नवाबों का शहर और जायके का सफर: लखनऊ का शाही दस्तरख्वान और अवधी पाक-कला की अनूठी विरासत
लखनऊः लखनऊ के अवधी व्यंजन जगप्रसिद्ध हैं। यहां के नवाबों ने खानपान के बहुत से व्यंजन चलाए हैं। व्यंजन खुशरंग, सुगंधित और स्वादिष्ट होता है, तो उससे पेट ही नहीं भरता, बल्कि लज्जत और स्वाद के उस मापदंड पर खरा उतरता है, जो कोई न कोई संस्कृति शताब्दियों के बाद उत्पन्न करती है। मुगलकाल में अवध प्रांत अपनी समृद्धि के लिए विख्यात था। यहां के नवाब वाजिद अली शाह अपने शाही अंदाज और शान-ओ-शौकत के लिए मशहूर थे। उन्हें लजीज खाने का बेहद शौक था। शाही रसोई में उनके खानसामे तरह-तरह के मुगलई लजीज पकवान बनाया करते थे और वहां ये पारंपरिक पकवान आज भी बेहद पसंद किए जाते हैं। गरम मसालों की खुशबू से भरपूर लज्जतदार अवधी व्यंजन आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं। नवाबी दौर में लजीज व्यंजनों की अवधी पाकशैली अपने उरूज पर थी।
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पाक कला के माहिर अवध के बावर्ची और रकाबदारों ने मसालों के अतिविशिष्ट प्रयोग से अवध की खान पान परंपरा को अद्वितीय लज्जत बख्शी और इसे कला की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। अवध के बावर्चीखाने ने जन्म दिया पाक कला की दम पद्धति को, जिसमें व्यंजन कोयले की धीमी आंच पर पकाए जाते थे। पकाते समय भाप पतीली से बाहर न निकले इसके लिए सने हुए आटे की लोई को पतीली के ढक्कन के किनारों पर चिपका दिया जाता था। लखनऊ की बिरयानी का खास स्वाद दम शैली से बिरयानी बनाने के कारण आता है और यही इसे हैदराबादी बिरयानी से अलग भी करता है। अवधी खाने की विशेषता मसालों और अन्य सामग्रियों के एक खास संतुलन से उत्पन्न स्वाद से जानी जाती थी और यह आज भी परंपरा जीवित है।
दस्तरख्वान: केवल भोजन नहीं, एक संस्कृति
महान विद्वान टीएस इलियट के अनुसार, जब किसी सभ्यता का पतन होने को होता है, तो सबसे पहले उसका दस्तरखान उलटता है। दस्तरखान केवल शाही दरबार अमीरों के महलों और रइसों के दरबारों और ड्योढ़ियों तक सीमित नहीं था। सामान्य घरों में भी लखनऊ का दस्तरखान अपनी बेमिसाली के लिए मौजूद था। तबाखीर के फनकारों का एक वर्ग था, जिसने नमकीन और मीठे व्यंजनों की तैयारी और उपलब्धता में अपनी फनकारी के कमाल दिखाए थे। लखनऊ की रीतियों की जानकारी रजबअली बेग सुरूर और अब्दुल हलीम शरर की तहरीरों (रचनाओं) से भी मिलती है, जिसे पंडित रतननाथ ने अपनी पुस्तकों में इंगित किया है। पुस्तकों में इसका प्रत्यक्ष कम, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से संदर्भ और उऋ ण अधिक मिलते है। शायद लखनऊ के दस्तरखाना की खोदई इतिहास, इसकी स्वच्छता, कोमलता व मृदुलता का स्तर इतिहास के बिखरे हुए पृष्ठों में तलाश करने की बात है। इनके मूल्यांकन करने के उपरांत जरूर इसी खोई हुई चीज को प्राप्त करने का पता चल सकता है। इससे कहीं ज्यादा उत्साहवर्धक बात यह है कि बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में भी लखनऊ वालों के मिले-जुले स्मरण में अपने दस्तरखान की अनुपामता और परख की चेतना बाकी है, बावर्चियों और तबाखों के गुजरे हुए फन के उत्तराधिकारी आज भी मौजूद है, जो बहुत कुछ भल जाने के बावजूद भी बहुत कुछ नहीं भूल सके हैं।
