रटंत मुक्त शिक्षा के लिए जरूरी है रटंत मुक्त परीक्षा 

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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जब हम तनाव और बोझ रहित शिक्षा की बात करते हैं, तो इसका अभिप्राय यह है कि निरंतर हमारे जीवन में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उनसे लिए गए अनुभवों को समझना, क्रमिक रूप से उनके उपाय को सुझाना, नए अनुभव लेना और उसके अनुसार अपने जीवन में व्यवहार परिवर्तन करना ही शिक्षा है। किसी लिखे गए टेक्स्ट को पढ़ना, समझना और समझकर विश्लेषण कर अपने जीवन में और व्यवहार में अपनाना ही शिक्षा है। न कि उस टेक्स्ट को रटकर किसी परीक्षा में पूछे गए सवाल के जवाब में लिखकर अच्छे नंबर पाना।

परंतु वर्तमान परिदृश्य में अभिभावकों की महत्वाकांक्षाएं, उनके पाल्यों में उन महत्वाकांक्षाओं के प्रति लालच भरना, समाज की महत्वाकांक्षाएं, समाज के बीच प्रतिस्पर्धाएं और वैश्विक धरातल पर अपने आप को आर्थिक रूप से समृद्ध करना ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य रह गया है। यह उद्देश्य पूरा करने के लिए हमारे सामने एक ही लक्ष्य रहता है कि हम अच्छे अंक लाएं और यही एक यह मानक रह गया है, हमारी उच्च गुणवत्ता की शिक्षा का। यही मानक किसी संस्था के प्रधानाचार्य, कक्षा अध्यापक या विषय अध्यापक के लिए भी है। यही मानक है समाज मानक बच्चों कें के लिए भी। सभी चाहते हैं कि हमारे बच्चे अच्छे अंक लाएं, अच्छा ग्रेड लाएं। कभी कोई नहीं चाहता कि अंक भले ही कम आएं, लेकिन उनका बच्चा व्यावहारिक दुनिया को अच्छी तरह सीख सके, समझ सके।

समझ आधारित प्रश्नों को परीक्षा में शामिल किया जाए- रटंत प्रणाली को समाप्त करने का पहला तरीका है कि परीक्षा में केवल सीधे-सीधे प्रश्न न पूछे जाएं। उदाहरण के लिए यदि विद्यार्थी ने पढ़ा है कि पौधों को प्रकाश संश्लेषण के लिए सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है, तो केवल यह पूछने के बजाय कि “प्रकाश संश्लेषण क्या है?” उससे यह पूछा जा सकता है कि “यदि किसी पौधे को कई दिनों तक सूर्य के प्रकाश से दूर रखा जाए, तो उसके विकास पर क्या प्रभाव पड़ेगा और क्यों?” ऐसे प्रश्न विद्यार्थी को अपनी समझ का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करते हैं।

प्रश्नों में ‘क्यों’ और ‘कैसे’ को महत्व दिया जाए- रटंत प्रणाली में विद्यार्थी अक्सर प्रश्न का उत्तर याद करता है, लेकिन “क्यों” और “कैसे” आधारित प्रश्न उसे सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। ऐसे प्रश्नों का एक ही शब्द या एक ही वाक्य में उत्तर नहीं दिया जा सकता। विद्यार्थी को विषय को समझना पड़ता है।

वास्तविक जीवन से जुड़े प्रश्न पूछे जाएं- जब परीक्षा के प्रश्न वास्तविक जीवन से जुड़े होते हैं, तो विद्यार्थी को ज्ञान के उपयोग के बारे में सोचने का अवसर मिलता है। विज्ञान में भी दैनिक जीवन से जुड़े प्रश्न पूछे जा सकते हैं। जैसे “गर्मियों में मिट्टी के घड़े का पानी अपेक्षाकृत ठंडा क्यों रहता है?” या फिर तब हवा ठंड का एहसास कराती है फिर हवा में कपड़े कैसे सूखते हैं?  ऐसे प्रश्न बताते हैं कि पढ़ाई केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि दैनिक जीवन को समझने के लिए भी है।

ओपन-एंडेड प्रश्नों को बढ़ावा दिया जाए - रटंत परीक्षा में अक्सर एक निश्चित उत्तर अपेक्षित होता है। इसके विपरीत ओपन-एंडेड प्रश्नों के उत्तर विद्यार्थियों को अपने विचार व्यक्त करने का अवसर देते हैं। इस प्रश्न के अनेक उचित उत्तर हो सकते हैं। इस प्रकार की परीक्षा में विद्यार्थी की सोचने की क्षमता, तर्क क्षमता, कल्पनाशीलता, समस्या-समाधान क्षमता, अभिव्यक्ति क्षमता का मूल्यांकन किया जा सकता है।

