2036 ओलंपिक के सफर पर उत्तराखंड
उत्तराखंड खेलों में वैश्विक पहचान बनाने की तरफ अग्रसर है। राज्य में सुविधाएं और संसाधन अब बड़ा आकार ले रहे हैं, तो खिलाड़ियों में जज्बा हिमालय से भी ऊंचा है।
देवभूमि उत्तराखंड अब खेल की दुनिया में वैश्विक पहचान बनाने की तरफ अग्रसर है। सुखद बात है कि, इस छोटे से पर्वतीय राज्य में सुविधाएं और संसाधन अब बड़ा आकार ले रहे हैं, तो खिलाड़ियों में जज्बा हिमालय से भी ऊंचा है। लक्ष्य 38वें नेशनल गेम्स की मेजबानी के बाद 2036 ओलंपिक के सफर में अपनी सहभागिता निभाना है। उत्तराखंड की खेल मंत्री रेखा आर्या ने बीती 10 अगस्त को हरिद्वार से ऋषिकेश तक की 22 किलोमीटर लंबी संकल्प कांवड़ यात्रा की थी। इस यात्रा का मुख्य संकल्प यही था कि भारत को वर्ष 2036 के ओलंपिक खेलों की मेजबानी मिले और देश खेल महाशक्ति बने, हालांकि 2036 के ओलंपिक खेल कहां होंगे, इसका फैसला अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) साल 2029 के मध्य में करेगी।
यहां विंटर के साथ एडवेंचर और हाई-एल्टीट्यूड का कॉम्बिनेशन है। अगर 23 अकादमी सही चलीं और हर ब्लॉक स्टेडियम जमीन पर उतर गया, तो निश्चित ही 2036 ओलंपिक तक उत्तराखंड भारत की स्पोर्ट्स राजधानी बन सकता है। उत्तराखंड के पास सबसे बड़ा भौगोलिक फायदा यहां नेचुरल जिम हैं। इस पहाड़ी राज्य के पास दुनिया में सबसे बेस्ट नेचुरल ट्रेनिंग ग्राउंड हैं। नैनीताल, रानीखेत, औली 1800-3000 मीटर की ऊंचाई पर हैं। यहां ट्रेनिंग से खिलाड़ी की स्टैमिना 20 प्रतिशत तक बढ़ती है। केन्या, इथोपिया के धावक इसी वजह से फेमस हैं। यही नहीं, यह एडवेंचर स्पोर्ट्स का हब है। रिवर राफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग, स्कीइंग के अलावा ट्रेकिंग में औली को भारत का स्विट्जरलैंड कहते हैं।
पहाड़ों पर शुद्ध हवा और पानी है। प्रदूषण नहीं है, इसलिए रिकवरी भी फास्ट होती है। वैश्विक इसलिए क्योंकि यहां का मौसम ही अलग है। गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में बर्फ। यानी साल भर ट्रेनिंग। इससे लागत यूरोप और अमेरिका की तुलना में 60 प्रतिशत सस्ती है। योग और आयुर्वेद की इस नगरी का रिकवरी और मेंटल हेल्थ के लिए दुनिया में कोई जोड़ नहीं। खिलाड़ी योग, ध्यान के लिए भी आएंगे तो इंटरनेशनल खिलाड़ियों के लिए यह सेफ डेस्टिनेशन है।
उत्तराखंड में साल 2025 में नेशनल गेम्स के बाद करीब 1000 करोड़ के इन्फ्रास्ट्रक्चर को इंटरनेशनल लेवल का बनाया जा रहा है। विदेशी टीम तीन महीने ट्रेनिंग करने आएंगी तो होटल, लोकल बिजनेस को फायदा होगा। कोच, फिजियो, मैनेजर, गाइड बनेंगे तो पहाड़ों में पलायन रुकेगा। यही नहीं, उत्तराखंड की ब्रांड वैल्यू भी बनेगी। आसान शब्दों में उदाहरण दें तो यदि अभी भारतीय क्रिकेट टीम बेंगलुरु में ट्रेनिंग करती है तो कल को ऑस्ट्रेलिया, जापान, अफ्रीका की टीम कहेंगी कि तीन महीने की कैंपिंग उत्तराखंड में करते हैं। वो आएंगे, यहां रहेंगे, खाएंगे, ट्रेनिंग करेंगे और वर्ल्ड चैंपियन बनकर जाएंगे और कहेंगे- बेस्ट ट्रेनिंग ग्राउंड इन द वर्ल्ड-उत्तराखंड।
उत्तराखंड के पास फिलहाल जो सुविधाएं हैं, वे किसी भी पहाड़ी राज्य में नहीं हैं। राजधानी देहरादून में राजीव गांधी इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम, महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कॉलेज में इंटरनेशनल शूटिंग रेंज, मल्टीपर्पज हॉल और एथलेटिक ट्रैक है तो हल्द्वानी में इंदिरा गांधी इंटरनेशनल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स है और अब यहां उत्तराखंड की पहली स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बन रही है।
भारत का इकलौता ओलंपिक-स्टैंडर्ड हिमाद्री आइस रिंक (देहरादून) रिनोवेट होकर इंटरनेशनल लेवल का हो गया है। चंपावत के लोहाघाट में महिला स्पोर्ट्स कॉलेज भी सूची में शामिल है। सरकार की खेल पॉलिसी में आठ बड़े शहरों में 23 स्पोर्ट्स अकादमी और हर साल 920 वर्ल्ड-क्लास एथलीट को ट्रेनिंग देने का लक्ष्य है। सरकार के 2026-27 बजट में हर ब्लॉक में एक मिनी स्टेडियम का प्रावधान है, तो खिलाड़ियों को प्रोत्साहन के तौर पर सरकारी नौकरी में क्षैतिज आरक्षण, सीएम खिलाड़ी प्रोत्साहन, उदीयमान खिलाड़ी, खेल किट योजना, फ्री ट्रेनिंग है। अंत में एक बड़ी बात यह है कि चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
इन योजनाओं को धरातल पर उतारने के लिए इंटरनेशनल एयरपोर्ट कनेक्टिविटी, वर्ल्ड क्लास कोच, स्पोर्ट्स हॉस्पिटल और लगातार फंडिंग चाहिए। बड़ी चुनौतियों में मैदानों जैसा बड़ा लैंड बैंक नहीं है। पहाड़ में स्टेडियम बनाना तीन गुना महंगा है, तो माइनस 10 डिग्री में आइस रिंक और हाई-एल्टीट्यूड सेंटर को साल भर चलाना बहुत खर्चीला है। लैंड स्लाइड से इवेंट कैंसिल होने का रिस्क है, तो बीमा कंपनियां भी पीछे हट जाती हैं। वैसे भी सफलता की मंजिल चुनौतियों की पगडंडियां पार करके ही मिलती है। अगर राजनीतिक स्थिरता बनी रहती है और राज्य व केंद्र के बीच तालमेल बेहतर बना रहता है तो उत्तराखंड सिर्फ देवभूमि नहीं, खिलाड़ियों की कर्मभूमि भी बनेगा।
