नाम बदला, सरकारें बदलीं, लेकिन नहीं बदला ‘KGMU’ से लखनऊ का रिश्ता
मच्छी भवन की जमीन से लेकर आधुनिक रोबोटिक सर्जरी तक, केजीएमयू ने सिर्फ डॉक्टर नहीं बनाए, लखनऊ की कई पीढ़ियों की जिंदगी को करीब से देखा है
चारबाग स्टेशन पर उतरकर जब कोई लाचार, रोता-बिलखता मरीज ऑटो वाले से कहता है न भैया, जरा केजीएमसी छोड़ देना... तो समझो उसने सीधे मेरे वजूद को आवाज दी है। कागजों और सरकारी फाइलों में भले ही मेरा नाम किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी दर्ज हो चुका हो, लेकिन लखनऊ की रग-रग से वाकिफ कोई भी शख्स मुझे आज भी सिर्फ और सबसे पहले केजीएमसी ही बुलाता है। चौक के पास, अवध की इस ऐतिहासिक सरजमीं पर मैं एक सदी से ज्यादा वक्त से सीना ताने खड़ा हूं। मैंने सिर्फ डॉक्टरों की फौज तैयार नहीं की, बल्कि लखनऊ के बदलते मिजाज, इसकी रवायत और सूबे की सियासत के कई रंग अपनी इन सफेद दीवारों पर झेले हैं। आइए आज मैं खुद आपको अपने वजूद की वो कहानियां सुनाता हूं, जो किसी मेडिकल की किताब के पन्नों में दर्ज नहीं मिलेंगी।
पैदाइश के पीछे की 'शाही जिद'
मेरा जन्म कोई इत्तेफाक नहीं था, बल्कि अवध के ताल्लुकेदारों और रइसों की एक आलीशान जिद का नतीजा था। बात साल 1905 की है, जब ब्रिटेन के प्रिंस ऑफ वेल्स जो बाद में किंग जॉर्ज पंचम बने, लखनऊ के दौरे पर आ रहे थे। यहां के रइसों ने तय किया कि शहजादे के स्वागत में कुछ ऐसा नायाब और ऐतिहासिक तोहफा बनाया जाए जो सदियों तक याद रहे। भारी-भरकम फंड इकट्ठा हुआ और 26 दिसंबर 1905 को खुद प्रिंस ऑफ वेल्स ने मेरी नींव रखी। साल 1911 में जब मेरी इमारतें पूरी तरह सज-धजकर तैयार हुईं, तो ठीक उसी साल दिल्ली दरबार में किंग जॉर्ज पंचम की भारत के सम्राट के तौर पर ताजपोशी हो रही थी। बस इसी शाही इत्तेफाक के सम्मान में मुझे नाम मिला किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज।
अस्पताल या नवाब का महल
लोग पहली बार मुझे देखते हैं, तो ठिठक जाते हैं। मैं अस्पताल कम किसी नवाब का महल ज्यादा लगता हूं। दरअसल जिस जमीन पर आज मैं खड़ा हूं, वहां कभी अवध के नवाबों का ऐतिहासिक और अभेद्य किला मच्छी भवन हुआ करता था। 1857 के गदर में अंग्रेजों ने उसे ढहा दिया था। बाद में, मशहूर ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर सैम्युल स्विंटन जैकब ने मेरे हुस्न को तराशा। उन्होंने राजपूत मुगल और यूरोपीय कला को मिलाकर ऐसा इंडो-सारेसेनिक ताना-बाना बुना कि मैं लखनऊ के भूगोल और इतिहास का एक अभिन्न हिस्सा बन गया। मेरी एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग के सीने पर लगी वह बड़ी सी घड़ी ने एक सदी से लखनऊ की बदलती हवाओं को बहुत करीब से महसूस किया है।
क्रांतिकारियों का सीक्रेट मददगार
