चिंता का सबब बनता इस्लामिक नाटो

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बांग्लादेश, मिस्र और सीरिया ही नहीं बहुत ही जल्द इस्लामिक सहयोग संगठन के तमाम देश इस्लामिक नाटो का हिस्सा हो सकते हैं। माना जा रहा है कि ट्रंप भी अंदरखाने संगठन को बढ़ावा दे रहे हैं।

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दिग्विजय सिंह, कानपुर

पश्चिम एशिया की जियो पॉलिटिक्स बहुत ही तेजी के साथ बदल रही है। पाकिस्तान हर मोर्चे पर भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है। उसे इस कार्य में अंदरखाने चीन का मजबूत समर्थन मिल रहा है, तो अपने बड़बोलेपन के लिए मशहूर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की शह भी। पहले पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्किए के साथ इस्लामिक नाटो बनाया और अब इसमें भारत के पड़ोसी बांग्लादेश को शामिल करने की कवायद शुरू कर दी। भारत का भरोसेमंद दोस्त मिस्र भी इस संगठन का हिस्सा बन सकता है। यह संगठन भारत के लिए जितना चिंता का विषय है, उतना ही इजरायल के लिए भी, क्योंकि तमाम इस्लामिक राष्ट्र, इजरायल को बड़ा खतरा मानते हैं। इजरायल, भारत का भरोसेमंद दोस्त है और रक्षा के क्षेत्र में भारत को मजबूत करने के लिए दिल खोल कर मदद करता है। नए इस्लामिक नाटो के सदस्य देशों ने इसीलिए सीरिया को भी संगठन का हिस्सा बनाने के लिए दांव चल दिया है। 

भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत से पाकिस्तान तो परेशान है ही, उसका मित्र तुर्किए भी घबराया हुआ है। पाकिस्तान अपने पाले हुए आतंकी संगठनों की मदद से भारत में हमले कराने की कोशिश लगातार करता है, हालांकि पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना के हमले में भारी नुकसान झेलने के बाद उसकी हेकड़ी ढीली पड़ी है। ऐसे में उसकी आतंकी हमला कराने की नापाक हरकतों में कमी तो आई है, लेकिन वह अब अपने आपको सामरिक दृष्टि से काफी मजबूत करने में लगा हुआ है, इसीलिए पाकिस्तानी नेतृत्व ने सबसे पहले भारत के करीबी दोस्त सऊदी अरब को अपने पाले में किया। नाटो जैसा समझौता करने के लिए उसे मनाया और फिर सात अगस्त को तुर्किए के साथ मिलकर उसके साथ समझौता कर लिया। 

पहले तो इन देशों ने कहा कि यह समझौता किसी देश के विरुद्ध नहीं है। सऊदी अरब की तरफ से भी सफाई दी गई, ताकि भारत, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश नाराज न हों, लेकिन बाद में खुद तुर्किए के राष्ट्रपति रजब तैयब इर्दोगान ने यह घोषणा कर दी कि किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। उन्होंने इसे नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) के आर्टिकल-5 जैसा ही समझौता बताया। इससे साफ हो गया है कि पाकिस्तान ने खुद को सामरिक दृष्टि से मजबूत करने के लिए यह समझौता किया है, ताकि भारत जब भी आतंकी हमले का जवाब उसके यहां सैन्य कार्रवाई करके दे, तो वह इन देशों के साथ मिलकर मुकाबला कर सके। 

अब इन तीनों देशों की सेनाएं न सिर्फ साथ में युद्धाभ्यास करेंगी, बल्कि तुर्किए पाकिस्तान में अपना सैन्य बेस भी बना सकता है या फिर पाकिस्तानी सैनिकों के साथ तुर्किए के रक्षा उत्पाद और सैनिकों की मौजूदगी संभव है। इतना ही नहीं भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में चल रही खटास का लाभ भी तुर्किए और पाकिस्तान उठाना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने नए संगठन में शामिल होने का न्योता भी दे दिया है। इसे लगभग बांग्लादेश की सरकार ने स्वीकार भी कर लिया है। खुद बांग्लादेश के विदेशी मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने हवा दी है। उन्होंने कहा है कि इस्लामिक नाटो में शामिल होने का फैसला लिया जा सकता है। 

उनका यह बयान बताता है कि बांग्लादेश पूरी तरह से तुर्किए और पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली बन गया है और कभी भी समझौते की फाइल पर हस्ताक्षर कर सकता है। यदि ऐसा होता है, तो भारत के पड़ोस में तुर्किए और पाकिस्तान के सैनिक डेरा जमा लेंगे। यह स्थिति भारत की सामरिक दृष्टि से अच्छी नहीं होगी। पाकिस्तान तो खतरा पहले से ही था, अब बांग्लादेश भी हमारे लिए खतरा है और बार-बार यह धमकी देता है कि भारत के चिकननेक को वह काट देगा। ऐसे में बांग्लादेश को हर हाल में इस्लामिक नाटो का सदस्य बनने से रोकना होगा। इसके लिए हमारी सरकार को कूटनीतिक प्रयास तेज करने चाहिए। 

भारत सरकार इस विषय पर गंभीर दिख रही है। इसके संकेत खुद भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने दिए हैं। उन्होंने पत्रकारों से कहा है कि पश्चिम एशिया में होने वाली हर गतिविधियों पर हम लगातार नजदीकी निगाह बनाए हुए हैं। वैसे भी बांग्लादेश के प्रधानमंत्री ने भारत में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने को लेकर अभी तक कोई संकेत नहीं दिया है, जबकि भारत सरकार लगातार प्रयास कर रही है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान भारत आने के लिए हामी भरें। माना जा रहा है कि पाकिस्तान और तुर्किए की तरफ से अंदरखाने यह दबाव डाला जा रहा है कि वे यहां न आएं। इसके पीछे वहां की सरकार बहाना बना रही है कि शेख हसीना को पहले बांग्लादेश वापस भेजा जाए इसके बाद ही ब्रिक्स में शामिल होने पर प्रधानमंत्री फैसला लेंगे।

यदि रहमान भारत नहीं आते हैं, तो इसे भारत सरकार की कूटनीतिक असफलता मानी जाएगी। बात करें मिस्र की तो वह भी भारत का मित्र राष्ट्र है, लेकिन जल्द ही वह भी इस्लामिक नाटो में शामिल हो सकता है। यदि ऐसा होता है तो भारत के लिए यह बहुत ही बड़ा झटका होगा। मिस्र और इजरायल में भी गहरी मित्रता है, पर इस्लामिक राष्ट्र होने के नाते पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब उस समझौते में शामिल होने का दबाव डाल रहे हैं। विदेशी मामलों पर बारीकी से नजर रखने वाले विशेषज्ञ तो यह मान रहे हैं कि बांग्लादेश, मिस्र और सीरिया ही नहीं बहुत ही जल्द इस्लामिक सहयोग संगठन के तमाम देश इस संगठन का हिस्सा हो सकते हैं। नए संगठन को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सकारात्मक टिप्पणी से भी पाकिस्तान, तुर्किए का हौसला बढ़ा है। माना जा रहा है कि ट्रंप भी अंदरखाने संगठन को बढ़ावा दे रहे हैं। 

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