।
मादा बाघिनों का व्यवहार विशेष रूप से संवेदनशील होता है। यदि उनके साथ शावक हों, तो वे अत्यधिक रक्षात्मक हो जाती हैं। जंगल में अचानक निकट पहुंचने वाला व्यक्ति उनके लिए खतरे के रूप में दिखाई दे सकता है। चंद्रपुर की घटना के बाद विशेषज्ञों ने यह संभावना व्यक्त की थी कि बाघिन अपने शावकों के साथ थी और उसने रक्षात्मक आक्रमण किया। यहां यह समझना भी आवश्यक है कि बाघ का पूरा जीवन ऊर्जा संतुलन पर आधारित होता है।
वह अनावश्यक संघर्ष से बचता है, क्योंकि हर हमला उसके लिए ऊर्जा की भारी खपत है। यदि उसे जंगल में पर्याप्त शिकार उपलब्ध रहे, तो वह सामान्यतः मनुष्यों की ओर नहीं आता। आज आवश्यकता किसी एक पक्ष की विजय की नहीं, बल्कि संतुलन की है। बाघ को बचाना भी आवश्यक है और मानव जीवन की सुरक्षा भी। यह तभी संभव होगा जब विकास, पर्यावरण और समाज के बीच संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाए। यदि मनुष्य यह सत्य भूल जाएगा, तो जंगलों से आती गर्जना भविष्य की सबसे बड़ी चेतावनी बन जाएगी। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