जब देश आजादी की आग में उबल रहा था, तब मेरी इन सफेद दीवारों के पीछे एक अलग ही जंग चल रही थी। 1920 और 30 के दशक में अंग्रेजों की सख्त पहरेदारी और खुफिया तंत्र की पाबंदियों के बावजूद मेरे डॉक्टरों और छात्रों ने अपनी जान हथेली पर रखकर काम किया। गोरी सरकार की नजरों से बचकर रात के अंधेरे में कई घायल स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों का इलाज मेरी ही अंधेरी कोठरियों में चुपचाप किया गया था। मैंने चिकित्सा के धर्म के साथ-साथ राष्ट्रधर्म का दौर बहुत करीब से जिया है।
नाम की सियासत ने मुझे फुटबॉल बना दिया
मेरे जीवन का सबसे बड़ा और हाई-वोल्टेज ड्रामा 21 वीं सदी की शुरुआत में शुरू हुआ। साल 2002 में सूबे की हुकूमत ने मुझे अपग्रेड करके यूनिवर्सिटी का दर्जा तो दिया, लेकिन राजनीतिक नफे-नुकसान के फेर में मेरा नाम बदलकर कर दिया छत्रपति शाहूजी महाराज मेडिकल यूनिवर्सिटी। बस फिर क्या था, मेरा लखनऊ भड़क उठा। मेरे डॉक्टरों और छात्रों ने साफ कह दिया कि केजीएमसी कोई मामूली नाम नहीं, बल्कि दुनियाभर के मेडिकल की दुनिया में भारत की साख का एक इंटरनेशनल ब्रांड है।
इतिहास में पहली बार डॉक्टरों ने आला फेंककर हाथों में कैंडल और बैनर थाम लिए। लखनऊ के आम शहरी भी इस जज्बाती लड़ाई में सड़कों पर उतर आए। इसके बाद तो नेताओं ने मेरे नाम को लेकर जो सियासी फुटबॉल खेली, वो सूबे की राजनीति का एक अलग ही अध्याय है।
-2002: मायावती सरकार ने मुझे छत्रपति शाहूजी महाराज मेडिकल यूनिवर्सिटीबनाया।
-2003: मुलायम सिंह यादव आए, उन्होंने डॉक्टरों का तेवर देखा और नाम बदलकर केजीएमसी कर दिया।
-2007: सत्ता बदली, मायावती दोबारा आईं और जिद में फिर से मेरा नाम छत्रपति शाहूजी महाराज मेडिकल यूनिवर्सिटीकर दिया। इस बार गुस्सा और तीखा था।
-2012: अखिलेश यादव की सरकार आई और कैबिनेट से परमानेंट मुहर लगाकर मेरा नाम हमेशा के लिए केजीएमयू तय कर दिया गया।
चूंकि मैं अब एक यूनिवर्सिटी बन चुका था, इसलिए तकनीकी वजहों से ‘कॉलेज’ शब्द तो वापस नहीं आ सका, लेकिन मेरे चाहने वालों ने ‘किंग जॉर्ज’ का वो पुराना गौरव मुझसे छीनने नहीं दिया।
वजूद का आखिरी सच
आज मेरी जॉर्जियन एलुमनाई दुनिया के कोने-कोने में बैठकर इंसानियत का इलाज कर रही है। एक सदी से ज्यादा के इस सफर में सूबे के तख्त बदले, ताज बदले, चेहरे बदले और इरादे बदले, सबने मुझ पर अपना रंग चढ़ाने की कोशिश की, लेकिन मेरा जो रंग लोगों के दिलों पर चढ़ा है, उसे कोई नहीं उतार पाया। यही वजह है कि आज भी जब कोई गरीब, बेसहारा और बीमार मरीज लखनऊ आता है, तो वो किसी सरकारी गजट या चमचमाती यूनिवर्सिटी को नहीं ढूंढता। वो सीधे कहता है भैया केजीएमसी छोड़ देना और मैं अपनी बाहें फैलाए, हर दर्द को समेटने के लिए चौक के मुहाने पर वहीं खड़ा मिलता हूं।