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लखनऊ का प्रसिद्ध रोटी बाजार
रोटियों में शीरमाल, कुल्चा, रूमाली की मांग सबसे ज्यादा होती है, अन्य तरह की रोटियों की मांग मोहर्रम और रमजान में बढ़ जाती है। आर्डर तैयार करने में कारीगरों को 12 घंटों के बजाय 18 घंटे या उससे अधिक काम करना पड़ता है। क्योंकि रमजान के महीने में बिक्री का समय दिन में न होकर देर शाम से पूरी रात चलता है यानी शाम चार बजे से सुबह चार बजे तक। इस इलाके में बनने वाली तमाम रोटियों में से सर्वाधिक बिक्री शीरमाल की ही होती है। केसरी रंग वाली शीरमाल मैदे, दूध व घी से बनती है, जो बहुत ही खास्ता और सुस्वादु होती है। तंदूर में पकाने के बाद इन पर खुशबू के लिए घी लगाया जाता है। शीरमाल ‘कबाब’ और कोरमे की लज्जत बढ़ाती है। शीरमाल का वजन के हासिब से रेट तय होता है यानी 110 ग्राम से 200 ग्राम की शीरमाल 4 से 7 रुपये प्रति पीस बिकती है। इस गली के बाहर ही कई नामी होटल हैं, जहां स्पेशल शीरमाल तैयार की जाती है। विशेषज्ञ के अनुसार शाही खाने में गिनी जाने वाली बाकरखानी रोटी अमीरों के दस्तरखान की बहुत ही विशिष्ट रोटी थी। इसमें मेवे और मलाई का मिश्रण होता है। ये नाश्ते में चाय का आनंद बढ़ा देती है। कारीगर बताते हैं कि बाकरखानी और ताफतान की मांग अब कम ही हो चली है। नान की मांग आम दिनों में कम रहती है। लोग शादी-ब्याह या खास अवसर पर आर्डर देकर नान बनवाते हैं। नान को नर्म व स्वादष्टि बनाने के लिए मैदे में दूध, दही, घी और रवा मिलाया जाता है। एक उक्ति के अनुसार लखनऊ के व्यंजन विशेषज्ञों ने ही परतदार पराठे की खोज की है, जिसको तंदूरी परांठा भी कहा जाता है। इन पराठों को तंदूर में तैयार किया जाता है। पराठे नर्म रहे इसलिए इन्हें पानी की छीटें देकर उस पर घी से तर किया जाता है। ईरान से आई रोटी यानी कुलचा पर स्थानीय प्रभाव रहता है। इसी तरह लखनऊ वालों ने भी कुलचे में विशेष प्रयोग किए। कुलचा नाहरी के विशेषज्ञ कारीगर हाजी जुबैर अहमद के अनुसार कुलचा अवधी व्यंजनों में शामिल खास रोटी है, जिसका साथ नाहरी बिना अधूरा है। लखनऊ के गिलामी कुलचे यानी दो भाग वाले कुलचे उनके परदादा ने तैयार किए। कुलचे रिच डाइट में आते हैं और जुबैर साहब के अनुसार अच्छी खुराक वाला आदमी भी तीन से अधिक नहीं खा सकता है। कुलचे गर्म खाने में ही मजा है यानी तंदूर से निकले और परोसा जाए।
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ईरान से लखनऊ तक कुलचे का सफर
कुलचा ईरान और अफगानिस्तान से आया था और हिंदुस्तान में हर जगह फैल गया था। लखनऊ वालों में भी कुलचे में विशेष प्रयोग किए और उसका तिकोना आकार सुनिश्चित किया। इसके अंदर परत पैदा किए और इस प्रकार इसको नहारी से जोड़ा। लखनऊ का कुलचा पूरे हिंदुस्तान में अपनी व्यक्तिगत पहचान रखता है। इसकी लज्जत और नफरासत बेमिसाल हैं। नहारी भी अपने विशेष मसालों और उनक समिश्रण से भिन्न स्वाद रखती है, जो अन्य स्थानों की