संपादकीय :आस्था और जवाबदेही
सेवानिवृत्त एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का पहला मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाना मंदिर प्रशासन के चरित्र में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। 39 वर्ष से अधिक भारतीय वायुसेना में सेवा कर चुके मिश्रा को 5,585 आवेदनों में से चुना जाना इस बात का संकेत है कि ट्रस्ट अब रोजमर्रा के विशाल संचालन के लिए पेशेवर प्रबंधन चाहता है।
स्थानीय साधु-संतों के एक वर्ग की सीईओ की नियुक्ति पर आपत्ति के बावजूद यह निर्णय इस संदर्भ में देखना होगा कि भले ही मंदिर धार्मिक संस्था है, इसलिए उसके संचालन में संत-परंपरा, धार्मिक मर्यादा और श्रद्धालुओं की भावनाओं की केंद्रीय भूमिका आवश्यक है, परंतु धार्मिक नेतृत्व और प्रशासनिक दक्षता परस्पर विरोधी नहीं हैं। लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही, सुरक्षा, दर्शन-व्यवस्था, कर्मचारियों का प्रबंधन, आपदा-प्रबंधन, तकनीक, दान की गणना और विभिन्न एजेंसियों के साथ समन्वय जैसे काम अब इतने व्यापक हैं कि केवल परंपरागत व्यवस्था पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं होगा। सैन्य प्रशासन में अनुशासन, स्पष्ट जिम्मेदारी, त्वरित निर्णय, बहु-एजेंसी समन्वय और संकट-प्रबंधन महत्वपूर्ण होते हैं, हालांकि मंदिर प्रशासन को केवल ‘ऑपरेशन’ की तरह नहीं चलाया जा सकता, इसलिए सैन्य दक्षता को संवेदनशील धार्मिक-प्रशासनिक दृष्टि के साथ जोड़ना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी। नई व्यवस्था की खासियत केवल सीईओ की नियुक्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों का संस्थागत विभाजन है। गोविंद देव गिरि को महासचिव और महेश भागचंदका को नया कोषाध्यक्ष बनाया गया है। उपलब्ध विवरण के अनुसार सीईओ और कोषाध्यक्ष महासचिव को रिपोर्ट करेंगे; इसलिए इसे ‘चेयरमैन के नीचे सीधे सीईओ’ वाली सरल संरचना मानना ठीक नहीं होगा। यह व्यवस्था सफल हुई तो धार्मिक नेतृत्व नीति और मूल दिशा संभाल सकता है, जबकि पेशेवर टीम दैनिक संचालन को अधिक व्यवस्थित ढंग से चला सकती है।
इस बदलाव की असली कसौटी विश्वास की पुनर्स्थापना होगी, क्योंकि श्रद्धालु ग्राहक नहीं, धार्मिक आस्थावान लोग हैं। चंदा और चढ़ावा चोरी की घटना के बाद श्रद्धालुओं की संख्या और चढ़ावे में भी खासी कमी आई है। गोविंद देव गिरि ट्रस्ट बनने के बाद से वित्तीय व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे थे, इसलिए कथित चोरी के समय उनकी भूमिका स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक जांच के दायरे में प्रश्न पैदा करती है, लेकिन उनपर किसी दोष या संलिप्तता का प्रमाण नहीं है। नई जिम्मेदारी उनको अपना पक्ष मजबूत करने का अवसर देगी। निर्मला यादव का पहली महिला ट्रस्टी बनना स्वागतयोग्य परिवर्तन है। इससे निर्णय-प्रक्रिया में महिलाओं का अनुभव और दृष्टिकोण आएगा, हालांकि इसका वास्तविक गुणात्मक प्रभाव तभी दिखेगा जब उनकी भागीदारी औपचारिक न होकर सक्रिय हो।
जहां तक चोरी के मामले में आगे कार्रवाई का प्रश्न है, आठ नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है; अब जांच का अगला चरण यह देखना होना चाहिए कि क्या कोई बड़ी साजिश, मिलीभगत या ट्रस्ट से हुई निगरानी की विफलता थी। नई व्यवस्था तभी सार्थक मानी जाएगी, जब वह आस्था को प्रशासनिक दक्षता और धार्मिक प्रतिष्ठा को पारदर्शी जवाबदेही से जोड़े। राम मंदिर केवल एक मंदिर नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है; इसलिए उसके प्रशासन में सामान्य संस्थाओं से भी ऊंचे नैतिक मानदंड अपेक्षित हैं। आशा है कि ये बदलाव इस कसौटी पर खरे उतरेंगे।