पूरी बिल्डिंग का मतलब है सिर्फ एक विभाग
- मेरे वजूद का एक सच यह भी है कि मैं सिर्फ एक अस्पताल या यूनिवर्सिटी नहीं, बल्कि वास्तुकला (Architecture) का एक ऐसा जीता-जागता अजूबा हूं जो पूरे देश में मिसाल है। नए जमाने के अस्पताल तो आज एक ही बड़ी सी बहुमंजिला इमारत के भीतर सिमट कर रह जाते हैं, जहां एक ही छत के नीचे सारे विभाग बना दिए जाते हैं, लेकिन अवध के नवाबों की इस सरजमीं पर मेरा मिजाज अलग है।
- यह पूरे हिंदुस्तान में मैं इकलौती ऐसी यूनिवर्सिटी हूं, जहां ‘एक पूरी आलीशान बिल्डिंग का मतलब सिर्फ एक विभाग’ है। मेरे विशाल कैंपस में फैले अलग-अलग विभागों की अपनी स्वतंत्र, ऐतिहासिक और भव्य इमारतें हैं।
-चाहे वह वाइस चांसलर का प्रशासनिक ब्लॉक हो, एनाटॉमी विभाग हो, फिजियोलॉजी विभाग हो या फिर देश की टॉप डेंटल फैकल्टी हो। इन सबकी अपनी अलग मुकम्मल और विशालकाय कोठियां और इमारतें हैं। यहां एक विभाग से दूसरे विभाग की दूरी तय करने के लिए बकायदा सड़कों और रास्तों से गुजरना पड़ता है। हर इमारत के पास अपनी एक सदी पुरानी लखौरी ईंटों की गवाही है और अपनी एक अलग पहचान है।
-जब कोई नया छात्र या तीमारदार यहां पहली बार आता है, तो वह यह देखकर दंग रह जाता है कि जिसे वह एक पूरा अस्पताल समझ रहा था, वह तो दरअसल सिर्फ एक विभाग की बिल्डिंग थी।
तब महज एक डिग्री का सफर, आज बन चुका है कोर्सेस का पूरा बाग
वक्त के साथ मेरे वजूद का भूगोल ही नहीं बदला, बल्कि यहां दी जाने वाली तालीम का दायरा भी सिमटकर फैल गया। जब 1911 में मेरी इमारत बनकर तैयार हुई और अक्टूबर 1912 में मेरा पहला सत्र शुरू हुआ, तब मेरे पास सिखाने के लिए कोई लंबी-चौड़ी लिस्ट नहीं थी। तब यहां महज एक कोर्स था एमबीबीएस बैचलर ऑफ मेडिसिन एंड बैचलर ऑफ सर्जरी, उस पहले बैच में पूरे देश से छांटे गए सिर्फ 31 छात्र शामिल हुए थे, जिन्हें पढ़ाने के लिए केवल 5-6 प्रोफेसर्स की एक छोटी सी टीम थी, लेकिन आज, एक सदी से ज्यादा का सफर तय करने के बाद, जब आप मेरी ओपीडी और गलियारों से गुजरेंगे, तो आपको अंदाजा होगा कि मैं महज एक कॉलेज नहीं, बल्कि मेडिकल कोर्सेस का एक पूरा बाग बन चुका हूं। आज मेरे यहां 1 कोर्स से बढ़कर करीब 100 से ज्यादा अलग-अलग तरह के कोर्सेस चलाए जा रहे हैं, जिन्हें इन हिस्सों में बांटा जा सकता है
अंडरग्रेजुएट कोर्सेस: जहां शुरुआत सिर्फ 1 कोर्स एमबीबीएस से हुई थी, आज वहां देश की सबसे प्रतिष्ठित डेंटल फैकल्टी के तहत बीडीएस भी शामिल है। इसके अलावा बीएससी नर्सिंग और बीएससी ऑप्टोमेट्री जैसे कोर्सेस भी इसी छाते के नीचे आते हैं। आज सिर्फ एबीबीएस की ही सालाना सीटें बढ़कर 250 हो चुकी हैं।
