संपादकीय : ताशकंद से बढ़ते रिश्ते

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Edited By Pradeep Kumar
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उज्बेकिस्तान बनेगा भारत के लिए मध्य एशिया का प्रवेश-द्वार, 2030 तक 5 अरब डॉलर के व्यापार का लक्ष्य

भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने संबंधों को 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी' तक बढ़ाया है। व्यापार, रक्षा और यूरेनियम आपूर्ति पर हुए समझौतों के कूटनीतिक मायने पढ़ें इस संपादकीय में।

ताशकंद में भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने पूर्व संबंधों को ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ तक ऊपर उठाया है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मध्य एशिया में उज्बेकिस्तान की कूटनीतिक यात्रा के फलितार्थ अत्यंत व्यापक प्रभावों वाले साबित होंगे यह तय है। व्यापार को 2030 तक तकरीबन पांच अरब डॉलर करने, यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति, महत्वपूर्ण खनिजों, रक्षा, डिजिटल तकनीक और परिवहन संपर्क पर सहमति इस रिश्ते को प्रतीकात्मक कूटनीति से निकालकर आर्थिक और सामरिक धरातल पर ले जाती है।

2025 में द्विपक्षीय व्यापार करीब 1.3 अरब डॉलर रहा। इसमें भारत का निर्यात 1.15 अरब डॉलर और उज्बेकिस्तान का भारत को निर्यात केवल 164.6 करोड़ डॉलर रहा। अर्थात व्यापार में भारत का करीब 985 करोड़ डॉलर नहीं, बल्कि लगभग 985 मिलियन डॉलर का अधिशेष है। पिछले साल व्यापार 33.3 प्रतिशत बढ़ा, फिर भी 2030 का पांच अरब डॉलर लक्ष्य मौजूदा स्तर से लगभग चार गुना है, इसलिए लक्ष्य महत्वाकांक्षी अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं— बशर्ते दोनों देश केवल दवाइयों और पारंपरिक वस्तुओं तक सीमित न रहें। भारत के लिए फार्मास्यूटिकल्स, चिकित्सा उपकरण, इंजीनियरिंग सामान, वाहन और कल-पुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि मशीनरी, आईटी तथा डिजिटल सेवाओं में विस्तार की बहुत संभावना है। उज्बेकिस्तान भारत के लिए यूरेनियम, तांबा, सोना, महत्वपूर्ण खनिज और अन्य कच्चे माल का स्रोत बन सकता है। दोनों देशों ने गैर-शुल्क बाधाएं घटाने, निवेश सुगम बनाने और संभावित प्राथमिकता व्यापार समझौते पर आगे बढ़ने के फैसले को कैसे लागू करते हैं, यही पांच अरब डॉलर के लक्ष्य की असली परीक्षा होगी। यूरेनियम इस रिश्ते का विशेष रणनीतिक पक्ष है। उज्बेकिस्तान ने 2025 में करीब 7,000 टन यूरेनियम उत्पादन और 1,39,000 टन प्रमाणित भंडार की सूचना दी है। भारत अपनी बढ़ती परमाणु ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। अत: दीर्घकालीन आपूर्ति भारत को परमाणु ईंधन की विविध और अपेक्षाकृत सुरक्षित आपूर्ति देगा, जबकि उज्बेकिस्तान को स्थिर बाजार। यह सौदा ऊर्जा सुरक्षा और भारत के परमाणु विस्तार दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

रक्षा सहयोग भी महत्वपूर्ण है। आतंकवाद, सीमा-पार आतंकवाद, मादक पदार्थों, साइबर अपराध और उग्रवाद के विरुद्ध सूचना-साझेदारी के साथ सैन्य औद्योगिक सहयोग बढ़ाने की बात हुई है। अप्रैल 2026 में दोनों देशों का सातवां ‘दस्तलिक’ सैन्य अभ्यास हुआ। यानी सुरक्षा संबंध अब केवल औपचारिक सैन्य संपर्क नहीं रहे। सांस्कृतिक समझौतों को भी कम करके नहीं आंकना चाहिए। फ़याज़ टेपा और कारा टेपा के प्राचीन बौद्ध स्थलों के संरक्षण का समझौता मध्य एशिया में भारत की प्राचीन सभ्यतागत उपस्थिति को आधुनिक सांस्कृतिक कूटनीति से जोड़ने का माध्यम बनेगा। हिंदी, संस्कृत, आयुर्वेद, शिक्षा और पर्यटन लोगों के बीच रिश्ते मजबूत करेंगे।

उज्बेकिस्तान भारत के लिए मध्य एशिया का प्रवेश-द्वार है। चीन और रूस के प्रभाव वाले इस भूभाग में भारत की आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाने में भौगोलिक दूरी और कमजोर प्रत्यक्ष परिवहन संपर्क सबसे बड़ी बाधा हैं, इसलिए व्यापार लक्ष्य की सफलता बंदरगाहों, रेल-मार्गों, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल भुगतान और आपूर्ति-शृंखलाओं की वास्तविक प्रगति पर निर्भर करेगी। विदेशी मंत्रियों के नेतृत्व वाली नई समन्वय व्यवस्था इसी क्रियान्वयन की निगरानी कर सके तो ताशकंद की घोषणाएं कागज से जमीन पर उतरेंगी। अब असली कसौटी घोषणाओं की संख्या नहीं, उनके क्रियान्वयन की गति होगी।

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