परंपरा, प्रकृति और पर्यावरण का पर्व हलछठ
प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास यानी भादों मास की कृष्ण पक्ष की खष्टी यानी छठ को हल छठ का पर्व मनाया जाता है। सनातन धर्म संस्कृति को मानने वाली महिलाएं इसे पुत्र की दीर्घायु के लिए मनाती हैं, तो नव विवाहिताएं इसे पुत्र प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं। कहते हैं इसी दिन भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। बलराम शेषनाग के अवतार कहे जाते हैं और वह हल तथा मूसल शस्त्र के रूप धारण करते थे। इसी कारण यह त्योहार प्रकृति और पर्यावरण के पूजन के पर्व के रूप में आदि काल से आज तक मनाया जाता है।
आज के दिन धरती पर हल नहीं चलाया जाता। पृथ्वी को खोदा काटा नहीं जाता। सुहागिन महिलाएं आज के दिन जोता बोया अनाज नहीं खाती। पसई के चावल, महुआ के सूखे फूल को भिगोकर खाती हैं और देवकी, रोहिणी से अपने पुत्र की लंबी उम्र की दुआ मांगती हैं। बरसात के मौसम में कृष्ण जन्माष्टमी से दो दिन पूर्व हल छठ मनाई जाती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इसके अलग-अलग नाम हैं।
बृज, अवध क्षेत्र के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार, हरियाणा, राजस्थान आदि प्रदेशों में भी हल छठ का पर्व मनाया जाता है। उत्तर भारत में महिलाएं अपने घर के आंगन में पलाश के पत्ते वाली डाल, झरबेरी की कंटीली डाल और कांस, कुश की पत्तियां आपस में बांधकर एक छोटे पौधे के रूप में खड़ा कर देती हैं और कथा सुना कर पूजा करती हैं। दीवारों पर हलछठ का रंग-बिरंगा चित्रांकन कर पूजा की जाती है।
हलछठ को ही एक दिन मनुष्य के खाने वाले सात अनाज चना, अरहर, गेहूं, जौ, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि अनाज भड़भूंजे के यहां से भुनाकर मिट्टी की चुकड़ी में भर कर पूजा करती हैं और बलदाऊ/ हलधर भगवान से घर को सदा धन-धान्य से भरा पूरा रखने की प्रार्थना करती हैं। कुछ चुकड़ियों में किशमिश छोहरा मखाना भी भरा जाता है और फिर अपने पुत्रों को खिला देती हैं। मिट्टी के तराजू भी बनाए जाते हैं। ढाक, झड़बेरी और कुश कांस धरती को प्रकृति के उपहार हैं। ये बिना जोते बोए अपने आप धरती पर उग आते हैं और पर्यावरण की रक्षा करते हैं। इसीलिए इन्हें ही पूजा जाता है। ढाक और महुए के पत्तों में ही लिझुरिया जाटी जाती है।
भगवान बलराम शेषनाग के अवतार माने जाते हैं। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर लक्ष्मी जी के साथ विश्राम करते हैं। इसलिए जब-जब भगवान विष्णु का जब अवतार राम कृष्ण के रूप में होता है, तो शेषनाग जी उनके भाई बनकर आते हैं। बलराम को बलदाऊ, बलभद्र और हलधर भी कहा जाता है। बलराम, देवकी और वसुदेव की सातवीं संतान थे। कंस के कारण देवकी का सातवां गर्भ लोप हो गया था और गोकुल में नंद बाबा के घर वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ से बलराम का जन्म भादों महीने की कृष्ण पक्ष की छठ को हुआ था। हल षष्ठी संतान प्राप्ति, संतान की दीर्घायु की कामना के साथ प्रकृति पूजा का भी पर्व है।