पोस्टग्रेजुएट कोर्सेस: आज मेरे यहां एमडी (डॉक्टर्स ऑफ मेडिसिन), एमएस मास्टर ऑफ सर्जरी और डेंटिस्ट्री में एमडीएस के तहत लगभग 28 से ज्यादा अलग-अलग क्लिनिकल और नॉन-क्लिनिकल विभागों में पीजी कोर्सेस चलाए जा रहे हैं। हर साल करीब 350 से ज्यादा डॉक्टर यहां से विशेषज्ञ बनकर निकलते हैं।
सुपर-स्पेशलाइजेशन डीएम/एमसीएच: चिकित्सा जगत के शिखर पर खड़े कोर्सेस, जैसे डीएम (कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी आदि के लिए) और एमसीएच (न्यूरोसर्जरी, कार्डियोथोरैसिक सर्जरी, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी आदि) के तहत आज करीब 15 से ज्यादा सुपर-स्पेशलिटी कोर्सेस यहां चल रहे हैं, जो उत्तर भारत के मरीजों के लिए रीढ़ की हड्डी हैं।
पैरामेडिकल और नर्सिंग की विशाल फौज: एक अस्पताल सिर्फ डॉक्टरों से नहीं, उसके सपोर्ट सिस्टम से चलता है। आज मेरे यहां एमएससी नर्सिंग, दर्जनों प्रकार के पैरामेडिकल डिप्लोमा कोर्सेस (जैसे- एक्स-रे, लैब टेक्नीशियन, सीटी स्कैन टेक्नीशियन, ओटी टेक्नीशियन, डायलिसिस टेक्नीशियन) चलते हैं। बदलते वक्त के आधुनिक कोर्सेस के साथ मैंने खुद को सिर्फ पुराने ढर्रे तक सीमित नहीं रखा। आज केजीएमयू में हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन एमडीएचए, जेरियाट्रिक मेडिसिन (बुजुर्गों की देखभाल का विशेष कोर्स) और स्पोर्ट्स मेडिसिन जैसे बेहद आधुनिक और नए जमाने के कोर्सेस भी चल रहे हैं।
सुबह चार बजे की जद्दोजहद और सात हजार उम्मीदों का बोझ
जहाँ एक तरफ मेरी इन ऐतिहासिक इमारतों का हुस्न और कोर्सेस का आलीशान साम्राज्य है। वहीं दूसरी तरफ मेरा एक सच यह भी है कि मैं हर दिन सात से आठ हजार जिंदगियों की जद्दोजहद का गवाह बनता हूँ। जब पूरा लखनऊ गहरी नींद में सोया होता है। तब तड़के चार बजे से ही बहराइच, गोंडा, बस्ती, बलिया और नेपाल के सरहदी इलाकों से आए लाचार तीमारदार अपनी गोदी में बीमार बच्चों या बूढ़े मां-बाप को थामे ओपीडी की लाइनों में जमने लगते हैं। यहाँ इलाज सिर्फ दवा का नाम नहीं बल्कि एक जंग है। वह पर्चा काउंटर की लंबी कतार, स्ट्रेचर के पीछे बदहवास भागते तीमारदार और डॉक्टरों के कमरे के बाहर की खड़ी भीड़ का वह इंतजार यह सब मिलकर केजीएमयू का वो असली कैनवास बनाते हैं जहाँ बेबसी और अटूट उम्मीद दोनों एक साथ सांस लेते हैं। यहाँ का डॉक्टर सिर्फ बीमारी से नहीं लड़ता बल्कि वह रोज़ उस सीमित संसाधनों और असीमित मरीजों के बीच पैदा होने वाले भारी दबाव से भी दो-दो हाथ करता है। यह अस्पताल सिर्फ पत्थरों की विरासत नहीं बल्कि हर सुबह गरीब की आख़िरी उम्मीद का ज़िंदा मरकज है।

