एआई की दौड़ में निवेश बहुत और लाभ कम

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एआई को लेकर दुनिया में नई बहस शुरू हो गई है। क्या हम तकनीकी क्रांति के वास्तविक दौर में हैं या ऐसे उत्साह में बह रहे हैं जिसका आर्थिक प्रतिफल अभी स्पष्ट नहीं है!

RISHABH
ऋषभ मिश्रा,
असिस्टेंट प्रोफेसर,
आईआईटी कानपुर

एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) आज केवल एक तकनीकी अवधारणा नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, उद्योग, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और शासन व्यवस्था के केंद्र में आ चुकी है। जिस प्रकार बीसवीं सदी में बिजली और इंटरनेट ने दुनिया की आर्थिक संरचना को बदल दिया था, उसी प्रकार इक्कीसवीं सदी में एआई को परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम माना जा रहा है। दुनिया की लगभग सभी बड़ी कंपनियां एआई पर अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं। निवेशकों का विश्वास है कि एआई उत्पादकता को तो बढ़ाएगा ही, साथ ही लागत को भी घटाएगा और नए व्यापारिक अवसर पैदा करेगा, किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह निवेश वास्तविक लाभ में बदल रहा है?

हाल ही में प्रकाशित ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म 'केपीएमजी' की टेक रिपोर्ट ने इस उत्साह के पीछे छिपी वास्तविकता को सामने रखा है। यह रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश कंपनियां एआई को अपनाने की होड़ में तो शामिल हैं, लेकिन वास्तविक और स्थायी लाभ बहुत कम संस्थाओं को मिल पा रहा है। यही कारण है कि एआई को लेकर दुनिया में एक नई बहस शुरू हो गई है कि क्या हम तकनीकी क्रांति के वास्तविक दौर में हैं या फिर एक ऐसे उत्साह में बह रहे हैं, जिसका आर्थिक प्रतिफल अभी स्पष्ट नहीं है?

ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म 'केपीएमजी' की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर की टेक कंपनियों में एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का इस्तेमाल आम हो गया है। साथ ही विश्व की बड़ी कंपनियां एआई पर लगातार निवेश बढ़ा रही हैं, लेकिन इससे लगातार मुनाफा सिर्फ 10 फीसदी कंपनियां ही कमा पा रही हैं। टेक रिपोर्ट में यह निष्कर्ष एक अरब डॉलर (लगभग 9,573 करोड़ रुपये) से अधिक आय वाली 155 कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों के सर्वे के आधार पर निकाला गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक 74 फीसदी टेक कंपनियां डिजिटल तकनीकों पर सालाना औसतन 479 करोड़ रुपये खर्च कर रही हैं, जबकि 51 फीसदी कंपनियां औसतन 957 करोड़ रुपये से अधिक निवेश कर रही हैं, लेकिन कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के अनुसार कुल डिजिटल आय में एआई का योगदान सिर्फ 21 फीसदी से 40 फीसदी के बीच ही है। इस रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि कई कंपनियां प्रति वर्ष करोड़ों डॉलर खर्च कर रही हैं, किंतु केवल सीमित संख्या में कंपनियां ही बहु-स्तरीय निवेश पर स्पष्ट प्रतिफल प्राप्त कर पा रही हैं। एआई उनके ज्ञान-आधारित कर्मचारियों की उत्पादकता तो बढ़ा रहा है, लेकिन केवल लगभग एक-तिहाई संस्थाएं ही एआई को बड़े पैमाने पर उत्पादन और व्यावसायिक प्रक्रियाओं में सफलतापूर्वक लागू कर पाई हैं।

यह स्थिति हमें तकनीकी निवेश और आर्थिक लाभ के बीच के अंतर को समझने के लिए बाध्य करती हैं। इतिहास गवाह है कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति के शुरुआती दौर में अपेक्षाएं वास्तविक परिणामों से कहीं अधिक होती हैं। 1990 के दशक में इंटरनेट के आगमन के समय भी यही स्थिति थी। हजारों कंपनियों ने डिजिटल भविष्य के सपने में निवेश किया, किंतु केवल कुछ ही कंपनियां दीर्घकालिक सफलता प्राप्त कर सकीं। आज एआई के साथ भी कुछ वैसा ही परिदृश्य दिखाई दे रहा है। वस्तुतः एआई से अपेक्षाएं असाधारण हैं। यह डेटा विश्लेषण, ग्राहक सेवा, अनुसंधान, वित्तीय प्रबंधन, उत्पादन नियंत्रण, चिकित्सा निदान और प्रशासनिक कार्यों में अभूतपूर्व दक्षता प्रदान कर सकता है। 

'केपीएमजी' के एक वैश्विक सर्वेक्षण के अनुसार 64 प्रतिशत से अधिक संगठन मानते हैं कि एआई पहले की तुलना में उन्हें सार्थक व्यावसायिक लाभ प्रदान कर रहा है, जिसके कारण एआई एजेंट्स और स्वचालन तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, तो वहीं 90 फीसदी कंपनियों ने नई नौकरियों में एआई को शामिल किया है एवं 89 फीसदी कंपनियां एजेंटिक एआई में निवेश कर रही हैं। इसके बावजूद 54 फीसदी कर्मचारी महसूस करते हैं कि वे इस दौड़ में पीछे छूट रहे हैं, हालांकि 83 फीसदी कंपनियों को भरोसा है कि उनके कर्मचारी फैसले लेने में एआई पर भरोसा करते हैं।  

गौरतलब है कि एआई के प्रयोग से आगे बढ़कर उसे पूरी कंपनी में लागू करना सबसे मुश्किल साबित हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार 61 फीसदी कंपनियों का कहना है कि तकनीक बदलने की तेज रफ्तार के कारण योजनाएं बार-बार बदलनी पड़ती हैं। पुराने सिस्टम और जटिल इंटीग्रेशन इस रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट हैं। फिर भी वास्तविक चुनौती तकनीक को अपनाने में नहीं, बल्कि उसे व्यापक स्तर पर लागू करने में है। अनेक कंपनियां अभी भी प्रयोग, परीक्षण और सीमित परियोजनाओं के स्तर पर ही हैं। एआई को संगठन की मूल प्रक्रियाओं में समाहित करना अत्यंत जटिल कार्य है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)