प्रोजेक्ट और गतिविधि आधारित मूल्यांकन किया जाए- केवल लिखित परीक्षा पर निर्भर रहने से रटने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। इसलिए परीक्षा के साथ प्रोजेक्ट और गतिविधि को भी मूल्यांकन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इससे विद्यार्थी, देखता है, जानकारी जुटाता है, समझता है, विश्लेषण करता है, निष्कर्ष निकालता है। यह प्रक्रिया रटने की अपेक्षा अधिक गहरी सीख विकसित करती है।

मौखिक और प्रस्तुति आधारित मूल्यांकन को स्थान दिया जाए- हर विद्यार्थी अपनी समझ को केवल लिखकर ही अच्छी तरह व्यक्त नहीं कर पाता। इसलिए कुछ विषयों में मौखिक प्रस्तुति, समूह चर्चा, प्रश्नोत्तर और प्रस्तुतीकरण को भी मूल्यांकन का हिस्सा बनाया जा सकता है। शिक्षक यह देख सकता है कि विद्यार्थी, विषय को समझता है या नहीं, अपने शब्दों में समझा सकता है या नहीं, उदाहरण दे सकता है या नहीं, प्रश्नों का उत्तर दे सकता है या नहीं। इससे केवल याद किए हुए उत्तर को दोहराने के बजाय समझ और अभिव्यक्ति का मूल्यांकन होता है।

एक ही उत्तर के बजाय समस्या-समाधान पर जोर दिया जाए- रटंत प्रणाली में विद्यार्थी उत्तर याद करता है। समस्या-समाधान आधारित परीक्षा में विद्यार्थी को नई परिस्थिति दी जाती है और समाधान खोजने के लिए कहा जाता है। गणित में केवल सूत्र पूछने के बजाय कोई वास्तविक समस्या दी जा सकती है और विद्यार्थी से समाधान की प्रक्रिया समझाने को कहा जा सकता है। विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, भाषा और अन्य विषयों में भी ऐसी समस्याएं दी जा सकती हैं, जिनमें विद्यार्थी को अपने ज्ञान का प्रयोग करना पड़े। इस प्रकार की परीक्षा यह जाँचती है कि विद्यार्थी ने ज्ञान को समझा और उसका प्रयोग करना सीखा है या नहीं।

उत्तरों में अपने शब्दों और तर्क को महत्व दिया जाए - विद्यार्थियों को यह विश्वास दिलाना आवश्यक है कि परीक्षा में केवल पुस्तक की भाषा लिखना ही सफलता का आधार नहीं है। यदि विद्यार्थी ने विषय को सही समझा है और उसे अपने शब्दों में सही तरीके से समझा सकता है, तो उसके उत्तर को उचित अंक मिलने चाहिए। पुस्तक के बिल्कुल समान शब्दों के बजाय सरल भाषा का उपयोग करता है, लेकिन अर्थ सही है, तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। इससे विद्यार्थी उत्तर रटने के बजाय विषय को समझने और अपनी भाषा में व्यक्त करने का प्रयास करेगा।

परीक्षा के बाद केवल अंक नहीं, प्रतिक्रिया भी दी जाए - रटंत प्रणाली में अक्सर परीक्षा का अंतिम उद्देश्य अंक प्राप्त करना बन जाता है। विद्यार्थी को केवल बताया जाता है कि उसे कितने अंक मिले। इसके स्थान पर शिक्षक को यह भी बताना चाहिए कि उत्तर में क्या अच्छा था? कहां गलती हुई? और सुझाव कि विचार को और बेहतर कैसे प्रस्तुत किया जा सकता था? 

शिक्षण प्रक्रिया और परीक्षा संस्कृति में बदलाव- रटंत प्रणाली से मुक्त परीक्षा केवल प्रश्नपत्र बदलने से संभव नहीं है। इसके लिए पूरे विद्यालय की शिक्षण एवं कक्षा कक्ष प्रक्रिया  और आकलन प्रकृति में ही बदलाव की आवश्यकता है। यदि कक्षा में शिक्षक केवल पुस्तक के प्रश्न-उत्तर लिखवाता है और परीक्षा में भी वही प्रश्न आते हैं, तो विद्यार्थी स्वाभाविक रूप से उन्हें रटेंगे। इसके बजाय कक्षा में चर्चा, प्रयोग, प्रश्न पूछना , समूह कार्य, कहानी, गतिविधि, परियोजना, समस्या-समाधान, अनुभव आधारित सीखना जैसी प्रक्रियाओं को बढ़ावा देना चाहिए।

-डॉ. अनिल चौबे, शिक्षक, बरेली