लोक की वह आवाज, जिसमें अब भी गाते हैं गांधी
लोकसंगीत इतिहास का विकल्प नहीं, उसकी जीवित स्मृति है। इतिहास तिथियों, घटनाओं और व्यक्तियों का क्रम दर्ज करता है, जबकि लोकगीत मनुष्य के अनुभव, उसकी संवेदना और उसके संघर्ष को अपने भीतर सुरक्षित रखते हैं। यही कारण है कि किसी समाज की लिखित परंपरा भले क्षीण पड़ जाए, उसकी लोकधुनें उसके सांस्कृतिक जीवन की गवाही देती रहती हैं। गांधी की हत्या के बाद बिहार के लोककवि रसूल मियां ने लिखा था-“के हमरा गांधीजी के गोली मारल हो…”। यह गीत बताता है कि लोक ने गांधी को किसी राजनीतिक महापुरुष के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवार के सदस्य की तरह याद किया। लोक की यही आत्मीयता उसे इतिहास से अलग और कहीं अधिक स्थायी बनाती है।
पिछले दो दशकों में लोकसंगीत भी बाजार की संस्कृति से अछूता नहीं रहा। विशेषकर भोजपुरी संगीत का एक बड़ा हिस्सा जिस तरह त्वरित लोकप्रियता और फूहड़ मनोरंजन की ओर मुड़ा, उसने लोक की मूल गरिमा को आहत किया। ऐसे समय में यदि कोई कलाकार लोकगीत को केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व मानकर गाता है, तो उसका महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। चंदन तिवारी ऐसी ही विरल लोकगायिका हैं, जिनके स्वर में भोजपुरी अंचल की मिट्टी की गंध, गंगा की निर्मलता और गांधी की नैतिक चेतना एक साथ सुनाई देती है। बिहार के भोजपुर जिले के बड़का गांव में जन्मी चंदन तिवारी का बचपन झारखंड के बोकारो में बीता। संगीत का पहला संस्कार उन्हें अपनी मां रेखा तिवारी से मिला। मां ने उन्हें केवल सुर नहीं सिखाए, बल्कि यह भी समझाया कि लोकगीत जीवन की भाषा हैं। बाद में उन्होंने शास्त्रीय संगीत का अध्ययन किया, किंतु उनकी वास्तविक शिक्षा गांव, खेत, नदी, आंगन और स्त्रियों की सामूहिक गायन परंपरा से हुई। यही कारण है कि उनके गायन में कृत्रिमता नहीं, जीवन की स्वाभाविक लय सुनाई देती है।
आज वे भोजपुरी, मैथिली, मगही, अवधी, नागपुरी और हिंदी में समान सहजता से गाती हैं। सोहर, कजरी, पूर्वी, निर्गुण, गंगा गीत और ऋ तु-गीत उनकी प्रस्तुतियों का हिस्सा हैं, लेकिन उनकी विशिष्ट पहचान गांधी गीतों से बनी है। उन्होंने उन लोकगीतों को खोजने और मंच तक पहुंचाने का काम किया, जो स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांव-गांव गूंजते थे। उनके लिए गांधी इतिहास की पुस्तक का अध्याय नहीं, लोकजीवन की नैतिक चेतना हैं। मेरी उनसे पहली मुलाकात बिहार के बांका में गांधी स्मृति दर्शन समिति, नई दिल्ली के एक कार्यक्रम में हुई। वरिष्ठ पत्रकार निराला जी मेरे आग्रह पर उन्हें वहां लेकर आए थे।
