सीमा विवाद सुलझाने की सुखद पहल

Amrit Vichar Network
Edited By Pradeep Kumar
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सीमा विवाद सुलझाने की सुखद पहल, क्या भारत-चीन के रिश्तों में पिघलेगी बर्फ?

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सुलझाने को लेकर अजित डोभाल और वांग यी की वार्ता एक सुखद पहल है।

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अरविंद जयतिलक, लेखक

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच दोनों देशों के संबंधों को बेहतर बनाने की पहल एक सुखद संकेत है। दोनों देशों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चर्चा की है। 

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच दोनों देशों के संबंधों को बेहतर बनाने की पहल एक सुखद संकेत है। उल्लेखनीय है कि दोनों देशों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के साथ ही सीमा तय करने की दिशा में आगे बढ़ने की पहल पर चर्चा की है। पिछले दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल चीन की यात्रा पर थे। उन्होंने कहा कि हम यहां बातचीत के 25वें दौर के लिए उपस्थित हैं। मौजूं सवाल यह है कि क्या दोनों देशों की पहल से सीमा विवाद का हल निकलेगा? क्या दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव कम होगा? यह सवाल इसलिए कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने की पहल कई बार हो चुकी है, लेकिन कोई ठोस सार्थक परिणाम नहीं निकला। 

याद होगा 2020 में गलवान में हुई झड़प के बाद से ही दोनों देशों के बीच रिश्ते तल्ख और असहज हैं। इस हमले में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे, वहीं चीन को भी अपने 43 जवानों की जिंदगी से हाथ धोना पड़ा था। इस हालात के लिए पूर्ण रूप से चीन ही जिम्मेदार था। अगर उसने 1996 और 2005 में हुए समझौते का पालन किया होता तो यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पैदा नहीं होती। गत वर्ष रूस में ब्रिक्स समिट से ठीक पहले भारत-चीन के बीच ईस्टर्न लद्दाख में एलएसी पर सहमति बनी और दोनों देशों ने इस पर सहमति जताई कि देपसांग और डेमचॉक क्षेत्र में जहां गश्त ब्लॉक है, वहां सैनिक पीछे हटेंगे और गश्त फिर से शुरू होगी।

कहना गलत नहीं होगा कि चीन के अड़ियल रुख से़ ईस्टर्न लद्दाख के पैंगोंग क्षेत्र, गलवान के पीपी-14, गोगरा और हॉटस्प्रिंग क्षेत्र में आज भी तनाव बरकरार है। कहा जा रहा है कि चीन सामरिक रूप से अहम पैंगोंग त्सो झील के निकट एक और नए पुल का निर्माण की योजना में है। उसकी मंशा इस पुल के जरिए अपने सामरिक हथियारों को आसानी से भारतीय सीमा तक पहुंचाना है। इसका खुलासा सेटेलाइट से ली गई तस्वीरों से हो चुका है। चीन की यह साजिश भारत के लिए चिंता का सबब इसलिए है कि यह पुल वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी से महज 20 किलोमीटर दूर है, चूंकि दोनों देशों के बीच रिश्तों में जमी बर्फ पिघल रही है तो उम्मीद किया जाना चाहिए कि बहुत जल्द ही इस क्षेत्र में भी शांति बहाल होगी। गौर करें तो सीमा विवाद से दोनों देशों के बीच न सिर्फ तनाव की स्थिति उपजती है बल्कि अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचता है।

फिलहाल कहना मुश्किल है, यह बैठक दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने में मददगार होगा। यह इसलिए कि चीन वार्ता में दिलचस्पी तो दिखाता है, लेकिन बेहतर परिणाम देने की दिशा में आगे नहीं बढ़ता। जब तक चीन साम्राज्यवादी मानसिकता की खोल से बाहर नहीं आएगा, तब तक भारत-चीन सीमा विवाद सुलझने के आसार कम हैं। चीन की उदासीनता का ही नतीजा है कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद ज्यों का त्यों बना हुआ है। उसके असंवेदनशील रुख के कारण ही 1976 से चल रही बातचीत तार्किक नतीजे पर नहीं पहुंची। 1993, 1996 और 2005 में दोनों देश कई बार सीमाओं के विभाजन के लिए वार्ता कर चुके हैं, लेकिन उसका सकारात्मक नतीजा नहीं निकला। कारण वार्ता के दौरान चीन कभी भी दस्तावेजों के आदान-प्रदान में रुचि नहीं दिखाता। भारत के जिन क्षेत्रों पर उसका एक इंच भी दावा है उससे हटने का आज तक संकेत नहीं दिया।

विडंबना यह भी कि वह मैकमोहन रेखा को भी स्वीकारने को तैयार नहीं। वह उसे अवैध बताता है, जबकि देश-दुनिया को अच्छी तरह पता है कि ब्रिटिश भारत और तिब्बत ने 1913 में अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रूप में मैकमोहन रेखा का निर्धारण किया। इस सीमा रेखा का निर्धारण हिमालय के सर्वोच्च शिखर तक है। इस क्षेत्र में हिमालय प्राकृतिक सीमा का निर्धारण नहीं करता, क्योंकि यहां से अनेक नदियां निकलती और सीमाओं को काटती हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि दोनों देश एलएसी पर निगरानी कर रहे हैं। ऐतिहासिक संदर्भों में जाएं तो तिब्बत, भारत और बर्मा की सीमाओं का ठीक से रेखांकन नहीं होने से अक्टूबर, 1913 में शिमला में अंग्रेजी सरकार की देखरेख में चारों देशों के अधिकारियों की बैठक हुई। इस बैठक में तिब्बती प्रतिनिधि ने स्वतंत्र देश के रूप में प्रतिनिधित्व किया और भारत की अंग्रेजी सरकार ने उसे उसी रूप में मान्यता दी। आधुनिक देश के रूप में भारत के पूर्वोत्तर हिस्से की सीमाएं रेखांकित न होने के कारण दिसंबर 1913 में दूसरी बैठक शिमला में हुई और अंग्रेज प्रतिनिधि जनरल मैक मोहन ने तिब्बत, भारत और बर्मा की सीमा को रेखांकित किया। पीकिंग पर साम्यवादियों का कब्जा होने के उपरांत 23 मई, 1951 को तिब्बत के दलाई लामा सरकार के प्रतिनिधियों और चीनी सरकार के अधिकारियों के बीच 17 सूत्रीय कार्यक्रम पर समझौता हुआ। 

याद होगा गत वर्ष पहले चीन ने प्रस्ताव रखा था कि भारत अगर अरुणाचल के तवांग इलाके को चीन को सौंप देता है, तो वह भी बदले में उसे अक्साई चीन का इलाका दे सकता है, लेकिन भारत ने उसके इस साजिश भरे प्रस्ताव को ठुकरा दिया। भारत को चीन पर दबाव बनाने के लिए तिब्बत के मसले पर अपना कड़ा रुख अख्तियार करना होगा। तिब्बत का स्वतंत्र अस्तित्व ही भारत की सीमाओं की रक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है। अगर भारत तिब्बत की स्वतंत्रता और मानवाधिकार हनन के मसले को अंतर्राष्ट्रीय कुटनीति की तीव्र आंच पर रखता है तो सच मानिए चीन की पेशानी पर बल आना तय है। तिब्बत की स्वतंत्रता चीन की कमजोर नस है और भारत इसे मानवाधिकार हनन का नश्तर बनाकर चीन की हेकड़ी का सफल ऑपरेशन कर सकता है।