नहरी में नहीं मिलती। लखनऊ की नहारी अपने विशेष मसालों और गोश्त की बेटियों से तैयार होती है। लखनऊ के दस्तरखान ने कोरमा और चपाती की नफासत और लताफत को आसमान तक पहुंचा दिया था। चपाती का बारीक, नरम और लाल चित्तीदार होना जरूरी शर्त थे। निपुण बावर्ची पावभर आटे की सोलह चपातियां तवे से उतार लेते थे, जो ठंडी होने पर भी नर्म रहती थी। इनका जोड़ कोरमा था, जो बेहतरीन गोश्त से तैयार किया जाता था। कोरमा में तैयारी के बाद भी शोरबा बिल्कुल नहीं होता था। इसके विशेष मसालें, गोश्त के गुण और घी के तार के कारण कोरमा अधिक स्वादिष्ट होता था। रस पैदा करने में धीमी आंच में पकने का भी दखल था और बालाई-बादाम और घी के तार को भी। लखनवी दस्तरखान पर शोरबादार सालन भी नजर आता है। उनका स्वाद अलग शान रखता है। कोरमें मंे हल्दी नहीं पड़ती थी। सालनों के मसाले मंे हल्दी शामिल थी। दरबारों से ज्यादा आम घरों मंे सालन का चलन था। फिर भी तरकारीदार सालन सब पसंद नहीं किए जाते थे। तली अरुई और तले आलू के सालन का विशेष महत्व था। उनके पकाने में बड़ी निपुणता और देख-रेख से काम लिया जाता था। कीमा, कोफता और कबाब खासोआम के दस्तरखान की शोभा होते थे। मात्रा में पिसे हुए चावल कम मात्रा में डालकर इस प्रकार पकाया जाता है कि वह मिलकर एक हो जाए और ठंडा होने पर जम सके।
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फिरनी और बालाई: मिठास का लखनवी अंदाज
फिरनी मिट्टी के प्यालों में सोंधेपन और लताफत की वजह से लखनवी इच्छा की पूरी तरह तस्दीक करती थी और गली-कूचों व बाजारों में बालाई की तरह सामान्यतौर पर मिलती थी। यह परंपरा अब भी है और बालाई व फीरनी की कद्रदानी में लखनऊ वाले सबसे आगे हैं। लखनऊ में मिठाइयों, मुरब्बों और हलुवों की तैयारी पर पूरा प्रभाव डाला। यही बर्फी, कलाकंद, गुलाबजामुन, इमरी, जलेबी, नुक्ती और लड्डू जैसी सामान्य मिठाइयों की लज्जत, रंगत और स्वाद का मापदंड कारीगर हलवाइयों ने ऐसा उठाया कि समस्त अवध, बल्कि उत्तर भारत के दक्षिण तक उनके नाम की तूती बोलने लगी। इन विशेषज्ञों की बड़ी संख्या लखनऊ से निकलकर देश में फैली और लखनऊ का नाम रोशन किया। इन मिठाइयों की तरह मुरब्बा सब्जी भी लखनऊ में महत्व रखती थी। लखनऊ जब चरमोत्कर्ष दौर में था, तब बावर्चिचों, दबाखों, मुरब्बासाजों के घराने, मुहल्ले और क्षेत्र ख्याति रखते थे। वह अपने खानदानी फन व पेशे के विकास पर पूरा ध्यान देते थे। साथ ही नई-नई विधियों की खोज से काम लेकर हर एक को प्रभावित करते थे। मुरब्बासाजी के क्षेत्र में सेव, बही, आंवला जैसे मुरब्बों को दिलों-दिमाग की ताजगी और पाचनशक्ति बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाता था। सब्जियों और तरकारियों के पकाने में लखनऊ के विशेषज्ञ बावर्चिचों ने अपने फन में निपुणता से काम लिया। हर एक तरकारी को अनेक ढंग से पकाने की विधि, सब्जियों के पकवाने में एक नया स्वाद पैदा किया। हामिद अली खां बैरिस्टर ने इस शताब्दी के पहले दशक में अपने एक माहिर बावर्ची का उल्लेख किया है, जो केवल भिंडी की सब्जी को अस्सी विभिन्न तरीकों से पकाता था और हर हांडी का स्वाद अलग होता था।