केजीएमयू में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार हुआ। सीएसआर के सहयोग से संचालित कार्यक्रम के तहत करीब 190 सब्सिडी वाली रोबोटिक सर्जरी की गईं। लिवर, किडनी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट सेवाओं को भी गति मिली। ट्रॉमा सेंटर को अपग्रेड करने के साथ ही 500 बेड वाले ट्रॉमा-2 के निर्माण की शुरुआत कराई गई। विश्वविद्यालय के इतिहास पर नजर डालें, तो अब तक 36 प्रिंसिपल यहां अपनी सेवाएं दे चुके हैं, जबकि विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने के बाद 12 कुलपति नियुक्त हुए हैं।
- प्रो. (डॉ.) सोनिया नित्यानंद (एमबीबीएस बैच 1981 और एमडी केजीएमयू, कुलपति)

1984 की बात है, जब हमने पहली बार लखनऊ कदम रखे था। केजीएमसी में एडमिशन लिया ही था कि देश में पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अफरा-तफरी मच गई। जैसे-तैसे स्टेशन से हॉस्टल पहुंचे। सीनियर्स और जूनियर्स के बीच एक अटूट बंधन होता था। सर्जरी सिखाना और असिस्ट कराना सीनियर्स अपना फर्ज मानते थे। वही 3 साल की कड़ी ट्रेनिंग का नतीजा है कि 30 साल बाद भी हमें कभी करियर में भटकना नहीं पड़ा। वैसे तो रोज जिंदगियां बचाते हैं, लेकिन 7 साल पहले कुशीनगर से आए पेट से जुड़े जुड़वा बच्चों को सर्जरी करके अलग करना मेरी जिंदगी और केजीएमयू की हिस्ट्री का सबसे यादगार लम्हा रहा।
-डॉ. जे. डी. रावत (MBBS बैच-1984, विभागाध्यक्ष- पीडियाट्रिक सर्जरी)

1990 में जब केजीएमयू में कदम रखा, तो मैं 27 वीं रैंक लेकर आया था। पिताजी अकेले कमाने वाले थे और हम सात भाई-बहन। उस दौर में शाम 6 से 8 बजे की ‘इवनिंग वार्ड टीचिंग’ मस्ट हुआ करती थी, जो 2006 के बाद खत्म ही हो गई। सीनियर रेजिडेंट्स हमें कैथेटर लगाना, नली डालना और ड्रिप चढ़ाना खुद सिखाते थे। प्रोफेसर पीसी दुबे, आरपी साही और कैंसर सर्जन एनसी मिश्रा जैसे दिग्गज टीचर्स का गार्जियन जैसा हाथ हमारे सिर पर रहता था। आज की तरह पावरपॉइंट नहीं, बल्कि पेशेंट के बेडसाइड पर पढ़ाई होती थी।
- डॉ. संदीप तिवारी (एमबीबीएस बैच-1990, ट्रॉमा सर्जरी फैकल्टी)

बात 1970-80 के दशक की है जब केजीएमसी में डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के दौरान डिजिटल एक्सरे, रोटरी फाइलें और माइक्रोस्कोप जैसी आधुनिक सुविधाएं नहीं थीं। एक बार दांत की फीलिंग करते समय उन्हें लगा कि काम पूरा हो गया है, लेकिन एक प्रोफेसर ने मिरर से दांत की एक बारीक, अधूरी जगह दिखाते हुए कहा कि मरीज केवल चमक देखेगा, असली डॉक्टर वह है जो अनदेखी जगह की भी सफाई करे। यह सीख उनके पूरे करियर की नींव बनी। डेंटिस्ट्री केवल इलाज नहीं, कला और ईमानदारी का काम है। मशीनें कितनी भी आधुनिक हों, डॉक्टर के हाथ की सफाई और नीयत से बड़ा कोई औजार नहीं।
-डॉ. असीम टिक्कू, पूर्व विभागाध्यक्ष डेंटल, केजीएमयू
- दरख्शां कदीर सिद्दीकी, लखनऊ