आयोजन का उद्देश्य गांधी को औपचारिक श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उन्हें समाज की जीवित स्मृति के रूप में पुनः स्थापित करना था। उस दिन मैंने देखा कि चंदन तिवारी मंच से अधिक लोगों के बीच सहज थीं। बड़ी संख्या में आए स्कूली बच्चों के बीच वे बैठ गईं। उनसे बातें कीं, गीतों के अर्थ समझाए और उन्हें लोकधुनें सिखाईं। बाद में गांधीवादियों के साथ पैदल चलकर गांधी प्रतिमा तक पहुंचीं। यह दृश्य प्रतीकात्मक अवश्य था, पर उसका संदेश स्पष्ट था- गांधी की प्रासंगिकता सभागारों से अधिक समाज के बीच है। वहीं पहली बार यह भी महसूस हुआ कि चंदन तिवारी की पहचान केवल एक सफल लोकगायिका की नहीं है। वे लोकसंगीत को समाज से संवाद का माध्यम मानती हैं। उनके लिए गीत प्रस्तुति नहीं, सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। शायद इसी कारण उन्हें सुनते हुए बार-बार लगता है कि लोक अतीत का अवशेष नहीं, वर्तमान की एक जीवित नैतिक शक्ति है।
चंदन का संगीत दृढ़ सांस्कृतिक प्रतिरोध
चंदन तिवारी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे गांधी को वैचारिक विवादों के बीच नहीं, लोकस्मृति के भीतर खोजती हैं। उनके गीतों में चरखा केवल सूत कातने का औजार नहीं, श्रम और स्वावलंबन का प्रतीक है। सत्याग्रह केवल राजनीतिक प्रतिरोध नहीं, मनुष्य की नैतिक शक्ति का रूप है। यही कारण है कि उनके गांधी गीत किसी नारे की तरह नहीं, लोकजीवन के स्वाभाविक अनुभव की तरह सुनाई देते हैं। वे उन भोजपुरी गांधी गीतों को फिर से सामने लाती हैं, जो कभी गांवों की चौपालों, प्रभात फेरियों और स्त्रियों के सामूहिक गायन का हिस्सा थे।
आज जब लोकसंगीत का बड़ा हिस्सा बाजार की शर्तों पर खड़ा दिखाई देता है, तब चंदन का सांगीतिक सफर एक वैकल्पिक सांस्कृतिक दृष्टि प्रस्तुत करता है। वे लोक की गरिमा से समझौता किए बिना आधुनिक मंच तक पहुंचती हैं। उनके गायन में स्त्रियों के श्रम, गांवों की स्मृतियां, नदियों की संस्कृति और मानवीय संवेदना एक साथ उपस्थित रहती हैं। वे यह याद दिलाती हैं कि लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, समाज की नैतिक पूंजी हैं।
भारतीय समाज की सांस्कृतिक शक्ति उसकी विविध लोकपरंपराओं में निहित है। यदि लोक की स्मृति नष्ट होती है, तो केवल गीत नहीं खोते, समाज अपनी आत्मा का एक हिस्सा भी खो देता है। ऐसे समय में चंदन जैसी कलाकारों का महत्व और बढ़ जाता है। वे परंपरा को अतीत की वस्तु नहीं बनने देतीं, बल्कि उसे वर्तमान से जोड़ती हैं। उनके स्वर में भोजपुरी मिट्टी की सोंधी गंध है, गंगा की अविरल धारा का संगीत है और गांधी की नैतिक चेतना का उजास भी।
आज जब सार्वजनिक जीवन में संवाद की जगह शोर और संस्कृति की जगह उपभोग का दबाव बढ़ता जा रहा है, तब चंदन का संगीत एक शांत, लेकिन दृढ़ सांस्कृतिक प्रतिरोध की तरह सामने आता है। वे हमें याद दिलाती हैं कि लोक केवल बीते समय की स्मृति नहीं, भविष्य की भी संभावना है। ऐसे स्वर जब तक जीवित हैं, तब तक भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना भी जीवित रहेगी। शायद यही कारण है कि चंदन तिवारी को सुनते हुए बार-बार लगता है। लोक अब भी गा रहा है, स्मृति अब भी सांस ले रही है और गांधी अब भी हमारे बीच उपस्थित हैं।
- कुमार कृष्णन, लेखक