मिठाइयों और मुरब्बों की समृद्ध विरासत
लखनऊ का दस्तरखान सैकड़ों किस्म के नमकीन और मीठे खाने से सुसज्जित था। दास्ताने अमीर हमजा, तिल्समें होशरुबा और दूसरी दास्तानों में पकवानों के सैकड़ों नाम मिलते है हर व्यंजन की अनेक किस्मों की ओर इशारा मिलता है। लेकिन ओरिजनल अवधी खाने की खुश्बू से अभी भी लोग उतने ही दूर है जितनी दूर अवध का दौर गुजर चुका है। ढेर सारी रिसर्च और गुजरे वक्त की बहुत सी किताबों को खंगालने के साथ-साथ ही ढेारों एक्सपटर्स से बाचतीत की है। क्या है, अवधी खाना? ज्यादातर लोग अवधी खाना का मुगलई खाना के इर्द-गिर्द की चीज मानते है। लेकिन यह बिल्कुल गलत है। दरअसल ईरानी और अवधी कायस्थों के बावर्चीखाना से मिलकर निकली खाने की खुशबू को अवधी दस्तरख्वान कहा जाता है। अवधी खाना मुगलई खानों की तुलना में इस्तेमाल कम किया जाता है। जिससे इसेहजम करना आसान होता है और यह जल्दी हजम होने वाले खानों में शुमार किया जाता है। अवधी खानों में ड्राई-फ्रूट, जाफरान, जड़ी बूटियां, लहसुन, अदरक, काली मिर्च, प्याज, छोटी और बड़ी इलायची, का इस्तेमाल होता है। अवधी खाने की खास बात यह होती है कि इसमें मसाले नहीं,बल्कि मसालों के जूस को डाला जाता है। अवधी खाने शोरवेदार होता है और इसमे पोटली बना कर अदरक-लहसुर आदि डाला जाता है। यही नहीं, खाना बनाते समय मलाई और दूध का भी इस्तेमाल किया जाता है।
तले आलू का सालन- तले आलू का सालन अवध की बहुत ही मशहूर डिश है। इसे बड़ी महफिलों और बड़े आयोजनों में बनाया जाता है। इसको बनाने में ख्याल यह रखना चाहिए कि जो आलूम खरीदे गये है वे साइज में बड़े हों। आलू को दो टुकड़ों में काट दिया जाता है। और उसको सरसों के तेल में तला जाता है। सबसे बड़ी कला आलूओं को तलना है। हल्की आंच पर आलू कोतब तक तलें,जब तक वह हल्के सुर्ख न हो जाएं। हल्के हाथ से तले जिससे आलू न टूटे, न जले, आलू के सालन की खूबसूरती इसकी लालिमा लिए रंगत और आलुओं का ठोस होना है। उसके बाद गोश्त को अच्छी तरह से धोकर, मसालों में पकाया जाता है। नहारी में ग्रेवी गाढ़ी होती है,तो तले आलू के सालन में पतली। पतला सालन बना कर आलू उसमें डाल दिये जाते है। मसाले सभी नहारी वाले ही पड़ते है, लेकिन यह पोटली वाले नहीं होते। तले आलू का सालन गर्म-गर्म खाया जाए और कोशिश करें कि इसे लखनवी खमीरी रोटी के साथ खाएं।
अरहर की दाल- 21 वीं सदी में अरहर की दाल पानी में बनाई जाती है, लेकिन दौरे अवध में अरहर की दाल दूध के साथ बनाई जाती थी। दाल को धोकर हल्की आंच पर पतीली में चढ़ा दिया जाता था। उसमें इतना दूध डाला जाता था, जितने में दाल डूब जाए। दाल को पकने में कम से कम चार घंटे लगते। हां, आप भी ट्राई करें तो बीच-बीच में इसमें मलाई डालना मत भूलिये। क्या क्या जरूरी है ? मसाले, अदरक, लहसुन, प्याज, नमक-मिर्च स्वादानुसार, हल्की सी सफेद मिर्च, हल्की सी कली और लाल मिर्च, भुना जीरा, हल्का सा गरम मसाला, खुशबू के मसाले, इलायची, जावित्री और लौंग।
