कैंपस का पहला दिन : जिम्मेदारी के भाव का सृजन

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Edited By Anjali Singh
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मेरा इंटर का परिणाम आ गया था। मन भय से ग्रसित था, क्योंकि इंटर की परीक्षा से थोड़े दिन पहले ही मेरे साथ एक सड़क दुर्घटना हुई थी,  जिसकी वजह से मैं परीक्षा में अपना अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाया था। स्नातक करने के लिए देश के प्रतिष्ठित हिंदू महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) में दाखिला लेना हर विद्यार्थी की तरह मेरा भी सपना था। परन्तु सड़क दुर्घटना के बाद मेरा आत्मविश्वास खो सा गया था। सड़क दुर्घटना मेरे सपनों की राह में बहुत बड़ी बाधा बनकर खड़ी हो गई। इसी बीच एक रिश्तेदार ने मुझसे कहा, “लल्ला हिंदू म दाखिला पाऊन के लए बहुत नंबर चहिए होत हंई।” यह बात मुझको लग गई और मुझ पर जुनून सवार हो गया। मेरे गुरुजनों का आशीष,  जिसे मैं हमेशा अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानता हूं, ने मुझे नीतिशास्त्र के श्लोक, “यथा खनन् खनित्रेण भूतले वसिस विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रुषुरधिगच्छति।”  अर्थात “जैसे कुदाल से खोदकर मनुष्य पाताल से जल प्राप्त करता है, वैसे गुरु के पास होने वाली विद्या सेवा से प्राप्त होती है ।”और फिर कोई भी कार्य बड़ी सरलता से पूरा हो जाता है। इसी की बदौलत मेरा पहली ही बार में देश के नंबर वन कॉलेज में दाखिला हो गया। 

वहां जाने से पहले मन में बहुत सवाल थे। जब हम कॉलेज के गेट पर पहुंचे तो यह महसूस किया कि हिंदू महाविद्यालय एक संस्था नहीं, बल्कि जीवंत परंपरा है। जैसे ही हम गेट के अंदर गए तो सीनियर छात्रों ने हमें चारों ओर से घेर लिया। हमें ऑडिटोरियम ढूंढने का प्रयत्न ही नहीं करना पड़ा। वे अपने आप ही हमें ऑडिटोरियम छोड़ गए। ऑडिटोरियम में प्रोफेसर तथा प्रिंसिपल मैंम के उद्बोधन से पता चला कि आखिर मैं एक संस्था ही नहीं, अपितु एक विशाल परंपरा का नवीन हिस्सा हूं और वास्तविक ज्ञान किसे कहते हैं इससे भी मैं उसी दिन परिचित हुआ। तत्पश्चात जब ऑडिटोरियम में विविध कार्यक्रम समाप्त हो गए, तो हमें विभाग के एक कक्ष में जाने को कहा गया। वहां विभाग के प्रोफेसर ने हमें प्रेरणादायक बातें बताईं, परंतु डॉ विजय गर्ग सर जिनका मुझे काफी आत्मिक संबंध है ने बड़ी अच्छी बात कही। उन्होंने कहा- “अगर तुम्हें दिल्ली में रहकर कुछ करना है, तो न कहना सीखना होगा।” बस यह बात मानों मेरे स्मृति पटल पर सदा के लिए अंकित हो गई। 
 

इसके पश्चात हम पूरे कॉलेज में भ्रमण के लिए आजाद थे। हमने कॉलेज में सर्वप्रथम रिसर्च सेंटर देखा, जो की रिलैक्सो रिसर्च सेंटर के नाम से प्रसिद्ध है। उसके ठीक सामने हमने न्यू एकेडमिक ब्लॉक देखा जो  नवीन पाठ्य सुविधाओं से परिपूर्ण था। फिर हमने एक ऐसी चीज देखी जो मेरे लिए मानो आकर्षण का केंद्र थी। एक आकृति जिसमें किताबों के ढेर के ऊपर से उड़ान भरते हुए एक पक्षी को दर्शाया गया था, जो ज्ञान और शिक्षा के जरिए मिलने वाली वैचारिक स्वतंत्रता और ऊंचे हौसलों का प्रतीक था। उसके पश्चात हम ओल्ड एकेडमिक ब्लॉक की तरफ गए। जहां मैं हिंदू की परंपरा की जीवंत सुगंध को महसूस किया। मन में खुशी और प्रेरणा दोनों का भाव था, जब यह पता चला की गौतम गंभीर तथा श्रीलंका की प्रधानमंत्री जैसी महान व्यक्तित्वों ने इन्हीं कक्षाओं में अपना सफल भविष्य बुना। इसके पश्चात हमने कॉलेज का तितली कुंड तथा वनस्पति उद्यान देखा सचमुच हम तीनों प्रकृति की जीवंतता को मानो प्रत्यक्षत: इतने करीब से पहली बार महसूस कर रहे थे। फिर हम वापस लौट आए। खासकर मेरे मन में खुशी और जिम्मेदारी दोनों का भाव था। खुशी इस विशाल परंपरा का अंग बनने की तथा जिम्मेदारी इस विशाल परंपरा को आगे बढ़ाने की अभी तक दोनों को निभाने में ही प्रयासरत हूं और आगे भी निरंतर रहूंगा। 

अग्निज उपमन्यु, हिंदू महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय

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