देवत्व की राह दिखाता एक महान पुरुषार्थ श्रीकृष्ण 

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Edited By Anjali Singh
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जन्माष्टमी का पर्व आते ही पूरा देश कान्हा के रंग में रंग जाता है। मंदिरों में झांकियां सजती हैं, घरों में लड्डू गोपाल का श्रृंगार होता है और आधी रात को श्रीकृष्ण के जन्म का उल्लास मनाया जाता है। नन्हें बच्चों को कान्हा के रूप में सजाने की परंपरा भी इस पर्व को खास बना देती है। मोर मुकुट, मुरली और मुस्कान से सजा बाल रूप हर किसी का मन मोह लेता है, लेकिन श्रीकृष्ण की सुंदरता केवल उनके रूप में नहीं थी। उनके व्यक्तित्व की असली चमक उनकी पवित्रता, निर्लिप्तता, गुणों और आत्मिक शक्ति में थी। यही कारण है कि जन्माष्टमी केवल उत्सव नहीं, बल्कि अपने भीतर के कृष्ण को जगाने का संदेश भी देती है।

मन को जीत लेने वाला व्यक्तित्व

श्रीकृष्ण का नाम लेते ही मन में एक मनमोहक छवि उभरती है। कहीं वे मुरली बजाते दिखाई देते हैं, कहीं गोपियों के साथ रास रचाते हुए और कहीं अर्जुन को जीवन का गूढ़ ज्ञान देते हुए। यही विविधता उनके व्यक्तित्व को अद्भुत बनाती है। उन्हें मनमोहन, चित्तचोर, योगीराज और सोलह कलाओं से संपन्न कहा गया, लेकिन उनके आकर्षण का रहस्य केवल शारीरिक सौंदर्य में नहीं था। उनके व्यक्तित्व में ऐसी आत्मिक आभा थी, जो मनुष्य को भीतर तक प्रभावित करती थी। जिस प्रकार मंदिर में रखी मूर्ति को देखकर श्रद्धा जागती है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण की स्मृति मन में पवित्रता और श्रेष्ठता का भाव जगाती है। आज मनुष्य अपने भीतर के क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से परेशान है। ऐसे समय में श्रीकृष्ण का निर्विकारी व्यक्तित्व अपने आप में एक आदर्श बन जाता है। उनका जीवन यह सवाल सामने रखता है कि आखिर ऐसी अवस्था प्राप्त कैसे होती है, जहां मन विकारों से ऊपर उठ जाए?

श्रीकृष्ण की महानता का आधार  

यदि श्रीकृष्ण को जन्म से ही महान माना जाए, तो एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि उनकी इस महानता के पीछे कौन-सा पुरुषार्थ रहा होगा? आध्यात्मिक दृष्टि से प्रत्येक आत्मा अपने कर्म और पुरुषार्थ के आधार पर अपने भविष्य का निर्माण करती है। कोई भी श्रेष्ठ उपलब्धि अचानक प्राप्त नहीं होती। आज भी किसी बच्चे के जन्म पर लोग कहते हैं कि वह अपनी किस्मत साथ लेकर आया है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण के दिव्य भाग्य को भी किसी पूर्व पुरुषार्थ का परिणाम माना जा सकता है। उनकी सोलह कलाओं की संपूर्णता, आत्मिक शक्ति, पवित्रता और देवत्व इस बात की ओर संकेत करते हैं कि उनके पीछे गहरी साधना रही होगी। श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण को योगीराज कहा गया है। यह बात विचार करने योग्य है कि जब उन्हें जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धियां प्राप्त थीं, तब भी वे योगाभ्यास क्यों करते थे? इसका उत्तर यही संकेत देता है कि योग और ज्ञान उनके जीवन के मूल आधार थे। उन्होंने अपने भीतर ऐसी शक्ति विकसित की, जिसने उन्हें विकारों से ऊपर उठाया।