शेफ एडवाइज- अरहर की दाल बनाते समय टोंड मिल्क का इस्तेमाल करें, तो बेहतर है। अगर ऐसा संभव नहीं है, तो दूध में पानी मिला लें। दाल-दूध पी लेती है, इसलिए बीच-बीच में हल्के हाथ से चलाते रहें। हां पतीली पर ढका ढक्कन पूरा न हटाएं, बस उतना ही हटाएं, जितने से कफगीर (उबाल) पतीली में चली जाए। मलाई का इस्तेमाल करेंगे, तो दाल सोंधी बनेगी और टेस्टी होगी। एक बात का ख्याल रहे कि दाल को सर्व करते समय बघार असली घी और लहसुन का लगाएं। पतीली में इतना दूध हो कि दाल उसमें पूरी तरह से डूब जाए।
ताफतान- मैदे में खमीर पैदा करके हल्की मिठास के साथ बनाई जाती है। ताफतान यह अफगानी रोटी है। किसी जमाने में लखनऊ में इसका बहुत चलन था। इसे मैदे से बनाया जाता है। मैदे में खमीर पैदा करके हल्की मिठा के साथ बनाया जाता है। इसे घी में गूंधा जाता है और तंदूर में बनाया जाता है।
शीरमाल की रोचक कहानी- शीरमाल की शुरुआत गाजीउद्दीन हैदर के जमाने में हुई थी। नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने रोटियों का कंपटीशन करवाया था। उसी कंपटीशन में शीरमाल अपने अस्तित्व में आई। शीरमाल में शीर का मतलब दूध और माल का मतलब घी। इन दोनों चीजों को मैदे में अच्छी तरह से गूंधा जाता है और गूंधे हुए मैदे से बनी रोटी को शीरमाल कहते हैं। सबसे पहले मैदे और दूध को घी में गूंध लिया जाता है। फिर अलग-अलग पेड़ों (लोईया) में बांट दिया जाता है। फिर कच्ची घास से बनी हुई कपड़े की गद्दी पर इस पेड़े को फैला दिया जाता है। उसके बाद तंदूर में लगाया जाता है और उस पर दूध या फिर जाफरान का छिड़काव होता है, जिसने भी शीरमाल को खाया है, वह यह बात जानता होगा कि शीरमाल के ऊपरी हिस्से में एक हल्का सा कट लगा होता है। इस कटे हुए हिस्से की भी अपनी पुरानी कहावत है। नवाब साहब ने जब कंपटीशन के बाद रोटियों को चखा और शीरमाल को पहला प्राइज मिला, तो जिस हिस्से को काटकर छोड़ा था उसकी याद में आज भी शीरमाल में यह कट लगाया जाता है।
इतिहास के झरोखे से
अवध के दौर का यह ऐसा किस्सा है, जिसकी चर्चा लगभग सभी जगह होती है। नवाब आसिफुद्दौला को अरहर की दाल बहुत पसंद थी। खासा (वह जगह जहां खाना बनता है) में इस दाल को पकाने के लिए स्पेशल कुक हुआ करता था। बाबा काजमी किताबों के हवाले से बताते हैं कि नवाब साहब को सर्व की जाने वाली दाल के बघार में, सोने की गिन्नी बुझा दी जाती थी और नवाब साहब उस दाल को चमचे से खा लिया करते थे। किस्सा यह है कि बावर्ची को दाल बनाने के लिए एडवांस में 200 गिन्नियां दी जा चुकी थीं। जैसा कि होता है किसी ने नवाब साहब के कान में यह बात डाल दी कि बावर्ची गिन्नी अपने पास रख लेता है, उसे खाने में नहीं डालता। नवाब साहब ने यह बात जब बावर्ची से पूछी, तो बावर्ची को गुस्सा आ गया और उसने एक करिश्मा नवाब साहब के सामने किया। थाल में बुझाई जा चुकी गिन्नियां रखी थीं। नवाब साहब ने जैसे ही उन गिन्नियों में एक गिन्नी को छुआ, वह बुरादा बन गई। नवाब साहब समझ गए कि असलियत क्या है? लेकिन इस घटना के बाद उस बावर्ची ने शाही बावर्ची खाना छोड़ दिया और नवाब साहब ने अरहर की दाल को।
बावर्ची और तबाखों की फनकारी
