आजादी के अस्सी बरस बाद भी जिंदा है गांधी का सवाल
देश आजादी के अस्सीवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। अंतरिक्ष में पहुंचते भारत की तस्वीरें आत्मविश्वास जगाती हैं, लेकिन कुछ महिलाएं आज भी दूसरों का मैला अपने हाथों से साफ करने को मजबूर हैं।
वरिष्ठ पत्रकार
देश आजादी के अस्सीवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। अंतरिक्ष में पहुंचते भारत की तस्वीरें आत्मविश्वास जगाती हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तेज रफ्तार सड़कें, चमकते शहर और बदलती जीवनशैली विकास की कहानी कहते हैं, लेकिन इसी चमक के पीछे एक ऐसा अंधेरा भी है, जिसे हम जितना छिपाते हैं, वह उतना ही गहरा दिखाई देता है। कुछ महिलाएं आज भी दूसरों का मैला अपने हाथों से साफ करने के लिए मजबूर हैं। कहीं-कहीं सूखे शौचालय अब भी मौजूद हैं और उनके साथ वह सामाजिक व्यवस्था भी, जिसने जन्म के आधार पर कुछ लोगों के हिस्से में अपमान और कुछ के हिस्से में सुविधा लिख दी है।
यह केवल सफाई का सवाल नहीं है। यह मनुष्य की गरिमा का सवाल है। यह संविधान की उस प्रतिज्ञा का सवाल है, जिसमें समानता, स्वतंत्रता और सम्मान का वादा किया गया है और सबसे बढ़कर यह गांधी के उस भारत का सवाल है, जिसकी कल्पना में अस्पृश्यता के लिए कोई जगह नहीं थी।
गांधी को याद करने का सबसे सार्थक अवसर शायद यही है। गांधी केवल चरखा, सत्याग्रह और स्वतंत्रता आंदोलन का नाम नहीं हैं। उनके विचार की असली परीक्षा उस मनुष्य के जीवन में होती है, जो समाज की सीढ़ी के सबसे नीचे खड़ा है। गांधी ने अस्पृश्यता को सामाजिक पाप माना था। उन्होंने स्वयं शौचालय साफ किए और समाज के सामने एक असुविधाजनक प्रश्न रखा— जिस काम को हम गंदा कहते हैं, उसे करने वाला मनुष्य गंदा क्यों हो जाता है?
यही प्रश्न आज भी हमारे सामने है। हाल में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर से आई महिलाओं और युवाओं ने दिल्ली में इसी विरोधाभास को सामने रखा। सफाई कर्मचारी आंदोलन ने ‘इंडिया @ 80’ अभियान शुरू करते हुए दावा किया कि सरकारी घोषणाओं के बावजूद हाथ से मैला साफ करने की प्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आंदोलन के अनुसार, इन राज्यों के कम से कम 46 जिलों में ऐसी स्थितियों के प्रमाण और प्रत्यक्ष अनुभव सामने आए हैं। सरकारी सर्वेक्षणों के दावों और जमीन पर मौजूद अनुभवों के बीच का यह अंतर केवल आंकड़ों का विवाद नहीं है। यह उस भारत की दो तस्वीरें हैं, जिसे कागज और जमीन अलग-अलग ढंग से देखते हैं।
उत्तर प्रदेश के सीतापुर से आई सत्तर वर्षीय मुसी देवी ने बताया कि उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा दूसरों का मैला साफ करते हुए बिताया। उनकी इच्छा है कि उनके मरने से पहले यह काम खत्म हो जाए। मध्य प्रदेश की अंगूरी बाई ने बताया कि कम उम्र में विवाह के बाद ससुराल में उन्हें सूखे शौचालय साफ करने के काम में लगा दिया गया। बिहार की चांजोतिया देवी पंद्रह वर्ष की उम्र से यह काम करती रही हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगली पीढ़ी को यह काम न करना पड़े। जम्मू-कश्मीर से आए मुजफ्फर अहमद शेख का कहना है कि वहां भी ऐसी प्रथा मौजूद है, लेकिन सामाजिक दबाव के कारण लोग खुलकर बोल नहीं पाते।
इन आवाजों को सुनते हुए पहला सवाल यही उठता है कि किसी बुराई के खत्म होने की घोषणा और उसके वास्तव में खत्म हो जाने के बीच कितना अंतर होता है? अगर सरकारी सूची में कोई व्यक्ति दिखाई नहीं देता तो क्या उसकी पीड़ा भी समाप्त हो जाती है? अगर किसी सर्वेक्षण में संख्या शून्य हो जाए तो क्या सूखे शौचालय अपने आप खत्म हो जाते हैं? आंकड़े जरूरी हैं, लेकिन आंकड़ों से बाहर छूट गया मनुष्य उससे कहीं अधिक जरूरी है। यही गांधी की राजनीति और नैतिकता का केंद्रीय आग्रह था। गांधी के लिए किसी व्यवस्था की सफलता का पैमाना यह नहीं था कि वह कितनी बड़ी दिखती है, बल्कि यह था कि उससे सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन में क्या बदलता है। उनका ‘अंत्योदय’ इसी कसौटी पर समाज और सत्ता को परखता है, इसलिए मैला ढोने की प्रथा का अंत गांधी की दृष्टि से केवल स्वच्छता का कार्यक्रम नहीं, बल्कि मनुष्य की मुक्ति का प्रश्न है।
सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 के सफाई कर्मचारी आंदोलन मामले में सूखे शौचालयों और हाथ से मैला साफ करने की अमानवीय प्रथा को समाप्त करना आवश्यक बताया और इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 17, 21 और 47 की भावना से जोड़ा। अदालत ने पुनर्वास और सम्मानजनक आजीविका की आवश्यकता पर भी जोर दिया। 2013 का कानून भी मैला ढोने की प्रथा पर रोक तथा प्रभावित लोगों के पुनर्वास का प्रावधान करता है।
फिर सवाल वही है— कानून की किताब और समाज की जमीन के बीच इतनी दूरी क्यों है? कानून किसी प्रथा को अपराध घोषित कर सकता है, लेकिन वह अकेले सामाजिक पूर्वाग्रह को समाप्त नहीं कर सकता। उसके लिए समाज को अपनी आंखों में जमी सदियों पुरानी धूल साफ करनी होगी। मैला ढोने की प्रथा केवल गरीबी से पैदा नहीं होती। इसके पीछे जाति, अस्पृश्यता, पितृसत्ता और श्रम के प्रति घृणा की वह मानसिकता है, जो कुछ कामों को कुछ जातियों की नियति मान लेती है।
यहीं गांधी की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। गांधी ने श्रम की गरिमा को सामाजिक बराबरी से जोड़ा था। उनके लिए सफाई का काम नीचा नहीं था; नीचा वह दृष्टिकोण था जो किसी मनुष्य को उसके पेशे और जन्म के आधार पर नीचा समझता है, लेकिन गांधी की विरासत को केवल उद्धरणों में सुरक्षित रख देना पर्याप्त नहीं है। यदि हम गांधी की तस्वीर पर फूल चढ़ाते हैं और उसी समाज में किसी महिला को मैला ढोने के लिए मजबूर करते हैं, तो यह गांधी का सम्मान नहीं, उनके विचार का निषेध है। गांधी की कसौटी पर स्वच्छता का अर्थ यह नहीं कि गंदगी हमारी आंखों से ओझल हो जाए। असली स्वच्छता तब होगी जब गंदगी किसी मनुष्य की नियति न बने।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
