सिंधु का पानी और आतंकवाद का सवाल

Amrit Vichar Network
Edited By Virendra Pandey
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भारत का जवाब स्पष्ट है। अब वह यह मानने को तैयार नहीं है कि सीमा के एक तरफ हिंसा जारी रहे और दूसरी तरफ पुराने समझौतों के तहत सामान्य सहयोग चलता रहे।

कांतिलाल वरिष्ठ पत्रकार
कांतिलाल मांडोत
वरिष्ठ पत्रकार

सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच केवल पानी के बंटवारे का समझौता नहीं है। यह उस दौर की उपज है, जब दोनों देशों के बीच गहरे राजनीतिक और सुरक्षा मतभेदों के बावजूद एक ऐसा रास्ता तलाशने की कोशिश की गई थी, जिससे नदियों का पानी युद्ध और तनाव से अलग रखा जा सके, लेकिन सात दशक से अधिक समय बाद परिस्थितियां इतनी बदल चुकी हैं कि यह संधि अब केवल जल प्रबंधन का विषय नहीं रह गई है। यह भारत की सुरक्षा, संप्रभुता, सीमा पार आतंकवाद और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों से भी जुड़ गई है।

भारत का हालिया रुख इसी बदली हुई परिस्थिति को सामने रखता है। अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता की एक संस्था द्वारा सिंधु जल संधि और भारत की जलविद्युत परियोजनाओं से संबंधित निर्णय पर भारत ने स्पष्ट किया है कि वह ऐसी कार्रवाई को स्वीकार नहीं करता। नई दिल्ली का तर्क है कि जिस संस्था को भारत ने कभी मान्यता ही नहीं दी और जिसकी कार्रवाई में उसने भाग नहीं लिया, उसके फैसले को भारत पर बाध्यकारी नहीं माना जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि क्या पुराने समझौतों को बदली हुई सुरक्षा परिस्थितियों से पूरी तरह अलग रखकर देखा जा सकता है?

भारत का जवाब स्पष्ट है। उसके लिए पानी और सुरक्षा अलग-अलग विषय नहीं हैं। पाकिस्तान के साथ संबंधों में आतंकवाद को लेकर भारत का अनुभव इतना गंभीर रहा है कि अब वह यह मानने को तैयार नहीं है कि सीमा के एक तरफ हिंसा जारी रहे और दूसरी तरफ पुराने समझौतों के तहत सामान्य सहयोग चलता रहे। यही कारण है कि भारत ने बार-बार यह संदेश दिया है कि आतंकवाद और पानी साथ-साथ नहीं चल सकते।

सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस समझौते में सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के जल के उपयोग को लेकर व्यापक व्यवस्था बनाई गई। सतलुज, ब्यास और रावी का अधिकांश जल भारत के उपयोग के लिए निर्धारित किया गया, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब के पानी के उपयोग में पाकिस्तान को प्रमुख अधिकार मिले। भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ सीमित उपयोग और जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति भी दी गई, लेकिन उसके लिए तकनीकी और परिचालन संबंधी शर्तें तय की गईं।

उस समय इस समझौते को दोनों देशों के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण माना गया था। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुए, संबंधों में उतार-चढ़ाव आया, सीमाओं पर तनाव बढ़ा, लेकिन सिंधु जल संधि लंबे समय तक बनी रही। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता थी। मगर आज भारत यह संकेत दे रहा है कि किसी समझौते की स्थिरता केवल इस बात से तय नहीं हो सकती कि वह कितने वर्षों से अस्तित्व में है। समय के साथ यदि परिस्थितियां बदलती हैं, तो समझौतों की व्याख्या और उनके क्रियान्वयन के तरीके पर भी नए सिरे से विचार होना स्वाभाविक है।

भारत की आपत्ति केवल मध्यस्थता संस्था के फैसले तक सीमित नहीं है। असली प्रश्न यह है कि किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था को भारत की संप्रभु परियोजनाओं और उसके जल संसाधनों के बारे में निर्णय देने का अधिकार कहां तक है। भारत का कहना है कि जिस प्रक्रिया को उसने स्वीकार ही नहीं किया, उसके निष्कर्ष को वह अपने ऊपर लागू नहीं मान सकता। यह रुख अंतर्राष्ट्रीय कानून और संधि व्यवस्था में भारत की उस व्यापक सोच को भी दर्शाता है, जिसमें किसी भी बाहरी संस्था के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करने से पहले उसकी वैधता और संबंधित समझौते की शर्तों को देखा जाता है।

यहां पाकिस्तान के लिए भी एक गंभीर चुनौती है। वह लंबे समय से सिंधु जल संधि को भारत के साथ अपने जल संबंधों की सुरक्षा-कवच के रूप में देखता रहा है। पाकिस्तान के लिए सिंधु नदी प्रणाली कृषि, खाद्य सुरक्षा, बिजली उत्पादन और अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, इसलिए भारत की ओर से संधि को लेकर अपनाया गया कठोर रुख पाकिस्तान में स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है, लेकिन भारत के दृष्टिकोण से सवाल यह है कि क्या पानी पर सहयोग की अपेक्षा उस समय भी की जा सकती है. जब सीमा पार से आतंकवाद का खतरा लगातार बना रहे।

भारत ने इसी विरोधाभास को अपनी नीति का आधार बनाया है। उसका संदेश है कि एक ओर आतंकवाद को भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जाए और दूसरी ओर जल समझौते को पूरी तरह सामान्य द्विपक्षीय संबंधों से अलग रखने की अपेक्षा की जाए, यह स्थिति लंबे समय तक स्वीकार्य नहीं हो सकती। भारत की भाषा में कहा जाए तो खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। इस वाक्य का महत्व केवल राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। यह भारत की बदलती रणनीतिक सोच का संकेत है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)