ज्ञान-यज्ञ और आत्मिक परिवर्तन

आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण के देवत्व की नींव उनके पूर्वजन्म के पुरुषार्थ में थी। परमपिता परमात्मा शिव द्वारा दिए गए ज्ञान के अनुसार, उन्होंने प्रजापिता ब्रह्मा के रूप में ईश्वरीय ज्ञान धारण किया और ज्ञान-यज्ञ की स्थापना की। इस यज्ञ का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि अपने तन, मन और धन को ईश्वर के प्रति समर्पित करना था। जीवन का उद्देश्य केवल स्वयं के लिए जीना नहीं, बल्कि मनुष्य को ज्ञान देना, उसे परमात्मा से जोड़ना और श्रेष्ठ आचरण की ओर प्रेरित करना था। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर विजय को ही वास्तविक युद्ध माना गया। ज्ञान को तलवार और योग को कवच बनाकर इन विकारों पर विजय प्राप्त करना ही वह पुरुषार्थ था, जिसने आगे चलकर देवत्व की नींव रखी।

आज के समय में श्रीकृष्ण का संदेश

जन्माष्टमी पर यह प्रश्न भी उठता है कि क्या श्रीकृष्ण आज के वातावरण में जन्म ले सकते हैं? चारों ओर स्वार्थ, तनाव, क्रोध, भौतिक लालसा और नैतिक पतन दिखाई देता है। ऐसे वातावरण में देवत्व की कल्पना कठिन लगती है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म पवित्र सतयुगी सृष्टि के आरंभ में होता है। धर्मग्लानि के समय परमात्मा का अवतरण होता है और ज्ञान के माध्यम से मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन की ओर ले जाने का कार्य होता है। जब पवित्रता की स्थापना होती है, तभी देवत्व की सृष्टि का आरंभ होता है। इसलिए जन्माष्टमी को केवल श्रीकृष्ण के जन्म की घटना के रूप में देखने के बजाय आत्मिक परिवर्तन के अवसर के रूप में देखना अधिक सार्थक है।

मंदिर के साथ मन को भी सजाएं

जन्माष्टमी पर हम मंदिरों को फूलों से सजाते हैं, स्वच्छ रखते हैं, शुद्ध भोजन का भोग लगाते हैं और धूप-दीप से वातावरण को सुगंधित करते हैं। क्या हम अपनी आत्मा रूपी मंदिर की भी उतनी ही सफाई करते हैं? आज बाहर हजारों दीप जलते हैं, लेकिन भीतर का दीपक कई बार अंधकार में डूबा रहता है। वास्तविक रोशनी तभी होगी जब मन से नकारात्मकता दूर होगी। क्रोध कम होगा, अहंकार टूटेगा, लोभ और मोह से दूरी बनेगी और मन परमात्मा के स्मरण में लगेगा।

सच्ची जन्माष्टमी

श्रीकृष्ण की पूजा करना सरल है, लेकिन उनके गुणों को अपने जीवन में उतारना कठिन। हम उनके बाल रूप पर मोहित होते हैं, उनकी लीलाओं का गुणगान करते हैं और मंदिरों में शीश झुकाते हैं, लेकिन यदि उनके जीवन से कोई सीख अपने आचरण में नहीं उतारी, तो जन्माष्टमी का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। सच्ची जन्माष्टमी उस दिन होगी, जब हम अपने भीतर के विकारों को पहचानकर उन पर विजय पाने का प्रयास करेंगे। जब परिवारों में छोटी-छोटी बातों पर होने वाला महाभारत समाप्त होगा। जब मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के जीवन में सुख और शांति लाने का प्रयास करेगा। श्रीकृष्ण का जीवन हमें यह विश्वास दिलाता है कि मनुष्य अपने पुरुषार्थ से स्वयं को बदल सकता है। ज्ञान, योग, साधना और परमात्मा के प्रति सच्चे प्रेम के माध्यम से आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकती है।

इस जन्माष्टमी पर केवल कान्हा का श्रृंगार न करें, बल्कि अपने मन को भी सजाएं। केवल मंदिर में दीप न जलाएं, बल्कि अपने भीतर भी ज्ञान का प्रकाश पैदा करें। जब आत्मा का अंधकार मिटेगा और भीतर पवित्रता का जन्म होगा, तभी जन्माष्टमी अपने वास्तविक अर्थ में सार्थक होगी।

– पंडित उमाशंकर, आध्यात्मिक लेखक