लखनऊ के माहिर बावर्चियों एवं तबाखों की सबसे बड़ी विशेषता एवं पहचान (अनुपमता) है। पकाने की विधि, मसालों का चयन और उनके प्रयोग में एक विशेष अनुपात का ध्यान आज भी लखनऊ के दस्तरखानों की अलग पहचान है। बुजुर्ग पीढ़ी की बेगमों, महिलाओं और घरवालियों को दुनिया से बिदा होते हुए देखा है, जो अपने हाथ से हांडी पकाने को अपना परम कर्तव्य समझती थीं। खाने को स्वादिष्ट एवं मजेदार बनाने के गुर जानती थी। उनकी रुचि नफासत और लताफत को नित्य प्रति के पकवान में भी बरकरार रखता था। हमारी नानियों, दादियों और माताओं तक अपनी संस्कृति की परंपरा जीवित रही। किसी के पकाए हुए खाने में लज्जत, स्वाद और मृदुलता न हो, तो बड़ी-बूढ़ियां किस घृणित स्वर से कहती थीं कि- “छछुंदर मारी थी कि हाथ में जायका ही नहीं।”
अरब व गैरअरब से लेकर भारत तक तंदूर की गर्म बाजारी शताब्दियों से चली आ रही है। तंदूरी रोटी, नान खमीर की परंपरा शताब्दियों से चली आ रही है। ऐसी ही रोटियां यहां के एक पुराने बाजार में आज भी मिलती हैं, बल्कि ये बाजार रोटियों का बाजार ही है। अकबरी गेट से नक्खास चौकी के पीछे तक यह बाजार है, जहां फुटकर व सैकड़े के हिसाब से शीरमाल, नान, खमीरी रोटी, रूमाली रोटी, कुल्चा जैसी कई अन्य तरह की रोटियां मिल जाएंगी। पुराने लखनऊ के इस रोटी बाजार में विभिन्न प्रकार की रोटियों की लगभग 15 दुकानें हैं, जहां सुबह नौ से रात नौ बजे तक गर्म रोटी खरीदी जा सकती है। कई पुराने नामी होटल भी इस गली के पास हैं, जहां अपनी मनपसंद रोटी के साथ मांसाहारी व्यंजन भी मिलते हैं।
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पुलाव की ईजाद और नवाबी रसोई
दूध के अंदर मसाले डालकर झोल तैयार किया जाता है। यकनी मसालों का दूध और पसरे हुए चावलों को तीन स्टेप में दम किया जाता है। अवध एक ऐसी जगह है, जहां पुलाव की ईजाद हुई। पुलाव और बिरयानी में फर्क है। यह दोनों डिशेज देखने में भले ही लगभग एक जैसी लगती हों, लेकिन स्वाद में बिल्कुल अलग होती है। दिखने मंें नफीस और खूबसूरत चीज है। बिरयानी में मसाले आदि सामने ही दिखाई दे जाएंगे, जबकि पुलाव में मसाला का फ्लेवर मिलेगा। मसालों की रंगत नही दिखाई देगी,जबकि स्वाद मिलेंगे। लखनवी पुलाव की शुरुआत नवाब आसिफद्दौला के जमाने में की गई, उस समय का फेमस बावर्ची सज्जू की यह ईजाद है, जब बड़ा इमामबाड़ा बन रहा था। उस समय जरूरत ऐसे खाने की थी, जो बल्क मेंे तैयार हो जाए और नवाब भी खा सकें। नवाब अपने किसी खास डिश को बनवाना नहीं चाहते थे। इसमें गोश्त की मसालों के साथ भुनाई की जाती है। दूध के अंदर मसाले डालकर खोल तैयार किया जाता है। मसालों का दूध और पसारे हुए चावल तीन स्टेप में पुलाव को दम किया जाता है। सबसे पहले गोश्त के साथ यकनी होती है। फिर दूसरे स्टेप में मसालेदार दूध डालना होता है। तीसरा स्टेप पसरे हुए चावल को यकनी और दूध के ऊपर डालकर आटे से ढक्कन को सील कर दिया जाता है और दम के लिए रखा दिया जाता है। दम का मतलब हल्की आग में पकाना।
अवधी मसालों का विज्ञान तकरीबन 42 तरह के मसाले पड़ते हैं। मुख्य रूप से इलायची, जावित्री, जायफल, तेजपत्ता, छोटी इलायची, कालीमिर्च, लाल मिर्च, खड़ा नमक, संदल बुरादा, बालझड़ इसी तरह के मसाले होते है और होती है।
