संपादकीय : हिमालय की चेतावनी
नेपाल में भोटेकोशी नदी की अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर साबित किया है कि हिमालय में आपदा अब केवल भारी बारिश का पर्याय नहीं रही। इस त्रासदी के बाद अब तक नेपाल में फिलहाल जितने शव मिले हैं और जितने भारतीय तथा विदेशी तीर्थयात्री एवं पर्यटक लापता हैं, उनकी संख्या आगे चलकर बहुत बढ़ सकती है। तबाही का पैमाना भी असाधारण है। कम-से-कम 19 मोटरेबल पुल और करीब 40 किलोमीटर सड़क बह गई है। कई गांव, घर, बाजार, सरकारी इमारतें और स्कूल नष्ट हुए हैं। नेपाल की विद्युत व्यवस्था को भी गहरा झटका लगा है।
प्रारंभिक आकलन के अनुसार 12 जल विद्युत परियोजनाओं और एक सौर संयंत्र से जुड़ी करीब 431 मेगावाट क्षमता ग्रिड से बाहर हो गई है। यह सिर्फ भौतिक क्षति नहीं, बल्कि नेपाल की अर्थव्यवस्था, सीमा व्यापार, पर्यटन और ऊर्जा सुरक्षा पर एक साथ पड़ा आघात है। चीन सीमा से जुड़ा महत्वपूर्ण 42 किलोमीटर का मार्ग भी तबाह हुआ है। सीमावर्ती पर्वतीय जिलों में स्थानीय अर्थव्यवस्था और संपर्क व्यवस्था को सामान्य होने में लंबा समय लग सकता है। खास चिंता यह है कि इसी नदी तंत्र में पिछले वर्ष भी विनाशकारी बाढ़ आ चुकी थी।
यानी इसे एक असामान्य अकेली घटना मानकर आगे बढ़ना गंभीर भूल होगी। आपदा के कारण को लेकर भी सावधानी जरूरी है। शुरुआती खबरों में भूकंप को संभावित ट्रिगर बताया गया, पर बाद के वैज्ञानिक विश्लेषणों में ग्लेशियर के निचले हिस्से के टूटने से बर्फ-पत्थर के विशाल हिमस्खलन और नदी अवरुद्ध होने को प्रमुख कारण माना गया है। कुछ भूकंपीय गतिविधि स्वयं भूस्खलन से पैदा हुई हो सकती है। अतः इसे सीधे ‘भूकंप से आई बाढ़’ कहना वैज्ञानिक रूप से अभी उचित नहीं।
सबसे बड़ा सबक तकनीक का है। हिमालयी नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में उपग्रह निगरानी, ग्लेशियर और झीलों की निरंतर निगरानी, भूस्खलन सेंसर, स्वचालित जलस्तर मापक तथा सायरन आधारित स्थानीय चेतावनी तंत्र जरूरी हैं। इस घटना में ऊपरी हिस्से के स्वचालित बाढ़-निगरानी स्टेशन तक बह गए—इसलिए केवल सेंसर लगाना पर्याप्त नहीं, उन्हें आपदा-रोधी ढंग से स्थापित करना भी जरूरी है। लापता लोगों की खोज में नेपाल और भारत को डीएनए नमूने, फिंगरप्रिंट, चेहरे की पहचान, मोबाइल लोकेशन, यात्रा-पंजीकरण, होटल-ट्रेकिंग रिकॉर्ड और ड्रोन-सेटेलाइट चित्रों को एक साझा डिजिटल डेटाबेस में जोड़ना चाहिए।
भारतीय नागरिकों के लिए दूतावास, नेपाली प्रशासन और स्थानीय पर्यटन एजेंसियों के बीच चौबीसों घंटे समन्वय अनिवार्य है। भारत ने राहत सामग्री भेजने के साथ हेल्पलाइन और बचाव समन्वय शुरू कर दिया है। भारत के लिए खतरा तत्काल मानवीय और जलवैज्ञानिक दोनों है। भोटेकोशी-त्रिशूली तंत्र आगे चलकर भारत में गंडक के रूप में प्रवेश करता है, इसलिए बिहार और उत्तर प्रदेश को नदी जलस्तर, उपग्रह चित्रों और नेपाली चेतावनियों को वास्तविक समय में साझा कर तटवर्ती आबादी को पहले ही सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना चाहिए।
यह बाढ़ नेपाल के लिए त्रासदी भर नहीं, भारत सहित पूरे हिमालय के लिए चेतावनी है। प्रकृति को नियंत्रित करना संभव नहीं, लेकिन उसके संकेतों को समय रहते पढ़ना और विनाश को आपदा बनने से रोकना संभव है। हिमालय अब विकास की गति नहीं, विकास की संवेदनशीलता भी मांग रहा है।
