उच्च शिक्षित छात्रों का रुझान देश लौटने की तरफ
ब्रेन ड्रेन से ब्रेन गेन की ओर भारत, विदेश में पढ़ाई के बाद देश वापसी का बना रहे प्लान
विदेश में पढ़ाई कर रहे 81 प्रतिशत भारतीय छात्र अब देश लौटना चाहते हैं। ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल के सर्वे में यह सुखद खुलासा हुआ है।
हमें अपने देश में अवसरों और नए उद्यम की खोज और स्थापना करनी चाहिए। वह ज़माना गया जब अमेरिका में टैलेंट को जाते ही नौकरी मिल जाती थी और अमेरिका ने इसी बुद्धिबल से टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बढ़त बनाई।
भारत में शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठाने वाले लोग पूरे जानकार नहीं हैं। विदेश के कुछ हिस्सों में बेशक रिसर्च की उच्चतम गुणवत्ता है, लेकिन अब हमारी लैब्स में यह अनेक विषयों में विश्वस्तर की है। बाकी का स्तर भी 80-90% को छू गया है। भारतीयों में एक ख़ास अवगुण खुद की निंदा करना है। भारत में 95 प्रतिशत लोग किसी भी फील्ड में वर्तमान स्टेटस का आकलन करने में अक्षम हैं। सोशल मीडिया पर पोस्ट होने वाली टिप्पणियां छद्म विद्वानों की हैं, जिनमें से 99 प्रतिशत सिर्फ उथली या वाहियात हैं। वे सिर्फ आर्मचेयर, कुंठित स्कॉलर्स की हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विदेश में अध्ययन करने के इच्छुक 81% उम्मीदवारों ने घर लौटने की योजना बनाई है।
ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल के सर्वे के मुताबिक विदेश में अध्ययन करने वाले 81% भारतीय उम्मीदवारों ने कहा कि उन्होंने अपना पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद भारत लौटने की योजना बनाई है। दस में से लगभग नौ लोग विदेश में शिक्षा प्राप्त करने वाले अपने परिवार के पहले सदस्य थे, जबकि लगभग आधे लोगों ने कहा कि विदेश जाने का निर्णय उनका अपना था। यह निष्कर्ष स्टूडेंट ग्लोबल मोबिलिटी इंडेक्स के तीसरे संस्करण का हिस्सा हैं, जो पाठ्यक्रम, पारिवारिक पृष्ठभूमि, सूचना स्रोतों और अध्ययन के बाद की योजनाओं पर अतिरिक्त प्रश्नों के लगभग 2,400 प्रतिक्रियाओं के साथ मुख्य प्रश्नों के 17,925 प्रतिक्रियाओं को जोड़ता है। अन्य 15% ने अपने अगले कदम के रूप में ‘नौकरी के लिए आवेदन करना’ चुना, बिना यह बताए कि नौकरी भारत में होगी या विदेश में।
तीन सर्वेक्षण चक्रों में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि निर्णय कौन करता है। स्व-प्रेरित छात्र 202324 में 29% से बढ़कर 2024-25 में 34% और 2025-26 में 49% हो गए। पारिवारिक प्रभाव 59% से गिरकर 37% और फिर 36% हो गया। छोटे छात्रों को पारिवारिक मार्गदर्शन पर भरोसा करने की अधिक संभावना थी, जबकि पुराने आवेदक स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की प्रवृत्ति रखते थे। उत्तर और दक्षिण भारत में आत्म-प्रेरणा सबसे अधिक थी; परिवार का प्रभाव पश्चिम और मध्य क्षेत्र में सबसे अधिक था। शैक्षणिक विकल्प अत्यधिक केंद्रित थे। दस में से सात स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए आवेदन कर रहे थे और 75% ने व्यवसाय और प्रबंधन को अपने मुख्य क्षेत्र के रूप में पहचाना।
स्वास्थ्य और चिकित्सा 8% के साथ दूसरे स्थान पर थे। विज्ञान में 2% और इंजीनियरिंग में 1% हिस्सेदारी है। गूगल खोज से 39% छात्र अपने संस्थान तक पहुंचे, इसके बाद एजेंट (35%) आए, लेकिन भरोसे के मामले में गूगल की बढ़त बढ़ी। 56% ने इसे शिक्षा संबंधी जानकारी के लिए अपना सबसे भरोसेमंद स्रोत बताया, जबकि कॉलेज कार्यक्रमों के लिए 20% और इंस्टाग्राम के लिए नौ प्रतिशत ने इसे अपना सबसे भरोसेमंद स्रोत बताया। एआई टूल्स पर छः और यूट्यूब पर पांच प्रतिशत लोगों ने सबसे अधिक भरोसा किया।
यह एक रूझान दिखाता है, क्योंकि भारत में उच्च स्तर पर अब नयी विद्या और नए विषयों में जॉब मार्किट उछाल पर है, जिससे अवसर बढ़ रहे हैं। देश में शिक्षातंत्र क्रमशः तरक्कीयाफ्ता है और भविष्य की जरूरतों के अनुसार परिवर्तन हो रहे हैं। उच्चतर शिक्षा स्तर में गुणवत्तापूर्ण परिवर्तन से हम न केवल काफी विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं, बल्कि अपने पुराने संस्थानों को अपग्रेड कर पाते हैं और नए इंस्टिटयूट्स खुलने से नए अनुसंधान करते हुए इसे प्रोसस्सेस और टेक्नोलॉजी में बदल सकते हैं। औद्योगीकरण का पूरा तंत्र उच्चतर शिक्षा के दांचे पर ही खड़ा होता है।
उपर्युक्त सर्वेक्षण देखने के बाद खुद की समझ यह कहती है कि हमें अपने देश में अवसरों और नए उद्यम की खोज और स्थापना करनी चाहिए। वह ज़माना अब गया जब अमेरिका में टैलेंट को जाते ही नौकरी मिल जाती थी और अमेरिका ने इसी बुद्धिबल से टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बढ़त बनाई। यह बढ़त पहले ब्रिटेन और अमरीका के पास थी, लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध ने पासा पलट दिया था। चीन की बढ़त और भारत की बढ़त में फर्क है। चीन की शुरुआती बढ़त सिर्फ पश्चिम से चोरी किए गए ज्ञान पर टिकी थी, जबकि भारत बेबसी के दौर से निकल कर अब अपने दम पर साइंस और टेक्नोलॉजी में बढ़त बना चुका है।
हमने कहीं से भी बौद्धिक ज्ञान की चोरी नहीं कि और गुणवत्ता के मापन के अनुसार (संख्या में नहीं) हमारे रिसर्च पेपर्स चीन से कहीं बेहतर हैं। बेशक इस मामले में विद्वत्त सर्वेक्षण कुछ और कहते हैं और पक्षपाती हैं, लेकिन ईमानदार मूल्यांकन यह साबित करता है कि चीन द्वारा हर साल लाखों की संख्या में प्रकाशित रिसर्च और रिव्यु पेपर्स में से काफी प्रतिशत ऐसा है, जिसकी गुणवत्ता सही नहीं है और बाद में उनकी कमियां उजागर होने पर इन्हें रीट्रेक्ट कर लिया गया। भारत में पेपर्स का रीट्रेक्शन चीन से कम है।
